पाठ्यक्रम: GS3/अर्थव्यवस्था और कृषि
संदर्भ
- भारत के जूट क्षेत्र का विकास जूट फसल सूचना प्रणाली (JCIS) के क्रियान्वयन के साथ एक निर्णायक नए चरण में प्रवेश कर चुका है।
परिचय
- राष्ट्रीय जूट बोर्ड ने भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) और जूट निगम ऑफ इंडिया के सहयोग से 2023 से जूट फसल सूचना प्रणाली परियोजना का क्रियान्वयन किया है।
- उद्देश्य: रिमोट सेंसिंग और क्षेत्रीय आंकड़ों का उपयोग कर जूट की खेती की निगरानी करना। इस पहल के अंतर्गत दो प्रमुख उपकरण विकसित किए गए हैं:
- BHUVAN JUMP: क्षेत्रीय जूट निगरानी हेतु मोबाइल ऐप।
- PATSAN (मोबाइल ऐप-आधारित क्षेत्रीय प्रेक्षणों का उपयोग करके जूट का संभावित मूल्यांकन): वेब-आधारित प्लेटफ़ॉर्म जो लगभग वास्तविक समय में जूट निगरानी और विश्लेषण प्रदान करता है, जिससे अधिकारियों एवं हितधारकों को सूचित निर्णय लेने में सहायता मिलती है।
JCIS की आवश्यकता
- JCIS के लागू होने से पूर्व जूट पारिस्थितिकी तंत्र संरचनात्मक सीमाओं से ग्रस्त था, जिसने योजना और उत्पादकता दोनों को बाधित किया।
- फसल क्षेत्र और उत्पादन अनुमान खंडित इनपुट और विशेषज्ञ आकलनों पर आधारित थे, जिससे असंगतियाँ एवं विलंब उत्पन्न होते थे।
- क्षेत्रीय आंकड़ा संग्रहण मैनुअल था, जिसमें मानकीकरण और भू-संदर्भ का अभाव था।
- बाढ़, सूखा, कीट या तापमान भिन्नताओं से उत्पन्न फसल तनाव का वास्तविक समय में पता लगाने की व्यवस्था न होने से प्रतिक्रिया में विलंब और अधिक फसल हानि होती थी।
भारत में जूट उत्पादन
- इसे “स्वर्ण तंतु” कहा जाता है क्योंकि यह प्राकृतिक, नवीकरणीय, जैव-अपघटनीय और पर्यावरण-अनुकूल उत्पाद है।
- भारत जूट का सबसे बड़ा उत्पादक है, इसके बाद बांग्लादेश और चीन आते हैं।
- किंतु क्षेत्रफल और व्यापार की दृष्टि से बांग्लादेश अग्रणी है, जो वैश्विक जूट निर्यात का तीन-चौथाई हिस्सा रखता है।
- भारत में जूट का अधिकांश हिस्सा घरेलू मांग के कारण देश में ही उपभोग होता है, औसतन 90% उत्पादन घरेलू खपत में जाता है।
- जूट क्षेत्र लगभग 4 लाख श्रमिकों को प्रत्यक्ष रोजगार देता है और लगभग 40 लाख कृषक परिवारों की आजीविका का समर्थन करता है।
- पश्चिम बंगाल, बिहार और असम भारत के कुल उत्पादन का लगभग 99% हिस्सा रखते हैं।
जूट उत्पादन हेतु आवश्यक परिस्थितियाँ
- तापमान: अधिकतम औसत 34°C और न्यूनतम औसत 15°C, साथ ही 65% औसत आर्द्रता।
- वर्षा: लगभग 150-250 सेमी।
- मृदा: जूट सभी प्रकार की मिट्टी (क्ले से रेतीली दोमट) पर उगाया जा सकता है, किंतु दोमट जलोढ़ मृदा सर्वाधिक उपयुक्त है।
भारत में जूट उद्योग की चुनौतियाँ
- कृत्रिम तंतुओं से प्रतिस्पर्धा: पॉलीप्रोपाइलीन और पॉलिएस्टर जैसे कृत्रिम तंतु जूट के लिए कठोर प्रतिस्पर्धा उत्पन्न करते हैं।
- नवाचार और उत्पाद विविधीकरण का अभाव: उद्योग सीमित उत्पाद नवाचार और विविधीकरण का सामना कर रहा है।
- गुणवत्ता संबंधी समस्याएँ: रेटिंग प्रक्रिया में जूट गट्ठरों को लगभग 30 सेमी गहराई तक पानी में रखा जाता है। आदर्श रूप से यह धीमी गति से बहने वाले स्वच्छ जल स्रोतों में होना चाहिए, किंतु भारतीय किसानों के पास ऐसे संसाधन नहीं हैं।
- जूट मिलों की चिंताएँ: मशीनरी आधुनिकीकरण, कुप्रबंधन, श्रमिकों की कमी, अशांति और सरकार पर निर्भरता।
- मूल्य अस्थिरता: जलवायु परिस्थितियों और मांग-आपूर्ति असंतुलन से प्रभावित होकर जूट की कीमतें अस्थिर रहती हैं।
जूट उत्पादन हेतु सरकारी कदम
- जूट पैकेजिंग सामग्री अधिनियम, 1987 (अनिवार्य वस्तुओं की पैकिंग में उपयोग): सरकार ने खाद्यान्नों के लिए 100% और चीनी के लिए 20% आरक्षण जूट पैकेजिंग सामग्री हेतु रखा है।
- कच्चे जूट के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP)।
- राष्ट्रीय जूट विकास कार्यक्रम (NJDP): 2021-22 से 2025-26 तक जूट क्षेत्र के समग्र विकास और प्रोत्साहन हेतु स्वीकृत।
NJDP के अंतर्गत योजनाएँ:
- जूट ICARE: वैज्ञानिक विधियों द्वारा जूट की खेती और रेटिंग अभ्यास का परिचय।
- जूट संसाधन सह उत्पादन केंद्र (JRCPC): नए कारीगरों को प्रशिक्षण देकर जूट विविधीकरण कार्यक्रमों का प्रसार।
- जूट कच्चा माल बैंक (JRMB): जूट कारीगरों और MSMEs को मिल गेट मूल्य पर कच्चा माल उपलब्ध कराना।
- जूट डिज़ाइन संसाधन केंद्र (JDRC): बाज़ार योग्य नवाचारी जूट उत्पादों का डिज़ाइन और विकास।
- उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (PLI) योजना: जूट मिलों और MSME इकाइयों को अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में प्रतिस्पर्धी बनाने हेतु समर्थन।
- बाज़ार विकास और प्रोत्साहन गतिविधियाँ: गुणवत्ता प्रमाणन हेतु जूट मार्क लोगो का विकास और प्रचार अभियान।
जूट निगम ऑफ इंडिया लिमिटेड (JCI)
- JCI को भारत सरकार ने 1971 में मूल्य समर्थन एजेंसी के रूप में स्थापित किया था, जिसका उद्देश्य किसानों से न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर कच्चा जूट खरीदना है।
- इसका उद्देश्य लाभ कमाना नहीं बल्कि जूट खेती में संलग्न परिवारों के हितों की रक्षा करना है।
Source: PIB
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