पाठ्यक्रम: जीएस-3/विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी
चर्चा में क्यों?
- सिंथेटिक डीएनए स्वास्थ्य, खाद्य सुरक्षा, जलवायु और जैव-प्रौद्योगिकी में प्रगति के लिए केंद्रीय बन गया है, लेकिन इसकी बढ़ती सुलभता ने महत्वपूर्ण दोहरे उपयोग (dual-use) और जैव-सुरक्षा जोखिम पैदा किए हैं।
सिंथेटिक डीएनए
- इसे कृत्रिम रूप से निर्मित आनुवंशिक पदार्थ के रूप में परिभाषित किया जाता है, जिसे डिजिटल रूप में उपलब्ध जीनोम अनुक्रमों से संश्लेषित किया जा सकता है और जिसका उपयोग सिंथेटिक जीनोम बनाने के लिए किया जा सकता है।
- यह बेहतर या पूरी तरह से नई जैव-अणुक उपचार पद्धतियों के विकास की संभावनाओं का विस्तार करता है, जिनमें एंजाइम, पेप्टाइड, RNA उत्प्रेरक तथा DNA और RNA एप्टामर शामिल हैं।
सिंथेटिक डीएनए के अनुप्रयोग
- चिकित्सा एवं उपचार: यह mRNA टीकों, लक्षित एवं व्यक्तिगत जीन उपचारों, CRISPR-आधारित निदान और सिंथेटिक मोनोक्लोनल एंटीबॉडी के त्वरित विकास को बढ़ावा देता है।
- कृषि एवं खाद्य प्रणालियाँ: यह जलवायु-लचीली फसलों, नाइट्रोजन स्थिरीकरण करने वाले गैर-दलहनी पौधों, जिससे उर्वरक की खपत कम की जा सके, तथा प्रयोगशाला में उगाए गए वैकल्पिक प्रोटीन के निर्माण में सहायता करता है।
- औद्योगिक जैव-प्रौद्योगिकी: यह सिंथेटिक सूक्ष्मजीवी कारखानों का उपयोग करके जैव-प्लास्टिक, जैव-ईंधन, विशेषीकृत एंजाइम और उच्च-मूल्य वाले विशिष्ट रसायनों के जैव-विनिर्माण में सहायता करता है।
- डेटा भंडारण: यह उच्च-घनत्व वाले DNA अणुओं को दीर्घकालिक और अत्यधिक छोटे डिजिटल डेटा भंडारण माध्यम के रूप में उपयोग करने में सहायता करता है, जो हजारों वर्षों तक सुरक्षित रह सकते हैं।
| सिंथेटिक डीएनए का वैश्विक नियंत्रणसिंथेटिक डीएनए का वैश्विक नियंत्रण अनौपचारिक निगरानी से आगे बढ़कर अधिक मजबूत जैव-सुरक्षा तंत्रों की ओर विकसित हुआ है।अमेरिकी स्वास्थ्य एवं मानव सेवा विभाग (HHS) द्वारा 2010 में जारी दिशा-निर्देशों में ग्राहक और अनुक्रम की जाँच को महत्वपूर्ण सुरक्षा उपायों के रूप में रेखांकित किया गया था, जिसके परिणामस्वरूप IGSC की स्थापना और इसकी स्वैच्छिक सामंजस्यपूर्ण कार्यप्रणाली का विकास हुआ।यूरोपीय देश धीरे-धीरे अपने राष्ट्रीय जैव-सुरक्षा कार्यक्रमों में DNA स्क्रीनिंग को शामिल कर रहे हैं तथा नाइजीरिया, दक्षिण कोरिया और चीन जैसे देश भी इस दिशा में पहल कर रहे हैं।IBBIS कॉमन मैकेनिज्म (2024) का उद्देश्य दुनिया भर में स्क्रीनिंग और डेटा-साझाकरण प्रक्रियाओं को मानकीकृत करना है, जिसे EBRC और RAND के कार्यक्रमों से समर्थन प्राप्त है।वर्तमान में शासन व्यवस्था प्रायः तीन स्तरों पर आधारित है: प्रदाता स्तर पर अनिवार्य स्क्रीनिंग; क्षेत्र के भीतर स्व-नियमन; तथा उपकरण स्तर पर सुरक्षा उपाय, जैसे उपयोगकर्ता प्रमाणीकरण, स्थानीय अनुक्रम स्क्रीनिंग, रिकॉर्डिंग और अलार्म। |
भारत के लिए महत्व
- BioE3 नीति के अनुरूप: भारत की BioE3 (अर्थव्यवस्था, पर्यावरण और रोजगार) नीति सिंथेटिक जीवविज्ञान द्वारा संचालित उच्च-प्रदर्शन वाली जैव-अर्थव्यवस्था की ओर संक्रमण का मार्ग प्रशस्त करती है।
- BioE3 नीति भारत की जैव-प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में वैश्विक शक्ति के रूप में स्थिति को मजबूत करने में सहायता कर रही है और तेजी से बढ़ती जैव-अर्थव्यवस्था को समर्थन दे रही है। भारत की जैव-अर्थव्यवस्था का अनुमानित मूल्य 2024 में 165.7 बिलियन अमेरिकी डॉलर था, जिसके 2030 तक 300 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुँचने का अनुमान है।
- स्वास्थ्य सेवा में आत्मनिर्भरता: भारतीय आबादी के लिए सस्ती दवाओं, API (सक्रिय औषधीय घटक) और त्वरित निदान प्रणालियों के स्थानीय निर्माण को सक्षम बनाना।
- कृषि-लचीलापन: यह भारत की कृषि अर्थव्यवस्था को जलवायु की चरम परिस्थितियों (सूखा, उच्च लवणता) और लगातार खराब होती मृदा उर्वरता का सामना करने में सहायता करता है।
- कार्बन उत्सर्जन में कमी: भारत के शुद्ध-शून्य (Net-Zero) उत्सर्जन लक्ष्यों को प्राप्त करने में सहायता के लिए पेट्रोकेमिकल प्रक्रियाओं को टिकाऊ जैव-आधारित विकल्पों से प्रतिस्थापित करना।
चुनौतियाँ एवं चिंताएँ
- साइबर-जैव-सुरक्षा खतरे: DNA स्क्रीनिंग के लिए अंतरराष्ट्रीय प्रदाताओं के उपयोग से संवेदनशील जैविक डेटा पर नियंत्रण और उसकी पहुँच से संबंधित समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं।
- टीकाकरण और चिकित्सा उपलब्धियों को सक्षम बनाने वाली प्रौद्योगिकियों का उपयोग घातक वायरसों की प्रतिकृति बनाने या विनाशकारी जैविक एजेंटों को अधिक प्रभावी बनाने के लिए भी किया जा सकता है।
- DNA डिजाइन सॉफ्टवेयर, संश्लेषण उपकरण के फर्मवेयर और क्लाउड रिपॉजिटरी में सेंध लगाने से डेटा की चोरी, हेरफेर या दुर्भावनापूर्ण संशोधन हो सकता है।
- साइबर हमलों के माध्यम से संश्लेषण के दौरान DNA डिजाइन फाइलों को संशोधित किया जा सकता है, जिससे दुर्भावनापूर्ण आनुवंशिक पदार्थ शामिल हो सकता है और सामान्य स्क्रीनिंग प्रक्रियाओं से बचा जा सकता है।
- आयात पर निर्भरता: भारत की सिंथेटिक DNA आवश्यकताओं को बड़े पैमाने पर आयात के माध्यम से पूरा किया जाता है, मुख्यतः अमेरिका और चीन के आपूर्तिकर्ताओं एवं वितरकों से, जिससे भारत भू-आर्थिक और आपूर्ति शृंखला संबंधी जोखिमों के प्रति संवेदनशील हो सकता है।
- सीमित स्क्रीनिंग: रिपोर्ट के अनुसार, भारत में अधिकांश DNA प्रदाताओं द्वारा अनुक्रम और ग्राहक की बहुत कम कठोर जाँच की जाती है, जिससे जैव-सुरक्षा में कमियाँ उत्पन्न होती हैं।
- कमजोर नियामक ढाँचा: वाणिज्यिक आपूर्तिकर्ताओं और आयातकों से DNA ऑर्डर की जाँच के लिए कोई राष्ट्रीय मानक नहीं है।
- भारत में चिंता के अनुक्रम (Sequences of Concern—SOC) का कोई व्यापक डेटाबेस तथा संभावित रूप से हानिकारक या संशोधित अनुक्रमों का पता लगाने के लिए मजबूत AI-सक्षम समाधान का अभाव है।
- भारतीय जैव-सुरक्षा प्रमाणन और प्रवर्तन प्रक्रियाओं में आयातित बेंचटॉप DNA सिंथेसाइज़र को विशेष रूप से शामिल नहीं किया गया है।
- सीमित प्रशिक्षण एवं कौशल: विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रमों में जैव-सुरक्षा को पर्याप्त रूप से नहीं पढ़ाया जाता है और कई शोधकर्ताओं तथा सुरक्षा विशेषज्ञों के पास स्क्रीनिंग से संबंधित विशिष्ट कौशल का अभाव है।
सुझाव
- भारत को एक खंडित ज्ञान-आधार से आगे बढ़कर समन्वित सिंथेटिक-DNA जैव-सुरक्षा रणनीति अपनानी होगी, जो अपनी घरेलू प्रणालियों को वैश्विक मानदंडों और वन हेल्थ (One Health) की अवधारणा से जोड़े।
- इसे मानव-पशु-पादप रोगजनकों पर एक व्यापक डेटाबेस तैयार करना चाहिए, राष्ट्रीय DNA संश्लेषण स्क्रीनिंग प्रकोष्ठ स्थापित करना चाहिए तथा आयातित बेंचटॉप DNA सिंथेसाइज़र के लिए दो-चरणीय सत्यापन प्रक्रिया प्रदान करनी चाहिए।
- भारत को जैव-सुरक्षा प्रमाणन के माध्यम से औद्योगिक स्व-नियमन का समर्थन करना चाहिए तथा शिक्षा में जैव-सुरक्षा, जैव-रक्षा और दोहरे उपयोग की नैतिकता को एकीकृत करके और संस्थागत जैव-सुरक्षा समितियों को मजबूत करके संस्थागत निगरानी बढ़ानी चाहिए।
- भारत को अमेरिका, यूरोपीय संघ और आसियान जैसे सहयोगियों के साथ जैव-सुरक्षा कूटनीति में सक्रिय रूप से शामिल होना चाहिए, ताकि स्क्रीनिंग मानकों में सामंजस्य स्थापित किया जा सके और सुरक्षित DNA आपूर्ति शृंखलाएँ विकसित की जा सकें। साथ ही, प्रारंभिक चेतावनी, सूचना-साझाकरण और मानकीकृत स्क्रीनिंग के लिए एक क्षेत्रीय नेटवर्क का नेतृत्व करना चाहिए।
- भारत को बढ़ते सिंथेटिक जीवविज्ञान और दोहरे उपयोग के खतरों से निपटने के लिए जोखिम-आधारित, प्रौद्योगिकी-सक्षम और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर समन्वित जैव-सुरक्षा नीति की आवश्यकता है।
स्रोत :ORF
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संक्षिप्त समाचार 27-08-2026