पाठ्यक्रम: जीएस-2/शासन
सन्दर्भ
- केंद्रीय गृह मंत्रालय ने सिलीगुड़ी में गोरखा नेताओं और केंद्रीय गृह मंत्री तथा पश्चिम बंगाल सरकार के प्रतिनिधियों के बीच हुई एक महत्वपूर्ण बैठक के बाद एक उच्च-स्तरीय समिति का गठन किया।
गोरखाओं की माँग की जड़ें क्या हैं?
- अलग प्रशासनिक पहचान के लिए गोरखाओं का आंदोलन भारत में अपनी तरह के सबसे पुराने आंदोलनों में से एक है।
- दार्जिलिंग और इसके आसपास के क्षेत्र—जिनमें कालिम्पोंग, कुर्सियांग, तराई और डुआर्स शामिल हैं—सांस्कृतिक, जातीय और भाषाई रूप से पश्चिम बंगाल के अन्य हिस्सों से अलग हैं।
- इस क्षेत्र की अधिकांश आबादी नेपाली भाषा बोलती है और यहाँ के लोगों की शारीरिक विशेषताएँ भी विशिष्ट हैं। इसके कारण स्थानीय निवासियों को अक्सर नस्लीय आधार पर पहचान और भेदभाव (Racial Profiling) का सामना करना पड़ता है।
- लंबे समय से चले आ रहे इस अलगाव की भावना ने गहरी पहचान संबंधी समस्या को जन्म दिया है। इसी कारण भारतीय नागरिकों के रूप में अपनी पहचान को स्थापित करने के लिए अलग राज्य की माँग को बल मिला है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
- गोरखाओं के लिए अलग प्रशासनिक पहचान की माँग 1907 से चली आ रही है। उस समय दार्जिलिंग हिलमेन एसोसिएशन ने सोनम वांगेल लाडेन ला के नेतृत्व में मिंटो-मॉर्ले सुधार समिति के समक्ष दार्जिलिंग और जलपाईगुड़ी को बंगाल से अलग करने की माँग रखी थी।
- यह माँग 1929 में साइमन कमीशन के समक्ष तथा बाद में ब्रिटिश अधिकारियों के समक्ष भी जारी रही, जहाँ एक अलग प्रशासनिक व्यवस्था की माँग की गई।
- वर्ष 1947 में अविभाजित भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) ने जवाहरलाल नेहरू और लियाकत अली खान के समक्ष एक ज्ञापन प्रस्तुत किया, जिसमें “गोरखास्थान” की माँग की गई थी।
नए राज्यों के गठन के लिए संवैधानिक ढाँचा
संविधान का अनुच्छेद 3 संसद को यह अधिकार देता है कि वह:
- किसी मौजूदा राज्य के क्षेत्र को अलग करके नया राज्य बना सकती है;
- दो या दो से अधिक राज्यों या राज्यों के कुछ हिस्सों को मिलाकर नया राज्य बना सकती है;
- मौजूदा राज्यों के क्षेत्रफल, सीमाओं या नामों में परिवर्तन कर सकती है।
- प्रमुख आवश्यकताएँ: राज्यों के पुनर्गठन से संबंधित विधेयक संसद में केवल राष्ट्रपति की सिफारिश पर ही प्रस्तुत किया जा सकता है।
- यदि प्रस्ताव किसी मौजूदा राज्य के क्षेत्रफल या सीमाओं को प्रभावित करता है, तो राष्ट्रपति को उस विधेयक को संबंधित राज्य की विधानमंडल के पास उसके विचार जानने के लिए भेजना आवश्यक है।
- राज्य विधानमंडल द्वारा व्यक्त किए गए विचार बाध्यकारी नहीं होते। अर्थात्, संसद उन विचारों से असहमत होने पर भी विधेयक को आगे बढ़ा सकती है।
भारत में राज्य पुनर्गठन का विकास
धर आयोग, 1948
- एस.के. धर आयोग ने स्वतंत्रता के बाद प्रांतों के पुनर्गठन के प्रश्न की जाँच की।
- आयोग ने राज्य पुनर्गठन के लिए भाषा को एकमात्र आधार मानने के बजाय प्रशासनिक सुविधा और आर्थिक व्यवहार्यता को अधिक महत्व दिया।
जेवीपी समिति, 1948–49
- जेवीपी समिति में जवाहरलाल नेहरू, वल्लभभाई पटेल और पट्टाभि सीतारमैया शामिल थे। इस समिति ने भाषाई आधार पर राज्यों के गठन के प्रश्न पर पुनर्विचार किया।
- समिति ने केवल भाषाई आधार पर राज्यों के गठन का विरोध किया और राष्ट्रीय एकता, सुरक्षा तथा प्रशासनिक आवश्यकताओं को प्राथमिकता देने पर जोर दिया।
- राज्य पुनर्गठन आयोग, 1953:राज्य पुनर्गठन आयोग में न्यायमूर्ति फ़ज़ल अली, के.एम. पणिक्कर और एच.एन. कुंजरू शामिल थे। आयोग ने भाषा और संस्कृति को महत्वपूर्ण कारक माना, लेकिन इस विचार को अस्वीकार कर दिया कि राज्यों का पुनर्गठन केवल एक ही आधार पर किया जाना चाहिए।
- इसकी सिफारिशों ने राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 में महत्वपूर्ण योगदान दिया। इस अधिनियम के माध्यम से देश को 14 राज्यों और 6 केंद्रशासित प्रदेशों में पुनर्गठित किया गया।
नए राज्यों की माँग क्यों उठती है?
1. भाषाई और सांस्कृतिक पहचान
- समुदाय अपनी भाषा, संस्कृति, परंपराओं और विशिष्ट ऐतिहासिक पहचान को संरक्षित करने के लिए अलग राज्य की माँग करते हैं।
2. प्रशासनिक कारक
- बड़े राज्यों में कठिन भौगोलिक परिस्थितियों या भौगोलिक रूप से अलग-थलग क्षेत्रों के कारण प्रभावी प्रशासन में चुनौतियाँ उत्पन्न हो सकती हैं।
- अलग राज्य का दर्जा माँगने का उद्देश्य सरकार को नागरिकों के अधिक निकट लाना भी हो सकता है।
3. राजनीतिक प्रतिनिधित्व
- राज्य का दर्जा मिलने से किसी क्षेत्र को राज्य संस्थाओं, विधानमंडल और निर्णय लेने की प्रक्रियाओं में अधिक प्रतिनिधित्व मिल सकता है।
नए राज्यों की माँग से जुड़े मुद्दे
1. राज्य की माँगों का विस्तार
- किसी एक क्षेत्र को राज्य का दर्जा दिए जाने से देश के अन्य क्षेत्रों में भी इसी प्रकार की माँगों को प्रोत्साहन मिल सकता है।
- विदर्भ, बुंदेलखंड, बोडोलैंड और हरित प्रदेश आदि के लिए चल रहे आंदोलनों से क्षेत्रीय आकांक्षाओं की निरंतरता स्पष्ट होती है।
2. आर्थिक व्यवहार्यता
- नए राज्य के गठन में प्रशासनिक ढाँचे, विधानमंडल, सचिवालय और सार्वजनिक संस्थानों की स्थापना पर काफी व्यय होता है।
3. अंतर्राज्यीय विवाद
- राज्यों के पुनर्गठन से सीमाओं, जल संसाधनों, वनों, सरकारी कर्मचारियों, परिसंपत्तियों और देनदारियों से संबंधित विवाद उत्पन्न हो सकते हैं।
4. पहचान आधारित राजनीति
- मुख्य रूप से जातीय या भाषाई पहचान पर आधारित राज्य आंदोलनों से बहुसंख्यकवादी और बहिष्करणकारी प्रवृत्तियाँ उत्पन्न हो सकती हैं, जिससे प्रस्तावित राज्य के भीतर रहने वाले अल्पसंख्यक समुदाय प्रभावित हो सकते हैं।
निष्कर्ष
- नए राज्यों की माँग भारत की “विविधता में एकता” की भावना तथा संघीय लोकतंत्र में क्षेत्रीय आकांक्षाओं के निरंतर विकास को दर्शाती है।
- चुनौती यह है कि पहचान, विकास और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के साथ-साथ प्रशासनिक व्यवहार्यता, राष्ट्रीय सुरक्षा और क्षेत्रीय अखंडता के बीच संतुलन स्थापित किया जाए। यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि राज्य पुनर्गठन उत्तरदायी शासन का माध्यम बने, न कि लंबे समय तक चलने वाले क्षेत्रीय संघर्ष का कारण।
स्रोत: IE
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संक्षिप्त समाचार 24-08-2026