पाठ्यक्रम: GS3/पर्यावरण/अपशिष्ट प्रबंधन
संदर्भ
- भारत के पर्यावरण नीति मंथन सम्मेलन में यह खुलासा हुआ कि वित्त वर्ष 2023–24 में 6.2 मिलियन टन ई-अपशिष्ट उत्पन्न हुआ।
परिचय
- भारत ने FY24 में 6.2 मिलियन टन ई-अपशिष्ट उत्पन्न किया, जो 2030 तक बढ़कर 14 मिलियन टन तक पहुँचने की संभावना है।
- औपचारिक पुनर्चक्रण क्षमता लगभग 2 मिलियन टन तक सीमित है, जिससे उत्पादन और प्रसंस्करण के बीच बड़ा अंतर बना हुआ है।
- परिणामस्वरूप केवल लगभग 10% ई-अपशिष्ट औपचारिक रूप से पुनर्चक्रित होता है, जो वैश्विक मानकों से काफी कम है।
- ई-अपशिष्ट में लगभग 33% धातुएँ होती हैं, जिनमें कीमती और महत्वपूर्ण खनिज शामिल हैं।
- भारत के ई-अपशिष्ट में निहित कुल आर्थिक मूल्य का अनुमान ₹51,000 करोड़ है, जिसमें से ₹30,600 करोड़ तकनीकी रूप से पुनः प्राप्त किया जा सकता है।
ई-अपशिष्ट क्या है?
- ई-अपशिष्ट से आशय त्यागे गए विद्युत और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से है, जैसे कंप्यूटर, सर्किट बोर्ड, मोबाइल फोन और घरेलू उपकरण।
- इसमें सीसा, पारा, कैडमियम और ब्रोमिनेटेड फ्लेम रिटार्डेंट जैसे खतरनाक पदार्थ होते हैं।
- अनुचित निपटान से मृदा प्रदूषण, जल प्रदूषण और स्वास्थ्य जोखिम उत्पन्न होते हैं।
भारत में ई-अपशिष्ट की स्थिति
- भारत विश्व में ई-अपशिष्ट का तीसरा सबसे बड़ा उत्पादक है, चीन और अमेरिका के बाद।
- ग्लोबल ई-अपशिष्ट मॉनिटर के अनुसार भारत में ई-अपशिष्ट उत्पादन 2020 में ~2.76 MMT से बढ़कर 2024 में ~6.19 MMT हुआ और 2030 तक 14 MMT तक पहुँचने का अनुमान है।
- कंप्यूटर उपकरण ई-अपशिष्ट का सबसे बड़ा हिस्सा (65%) बनाते हैं, इसके बाद बड़े उपकरण और चिकित्सा उपकरण (15%), दूरसंचार उपकरण (12%) और उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स (8%) आते हैं।
ई-अपशिष्ट प्रबंधन की चुनौतियाँ
- ई-अपशिष्ट में तीव्रता से वृद्धि: तकनीकी प्रगति और उत्पादों के छोटे जीवन चक्र के कारण ई-अपशिष्ट लगातार बढ़ रहा है।
- अनौपचारिक क्षेत्र का प्रभुत्व: भारत में 90–95% ई-अपशिष्ट अनौपचारिक क्षेत्र द्वारा असुरक्षित तरीकों (जैसे अम्ल लीचिंग और खुले में जलाना) से प्रसंस्कृत होता है।
- अपर्याप्त अवसंरचना: अधिकृत संग्रह केंद्रों और पुनर्चक्रण इकाइयों की सीमित संख्या, कमजोर लॉजिस्टिक्स और रिवर्स सप्लाई चेन प्रभावी संग्रहण में बाधा डालते हैं।
- कमज़ोर ट्रैकिंग: उत्पन्न मात्रा और पुनर्चक्रण दरों पर विश्वसनीय डेटा की कमी से अनौपचारिक चैनलों में रिसाव होता है।
अनुचित ई-अपशिष्ट प्रबंधन का प्रभाव
- जल प्रदूषण: साइनाइड और सल्फ्यूरिक एसिड से होने वाला विषाक्त उत्सर्जन जल निकायों को प्रभावित करता है।
- वायु प्रदूषण: सीसा धुएँ और प्लास्टिक जलाने से गंभीर उत्सर्जन होता है।
- मृदाप्रदूषण: खतरनाक पदार्थ मृदा में रिसकर कृषि और जैव विविधता को नुकसान पहुँचाते हैं।
- आर्थिक हानि: भारत को प्रत्येक वर्ष ₹80,000 करोड़ से अधिक मूल्य की महत्वपूर्ण धातुओं की हानि होती है।
- अनुमान है कि ई-अपशिष्ट पुनर्चक्रण क्षेत्र में औपचारिक लेखांकन और नियामक निगरानी की अनुपस्थिति के कारण भारत को कम से कम $20 बिलियन वार्षिक कर राजस्व की हानि होती है।
भारत में ई-अपशिष्ट प्रबंधन हेतु पहल
- विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व (EPR): उत्पादकों, आयातकों और ब्रांड मालिकों को उनके उत्पादों के जीवन-चक्र के अंत में उत्पन्न अपशिष्ट के प्रबंधन की जिम्मेदारी दी गई है।
- ऑनलाइन EPR ई-अपशिष्ट पोर्टल: केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) द्वारा विकसित, जहाँ उत्पादक, निर्माता, पुनर्चक्रक और पुनर्नवीनीकरणकर्ता पंजीकरण करते हैं।
- ई-अपशिष्ट (प्रबंधन) नियम, 2022: पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने 2016 के नियमों को संशोधित कर अधिसूचित किए।
- भारत का पहला ई-अपशिष्ट क्लिनिक: भोपाल, मध्य प्रदेश में उद्घाटित, जहाँ घरेलू और वाणिज्यिक इकाइयों से ई-अपशिष्ट का पृथक्करण, प्रसंस्करण एवं निपटान होता है।
- पैन-इंडिया ई-अपशिष्ट पुनर्चक्रण अभियान: खनन मंत्रालय द्वारा स्पेशल कैंपेन 5.0 (2025) के अंतर्गत शुरू किया गया, जिसका उद्देश्य सरकारी कार्यालयों में स्वच्छता को बढ़ावा देना और ई-अपशिष्ट से वैज्ञानिक निपटान व संसाधन पुनर्प्राप्ति सुनिश्चित करना है।
बेसल कन्वेंशन
- बेसल कन्वेंशन एक वैश्विक संधि है जिसका उद्देश्य खतरनाक अपशिष्ट की सीमा-पार आवाजाही और उसके निपटान को नियंत्रित करना है।
- यह सुनिश्चित करता है कि ऐसे अपशिष्ट का पर्यावरणीय रूप से सुरक्षित प्रबंधन हो।
- इसके प्रावधान:
- आयातक देशों की पूर्व-सूचित सहमति।
- खतरनाक अपशिष्ट का पर्यावरणीय रूप से सुरक्षित प्रबंधन।
- अवैध अपशिष्ट शिपमेंट को निर्यातक के खर्च पर वापस भेजना।
- इसे 1989 में अपनाया गया और 1992 में लागू किया गया। भारत इसका पक्षकार है।
आगे की राह
- भारत की ई-अपशिष्ट चुनौती तकनीकी प्रगति और पर्यावरणीय सततता के बीच व्यापक संघर्ष को दर्शाती है।
- जैसे-जैसे देश डिजिटल सीढ़ी चढ़ता है, उसे यह सुनिश्चित करना होगा कि विषाक्त अपशिष्ट उसकी आर्थिक और पारिस्थितिक नींव को कमजोर न करे।
- लक्ष्य केवल ई-अपशिष्ट का प्रबंधन करना नहीं होना चाहिए, बल्कि मूल्य निकालना, स्वास्थ्य की रक्षा करना और हरित आर्थिक विकास को बढ़ावा देना होना चाहिए।
स्रोत: DTE
Previous article
सतत विकास हेतु औद्योगिक ऊष्मा का डीकार्बोनाइजेशन
Next article
संक्षिप्त समाचार 06-05-2026