पाठ्यक्रम: GS2/शासन
समाचार में
- लोकसभा वर्तमान में संविधान (131वाँ संशोधन) विधेयक, 2026 पर चर्चा कर रही है, जिसमें लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के आकार एवं संरचना में वृद्धि का प्रस्ताव है।
संविधान संशोधन के बारे में
- यह संसद में प्रस्तुत एक विधायी प्रस्ताव है, जिसका उद्देश्य भारतीय संविधान के प्रावधानों में संशोधन, परिशिष्ट जोड़ना या उन्हें निरस्त करना होता है।
- संविधान संशोधन विधेयक संसद के किसी भी सदन (लोकसभा या राज्यसभा) में प्रस्तुत किया जा सकता है।
- केवल संसद को ही ऐसे विधेयक प्रस्तुत करने का अधिकार है; राज्य सरकारें इन्हें प्रस्तुत नहीं कर सकतीं।
संविधान संशोधन के प्रकार
- भारतीय संविधान में संशोधन की तीन प्रकार की प्रक्रियाएँ निर्धारित हैं, जो संशोधित किए जाने वाले प्रावधान की प्रकृति पर निर्भर करती हैं:
- सरल बहुमत (अनुच्छेद 368 के दायरे से बाहर):
- संसद में उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के 50% से अधिक मतों द्वारा पारित।
- सामान्य विधेयक की तरह।
- उदाहरण: नए राज्यों का निर्माण, सीमाओं में परिवर्तन (जैसे अनुच्छेद 4)।
- विशेष बहुमत (अनुच्छेद 368 के अंतर्गत मुख्य प्रक्रिया):
- प्रत्येक सदन के कुल सदस्यता का बहुमत तथा उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों का कम से कम 2/3 बहुमत आवश्यक।
- यह सबसे सामान्य संशोधन प्रक्रिया है और अनुच्छेद 368 की रीढ़ है।
- विशेष बहुमत + राज्यों की पुष्टि (अनुच्छेद 368 के अंतर्गत):
- कुछ संघीय प्रावधानों के लिए संसद में विशेष बहुमत और कम से कम आधे राज्यों की विधानसभाओं की स्वीकृति आवश्यक।
- ये प्रावधान संघीय संरचना से संबंधित होते हैं (जैसे राज्यों की शक्तियाँ, न्यायपालिका, प्रतिनिधित्व)।
- सरल बहुमत (अनुच्छेद 368 के दायरे से बाहर):

संविधान संशोधन का महत्व
- लोकतांत्रिक अनुकूलन: संविधान को बदलती सामाजिक-राजनीतिक वास्तविकताओं के अनुरूप बनाए रखता है।
- संघीय संतुलन: जनसंख्या परिवर्तनों के अनुसार प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करता है (जैसे नवीनतम जनगणना के आधार पर परिसीमन)।
- सामाजिक न्याय: महिलाओं के लिए विधानसभाओं में आरक्षण जैसे सुधारों को सक्षम बनाता है।
- राष्ट्रीय एकीकरण: “एक राष्ट्र, एक चुनाव” जैसी पहल को संभव बनाता है।
- संस्थागत सुदृढ़ीकरण: संसद और विधानसभाओं का विस्तार कर भारत की जनसंख्या वृद्धि को परिलक्षित करता है।
संशोधन प्रक्रिया में चुनौतियाँ
- राजनीतिक सहमति: खंडित राजनीति में दो-तिहाई बहुमत प्राप्त करना कठिन होता है।
- संघीय संवेदनशीलताएँ: राज्य उन संशोधनों का विरोध कर सकते हैं जिन्हें वे केंद्रीकरण की दिशा में मानते हैं।
- अत्यधिक उपयोग का जोखिम: बार-बार संशोधन संविधान की स्थिरता को कमजोर कर सकते हैं।
- न्यायिक समीक्षा: संशोधन को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा स्थापित मूल संरचना सिद्धांत का सम्मान करना आवश्यक है।
- जनसंख्या-आधारित प्रतिनिधित्व: परिसीमन से क्षेत्रीय असंतुलन उत्पन्न हो सकता है, जहाँ अधिक जनसंख्या वाले राज्यों को छोटे राज्यों की तुलना में अधिक सीटें मिलेंगी।
निष्कर्ष एवं आगे की राह
- संविधान संशोधन सहमति निर्माण पर आधारित होना चाहिए, जहाँ विपक्ष और राज्य सरकारों के साथ संवाद व्यापक समर्थन सुनिश्चित करे।
- प्रक्रिया में सार्वजनिक परामर्श और सार्थक संसदीय बहस के माध्यम से पारदर्शी विचार-विमर्श शामिल होना चाहिए ताकि वैधता सुदृढ़ हो।
- साथ ही, संशोधन संघवाद की रक्षा करें और केंद्र एवं राज्यों के बीच सहयोगी संबंधों को बढ़ावा दें, न कि उन्हें कमजोर करें।
- संविधान प्रावधानों की समय-समय पर समीक्षा का प्रावधान होना चाहिए ताकि सामाजिक और तकनीकी परिवर्तनों के साथ सामंजस्य बना रहे।
- सुधारों को शासन के आधुनिकीकरण और संविधान की स्थिरता एवं मूल्यों के संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित करना चाहिए।
स्रोत :TH