त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति में राज्यपाल की भूमिका

पाठ्यक्रम: GS2/राजव्यवस्था और शासन

समाचार में

  •  तमिलनाडु के 2026 के विधानसभा चुनावों में त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति उत्पन्न हुई, जहाँ टीवीके (विजय की पार्टी) ने 234 सदस्यीय सदन में 108 सीटें जीतीं, जो बहुमत के लिए आवश्यक 118 सीटों से कम हैं।

त्रिशंकु विधानसभा क्या है?

  •  जब कोई एकल राजनीतिक दल स्पष्ट बहुमत प्राप्त नहीं कर पाता, तब विधानसभा को “त्रिशंकु” कहा जाता है। ऐसी स्थिति में गठबंधन वार्ताएँ आरम्भ होती हैं तथा छोटे दलों अथवा निर्दलीय विधायकों के समर्थन पर निर्भरता बढ़ जाती है।
  •  इस परिस्थिति में राज्यपाल एक प्रमुख संवैधानिक पदाधिकारी के रूप में यह निर्णय लेते हैं कि सरकार गठन के लिए प्रथम आमंत्रण किसे दिया जाए।

संवैधानिक प्रावधान

  •  अनुच्छेद 163: राज्यपाल मंत्रिपरिषद के परामर्श पर कार्य करते हैं, सिवाय उन परिस्थितियों के जहाँ उन्हें विवेकाधीन शक्ति का प्रयोग करना हो।
  • अनुच्छेद 164(1): राज्यपाल मुख्यमंत्री तथा मंत्रिपरिषद की नियुक्ति करते हैं। त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति में सरकार गठन हेतु दलों को आमंत्रित करने में राज्यपाल विवेकाधीन शक्ति का प्रयोग करते हैं।
  • अनुच्छेद 163(2): यदि यह प्रश्न उत्पन्न हो कि कोई विषय राज्यपाल के विवेकाधिकार के अंतर्गत आता है या नहीं, तो इस संबंध में राज्यपाल का निर्णय अंतिम होगा तथा उसे न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती।

त्रिशंकु विधानसभा में राज्यपाल की भूमिका
 

  • इस शक्ति का प्रयोग करते हुए राज्यपाल उस दल अथवा गठबंधन को सरकार गठन हेतु आमंत्रित करते हैं, जिसे जनादेश प्राप्त हुआ हो तथा जिसने सरकार बनाने का दावा प्रस्तुत किया हो।
  • इसके पश्चात राज्यपाल मुख्यमंत्री पद के नामित व्यक्ति को पद एवं गोपनीयता की शपथ दिलाने के लिए समय निर्धारित करते हैं।
  • इसके अतिरिक्त, निर्वाचित विधायकों में सामान्यतः सबसे वरिष्ठ विधायक को अस्थायी अध्यक्ष (प्रोटेम स्पीकर) नियुक्त किया जाता है, जो विधायकों को शपथ दिलाते हैं तथा सदन में विश्वास मत का संचालन करते हैं।
    • फ्लोर टेस्ट (विश्वास मत): यह विधायी निकायों में आयोजित एक प्रक्रिया है, जिसके माध्यम से यह निर्धारित किया जाता है कि सरकार को सदन का बहुमत समर्थन प्राप्त है या नहीं। यह सदन के सदस्यों द्वारा मतदान के माध्यम से संपन्न होता है।
  • यदि राज्यपाल इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि विधानसभा की वर्तमान संरचना में कोई स्थायी सरकार नहीं बन सकती, तो वे केंद्र सरकार को राष्ट्रपति शासन लागू करने की अनुशंसा कर सकते हैं।

राज्यपाल की भूमिका से संबंधित आयोगों की रिपोर्टें एवं सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय

  • सरकारिया आयोग रिपोर्ट (1983): इस रिपोर्ट में कहा गया कि यदि किसी एक दल को विधानसभा में पूर्ण बहुमत प्राप्त हो, तो उस दल के नेता को स्वतः मुख्यमंत्री बनने हेतु आमंत्रित किया जाना चाहिए।
  • किन्तु यदि ऐसी स्थिति न हो, तो राज्यपाल को निम्नलिखित वरीयता क्रम के आधार पर मुख्यमंत्री का चयन करना चाहिए—
    • चुनाव-पूर्व गठित दलों का गठबंधन।
    • सबसे बड़ा एकल दल, जो निर्दलीयों सहित अन्य दलों के समर्थन से सरकार बनाने का दावा प्रस्तुत करे।
    • चुनाव-पश्चात गठित गठबंधन, जिसमें सभी सहयोगी दल सरकार में सम्मिलित हों।
    • चुनाव-पश्चात गठित ऐसा गठबंधन, जिसमें कुछ दल सरकार में सम्मिलित हों तथा अन्य दल अथवा निर्दलीय बाहर से समर्थन दें।
  • पुंछी आयोग (2007):  इस आयोग ने व्यापक रूप से सरकारिया आयोग की रूपरेखा का समर्थन किया, किन्तु यह भी जोड़ा कि राज्यपालों को राजनीतिक एजेंट के रूप में नहीं, बल्कि संवैधानिक निष्पक्षता के साथ कार्य करना चाहिए।
    • आयोग ने यह भी कहा कि बहुमत सिद्ध करने हेतु यथाशीघ्र फ्लोर टेस्ट कराया जाना चाहिए।
    • साथ ही, चुनाव-पूर्व गठबंधनों को चुनाव-पश्चात गठबंधनों की अपेक्षा प्राथमिकता दी जानी चाहिए, क्योंकि वे अधिक स्पष्ट जनादेश को प्रतिबिंबित करते हैं।
  • सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय:
    • एस.आर. बोम्मई बनाम भारत संघ (1994):  सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि राज्यपाल को उस दल अथवा गठबंधन के नेता को सरकार गठन हेतु आमंत्रित करना चाहिए, जिसके पास सदन में बहुमत हो, अथवा जो सबसे बड़ा दल/गठबंधन हो।
    • रमेश्वर प्रसाद बनाम भारत संघ (2006):  न्यायालय ने समयपूर्व विधानसभा विघटन के विरुद्ध चेतावनी दी तथा यह स्पष्ट किया कि राजनीतिक दलों को सरकार गठन का उचित अवसर प्रदान किया जाना चाहिए।
    • उत्तराखंड संकट से संबंधित निर्णय (2016):  सर्वोच्च न्यायालय ने फ्लोर टेस्ट को “अंतिम” एवं सर्वाधिक उपयुक्त विकल्प बताया तथा तत्कालीन कांग्रेस मुख्यमंत्री हरीश रावत को सदन में बहुमत सिद्ध करने का निर्देश दिया।

Source: TH

 

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