अधिकतम मांग के दौरान विद्युत आपूर्ति प्रबंधन 

पाठ्यक्रम: GS3/ ऊर्जा

संदर्भ

  • भारत की विद्युत मांग 2026 की गर्मियों में तीव्र रूप से बढ़ी, अप्रैल में अधिकतम मांग 256.1 गीगावाट के रिकॉर्ड स्तर तक पहुँची।

अधिकतम मांग क्या है?

  • अधिकतम मांग उस उच्चतम स्तर को दर्शाती है, जिस पर किसी विशिष्ट अवधि में ग्रिड पर विद्युत की खपत होती है, जिसे सामान्यतः 15 मिनट के अंतराल में मापा जाता है।
  • अधिकतम मांग की विशेषताएँ:
    • यह सामान्यतः दिन में 2–4 घंटे तक रहती है।
    • गर्मियों में, यह देर दोपहर से देर शाम तक होती है, जब एयर कंडीशनर और शीतलन उपकरणों का भारी उपयोग होता है।
    • सर्दियों में, यह प्रातः और संध्या समय में होती है, जब हीटिंग और प्रकाश की आवश्यकता अधिक होती है।

राज्य विद्युत मांग का प्रबंधन कैसे करते हैं?

  • दीर्घकालिक पीपीए के माध्यम से संविदात्मक आपूर्ति: राज्य वितरण कंपनियाँ (DISCOMs) विद्युत उत्पादकों के साथ दीर्घकालिक विद्युत खरीद समझौते करती हैं।
    • ये समझौते निश्चित क्षमता और मूल्य पर स्थिर विद्युत आपूर्ति सुनिश्चित करते हैं।
    • भारत की लगभग 85–90% विद्युत मांग ऐसे अनुबंधों से पूरी होती है।
  • विद्युत विनिमय से खरीद: अचानक मांग वृद्धि या आपूर्ति विफलता के समय, राज्य अल्पकालिक विद्युत विनिमय से बिजली खरीदते हैं।
    • लगभग 10–15% विद्युत इन विनिमयों के माध्यम से व्यापार की जाती है, जो आपूर्ति और मांग के बीच वास्तविक समय असंतुलन को संतुलित करने में सहायता करती है।

बढ़ती मांग से राज्यों को होने वाली चुनौतियाँ

  • विद्युत खपत में वृद्धि: पिछले पाँच वर्षों में भारत की अधिकतम विद्युत मांग लगभग 37% बढ़ी है।
    • 2020 में लगभग 183 गीगावाट से बढ़कर 2026 में 250 गीगावाट से अधिक हो गई।
    • घरेलू विद्युतीकरण, एयर कंडीशनर का बढ़ता उपयोग, इलेक्ट्रिक वाहनों का प्रसार और कृषि विद्युत खपत इसके प्रमुख कारण हैं।
  • वित्तीय दबाव: DISCOMs अक्सर निश्चित आपूर्ति क्षमता वाले दीर्घकालिक अनुबंधों में बंधे रहते हैं, जो अचानक अधिकतम मांग को पूरा नहीं कर पाते।
    • अतिरिक्त बिजली अल्पकालिक बाजार से ऊँचे मूल्य पर खरीदनी पड़ती है।
    • उत्तर प्रदेश और बिहार उच्च वितरण हानि, पुरानी अवसंरचना और अधिभारित ट्रांसफॉर्मरों से संबंधित चुनौतियों का सामना करते हैं।
  • वितरण अवसंरचना पर दबाव: अधिभारित ट्रांसफॉर्मर, पुरानी फीडर लाइनों और खराब रखरखाव से अंतिम स्तर पर विद्युत आपूर्ति कमजोर होती है।
    • कई राज्यों में वितरण प्रणाली अपनी तकनीकी सीमा के करीब संचालित हो रही है।
    • उत्तरी राज्यों में ट्रांसफॉर्मर विफलता दर 20% तक दर्ज की गई है।

राज्यों द्वारा अपनाए गए मांग-पक्ष उपाय

  • कई राज्य उपभोक्ताओं को शाम के अधिकतम मांग समय में विद्युत खपत कम करने की सलाह जारी करते हैं।
  • ऊर्जा-कुशल उपकरणों को बढ़ावा दिया जा रहा है।
  • कृषि भार का समय निर्धारण भी कुछ राज्यों में अपनाया जा रहा है, ताकि ग्रिड पर दबाव कम हो।
  • समय-आधारित (ToD) टैरिफ लागू किए जा रहे हैं, जिनमें खपत के समय के अनुसार विद्युत मूल्य बदलते हैं।
  • स्मार्ट मीटरिंग प्रणाली लागू की जा रही है, जिससे विद्युत उपयोग दक्षता और मांग पूर्वानुमान में सुधार हो।
  • उदाहरण: दिल्ली ने शाम की विद्युत मांग को कम करने हेतु स्मार्ट मीटरिंग और ToD टैरिफ पर अधिक निर्भरता दिखाई है।

अधिकतम मांग प्रबंधन में नवीकरणीय ऊर्जा की भूमिका

  • विद्युत खपत में वृद्धि: विगत पाँच वर्षों में भारत की अधिकतम विद्युत मांग लगभग 37% बढ़ी है।
    • 2020 में लगभग 183 गीगावाट से बढ़कर 2026 में यह 250 गीगावाट से अधिक हो गई।
    • घरेलू विद्युतीकरण में वृद्धि, एयर कंडीशनर के बढ़ते उपयोग, इलेक्ट्रिक वाहनों का प्रसार और कृषि विद्युत खपत का विस्तार, मांग बढ़ने के प्रमुख कारक हैं।
  • वितरण कंपनियों (DISCOMs) पर वित्तीय दबाव: DISCOMs प्रायः दीर्घकालिक विद्युत खरीद समझौतों (PPAs) में बंधे रहते हैं, जिनकी निश्चित आपूर्ति क्षमता अचानक बढ़ी हुई अधिकतम मांग को पूरा नहीं कर पाती।
    • अधिकतम मांग अवधि में अतिरिक्त विद्युत अल्पकालिक बाजार से काफी ऊँचे मूल्य पर खरीदनी पड़ती है।
    • उत्तर प्रदेश और बिहार उच्च वितरण हानि, पुरानी अवसंरचना एवं अधिभारित ट्रांसफॉर्मरों से संबंधित चुनौतियों का सामना करते रहते हैं।
  • वितरण अवसंरचना पर दबाव: अधिभारित ट्रांसफॉर्मर, पुरानी फीडर लाइनों और खराब रखरखाव से अंतिम स्तर पर विद्युत आपूर्ति प्रणाली कमजोर होती है।
    • कई राज्यों में वितरण प्रणाली अपनी तकनीकी सीमा के करीब संचालित हो रही है।
    • उत्तरी राज्यों में ट्रांसफॉर्मर विफलता दर 20% तक दर्ज की गई है।

ऊर्जा भंडारण प्रौद्योगिकियों की आवश्यकता

  • केवल नवीकरणीय ऊर्जा विश्वसनीय चौबीसों घंटे आपूर्ति सुनिश्चित नहीं कर सकती, क्योंकि सौर और पवन उत्पादन अस्थिर होता है।
  • अतः अतिरिक्त नवीकरणीय ऊर्जा को उच्च उत्पादन अवधि में संग्रहीत कर, अधिकतम मांग समय में आपूर्ति हेतु ऊर्जा भंडारण प्रौद्योगिकियों की आवश्यकता है।
  • बैटरी ऊर्जा भंडारण प्रणाली (BESS): अतिरिक्त नवीकरणीय बिजली को संग्रहीत कर उच्च मांग अवधि में आपूर्ति करती है।
    • यह ग्रिड की लचीलापन, विश्वसनीयता और नवीकरणीय ऊर्जा एकीकरण को सुधारती है।
  • पंप्ड हाइड्रो स्टोरेज (PHS): जल को ऊँचे जलाशयों में पंप कर ऊर्जा संग्रहीत करता है और अधिकतम मांग अवधि में बिजली उत्पन्न करता है।

आगे की राह

  • भारत को BESS और PHS जैसी ऊर्जा भंडारण प्रौद्योगिकियों में पर्याप्त निवेश की आवश्यकता है, ताकि नवीकरणीय ऊर्जा की अस्थिरता एवं शाम की अधिकतम मांग को प्रबंधित किया जा सके।
  • स्मार्ट ग्रिड प्रौद्योगिकियों और डिजिटल निगरानी प्रणालियों का विस्तार कर ग्रिड की लचीलापन एवं विश्वसनीयता बढ़ाई जानी चाहिए।
  • राज्यों को प्रसारण और वितरण अवसंरचना को सुदृढ़ करना होगा, ताकि अंतिम स्तर पर विद्युत आपूर्ति में सुधार हो सके।

Source: TH

 

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