पाठ्यक्रम: GS3/ऊर्जा
संदर्भ
- TERI की रिपोर्ट ‘भारत का परमाणु ऊर्जा विज़न: SMR की तैनाती के लिए रणनीतिक मार्ग’ के अनुसार, 2047 तक 100 गीगावाट क्षमता प्राप्त करने के लिए लगभग ₹23–25 लाख करोड़ का निवेश, प्रमुख नियामक सुधार, तीव्र परियोजना क्रियान्वयन और छोटे मॉड्यूलर रिएक्टर (SMRs) की तैनाती आवश्यक होगी।
भारत के लिए परमाणु ऊर्जा का महत्व
- बढ़ती ऊर्जा मांग: भारत की अर्थव्यवस्था और जनसंख्या तीव्रता से बढ़ रही है, जिससे स्वच्छ ऊर्जा, विश्वसनीय बेसलोड बिजली, औद्योगिक ऊर्जा आपूर्ति और ऊर्जा सुरक्षा की मांग बढ़ रही है।
- यद्यपि नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता बढ़ रही है, सौर और पवन ऊर्जा अस्थिर बनी रहती है।
- परमाणु ऊर्जा की भूमिका: परमाणु ऊर्जा सतत बेसलोड बिजली, कम-कार्बन विद्युत, गैर-सौर घंटों में ग्रिड स्थिरता और हरित हाइड्रोजन व हरित अमोनिया उत्पादन में सहयोग प्रदान करती है।
- केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (CEA) के अनुसार, जैसे-जैसे नवीकरणीय ऊर्जा का प्रसार बढ़ेगा, परमाणु ऊर्जा का महत्व बढ़ेगा।
भारत में परमाणु ऊर्जा की वर्तमान स्थिति
- वर्तमान क्षमता: भारत वर्तमान में 25 परमाणु रिएक्टर संचालित करता है, जिनकी स्थापित क्षमता लगभग 8.8 गीगावाट है और ये 7 परमाणु ऊर्जा स्थलों पर स्थित हैं।
- भविष्य की योजनाएँ: चल रही और नियोजित परियोजनाएँ 2032 तक क्षमता को लगभग 22 गीगावाट तक बढ़ा सकती हैं।
- हालाँकि, 2047 तक 100 गीगावाट तक पहुँचना कहीं अधिक तीव्र विस्तार रणनीति की माँग करता है।

छोटे मॉड्यूलर रिएक्टर (SMRs)
- SMRs कॉम्पैक्ट परमाणु रिएक्टर होते हैं जिनकी उत्पादन क्षमता कम होती है, फैक्ट्री-आधारित निर्माण, मॉड्यूलर ढाँचा और तीव्र तैनाती समयरेखा होती है।
- इन्हें पारंपरिक बड़े रिएक्टरों की तुलना में अधिक लचीला और किफायती माना जाता है।
SMRs के लाभ
- तीव्र निर्माण: फैक्ट्री निर्माण से विलंब और लागत वृद्धि कम होती है।
- कम प्रारंभिक निवेश: चरणबद्ध निवेश से वित्तीय जोखिम घटता है।
- लचीली तैनाती: SMRs को औद्योगिक केंद्रों, दूरस्थ क्षेत्रों, छोटे ग्रिडों और डेटा केंद्रों में स्थापित किया जा सकता है।
- बहुउद्देशीय उपयोग: विद्युत उत्पादन के अलावा, SMRs हाइड्रोजन उत्पादन, जल विलवणीकरण, औद्योगिक प्रक्रिया ऊष्मा और जिला हीटिंग में सहयोग कर सकते हैं।
भारत का स्वदेशी SMR कार्यक्रम
- भारत वर्तमान में 200 MWe भारत SMR, 55 MWe रिएक्टर और 5 MWth उच्च तापमान गैस-शीतित रिएक्टर विकसित कर रहा है।
- बजटीय सहयोग: केंद्रीय बजट 2025–26 में SMR अनुसंधान और तैनाती हेतु ₹20,000 करोड़ आवंटित किए गए।
- लक्ष्य: 2033 तक 5 स्वदेशी SMRs को परिचालन में लाना।
- यह आत्मनिर्भर भारत ढाँचे के अंतर्गत स्वदेशी परमाणु प्रौद्योगिकी विकास की सरकारी पहल को दर्शाता है।
भारत का तीन-चरणीय परमाणु कार्यक्रम
- भारत की दीर्घकालिक परमाणु दृष्टि डॉ. होमी जे. भाभा द्वारा प्रस्तावित रणनीति का अनुसरण करती है। भारत के पास विश्व के सबसे बड़े थोरियम भंडारों में से एक है, जिससे यह चरण रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बनता है।
- चरण 1: प्राकृतिक यूरेनियम का उपयोग करने वाले प्रेसराइज्ड हेवी वाटर रिएक्टर (PHWRs)।
- चरण 2: प्लूटोनियम का उपयोग करने वाले फास्ट ब्रीडर रिएक्टर।
- कलपक्कम में प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (PFBR) ने अप्रैल 2026 में क्रिटिकलिटी प्राप्त की।
- चरण 3: दीर्घकालिक ईंधन स्थिरता हेतु थोरियम-आधारित रिएक्टर।
SMRs में वैश्विक विकास
- विश्वभर में 120 से अधिक SMR डिज़ाइन विकसित किए जा रहे हैं।
- SMR विकास में अग्रणी देश हैं: अमेरिका, कनाडा, चीन, रूस, फ्रांस और यूनाइटेड किंगडम।
- वर्तमान में केवल कुछ SMRs परिचालन में हैं, लेकिन वैश्विक निवेश तीव्रता से बढ़ रहा है।
100 गीगावाट लक्ष्य प्राप्त करने की प्रमुख चुनौतियाँ
- नियामक अवरोध: भारत की परमाणु नियामक प्रणाली मुख्यतः बड़े रिएक्टरों के लिए बनाई गई थी।
- आवश्यक सुधारों में सुव्यवस्थित लाइसेंसिंग प्रक्रिया, SMR-विशिष्ट विनियम, तीव्र पर्यावरणीय स्वीकृतियाँ और PPP ढाँचे शामिल हैं।
- परमाणु ऊर्जा अधिनियम और संबंधित ढाँचे को निजी भागीदारी हेतु आधुनिक बनाने की आवश्यकता हो सकती है।
- वित्तीय बाधाएँ: परमाणु परियोजनाओं में उच्च प्रारंभिक पूंजी लागत, लंबी परिपक्वता अवधि और विलंब के कारण वित्तीय जोखिम शामिल हैं।
- TERI का अनुमान है कि 2047 तक ₹23–25 लाख करोड़ का निवेश आवश्यक होगा।
- इसके लिए संप्रभु सहयोग, अंतर्राष्ट्रीय साझेदारी और निजी निवेश भागीदारी आवश्यक है।
- ईंधन सुरक्षा चिंताएँ: भारत प्रतिवर्ष केवल लगभग 600 टन यूरेनियम का उत्पादन करता है, जबकि इसके पास लगभग 4,25,000–4,33,800 टन U₃O₈ का भंडार है।
- आयात निर्भरता: 2008–09 से 2024–25 के बीच भारत ने 18,842.60 टन यूरेनियम उत्पाद आयात किए। दीर्घकालिक ईंधन सुरक्षा एक बड़ी चिंता बनी हुई है।
- कार्यबल और तकनीकी अंतराल: तीव्र विस्तार हेतु कुशल परमाणु अभियंता, सुरक्षा विशेषज्ञ और उन्नत विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र आवश्यक हैं।
- भारत को संस्थागत समन्वय, प्रशिक्षण कार्यक्रम और शोध सहयोग की आवश्यकता है।
- जन स्वीकृति और सुरक्षा चिंताएँ: फुकुशिमा (जापान) और चेर्नोबिल (यूक्रेन) जैसी घटनाओं के बाद जन चिंताएँ वैश्विक स्तर पर परमाणु विस्तार को प्रभावित करती हैं।
- सार्वजनिक जागरूकता कार्यक्रम, सुरक्षा तंत्र में पारदर्शिता और सामुदायिक भागीदारी आवश्यक है।
आगे की राह: TERI का अनुशंसित रोडमैप
- चरण 1: नियामक सुधार, पायलट SMR परियोजनाएँ और संस्थागत सुदृढ़ीकरण।
- चरण 2: बड़े पैमाने पर तैनाती, औद्योगिक पारिस्थितिकी तंत्र विकास और सार्वजनिक-निजी सहयोग।
- चरण 3: उन्नत रिएक्टरों, थोरियम-आधारित प्रणालियों का एकीकरण और उद्योग का गहन डीकार्बोनाइजेशन।
निष्कर्ष
- परमाणु ऊर्जा भारत की दीर्घकालिक ऊर्जा संक्रमण रणनीति का एक महत्वपूर्ण स्तंभ बन रही है।
- 2047 तक 100 गीगावाट परमाणु क्षमता का महत्वाकांक्षी लक्ष्य प्राप्त करने के लिए नियमन, वित्तपोषण, ईंधन सुरक्षा, प्रौद्योगिकी और जन भागीदारी में समन्वित कार्रवाई आवश्यक होगी।
- छोटे मॉड्यूलर रिएक्टर स्वच्छ, लचीली और विस्तार योग्य परमाणु तैनाती को सक्षम बनाकर परिवर्तनकारी भूमिका निभा सकते हैं। यदि प्रभावी रूप से लागू किया जाए, तो परमाणु ऊर्जा नेट ज़ीरो 2070 लक्ष्य, ऊर्जा सुरक्षा, औद्योगिक डीकार्बोनाइजेशन एवं विकसित भारत 2047 दृष्टि में महत्वपूर्ण योगदान दे सकती है।
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