पाठ्यक्रम: GS2/ राजव्यवस्था और शासन
संदर्भ
- भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code) के समर्थन को पुनः दोहराते हुए यह टिप्पणी की कि एक समान नागरिक विधिक ढाँचा विवाह, तलाक और उत्तराधिकार से संबंधित विभिन्न समुदायों के व्यक्तिगत कानूनों से उत्पन्न जटिलताओं को दूर करने में सहायक होगा।
सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणियाँ
- न्यायालय के समक्ष याचिका में मुस्लिम व्यक्तिगत कानून (शरीयत) अधिनियम, 1937 की कुछ धाराओं को चुनौती दी गई है, यह तर्क देते हुए कि यह मुस्लिम महिलाओं के विरुद्ध उत्तराधिकार जैसे मामलों में भेदभाव करता है।
- न्यायालय ने कहा कि व्यक्तिगत कानून की धाराओं को निरस्त करने से उत्तराधिकार नियमों में विधिक शून्यता उत्पन्न हो सकती है।
- न्यायालय ने बल दिया कि समान नागरिक संहिता व्यक्तिगत कानूनों में समानता सुनिश्चित करने हेतु एक स्पष्ट और व्यापक समाधान प्रदान करेगी, जिसके लिए केवल न्यायिक निर्णय नहीं बल्कि विधायी कार्रवाई आवश्यक है।
समान नागरिक संहिता (UCC) क्या है?
- समान नागरिक संहिता का अर्थ है पूरे देश के लिए एक समान कानून, जो सभी धार्मिक समुदायों पर उनके व्यक्तिगत मामलों जैसे विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, गोद लेना आदि में लागू हो।
- उद्देश्य: विभिन्न धार्मिक समुदायों पर आधारित विविध व्यक्तिगत कानूनों को प्रतिस्थापित करना।
संवैधानिक प्रावधान
- संविधान के भाग IV में निहित अनुच्छेद 44 कहता है कि राज्य “भारत के समस्त क्षेत्र में नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने का प्रयास करेगा।”
- भाग IV में राज्य के नीति निदेशक तत्व सम्मिलित हैं, जो न्यायालय में प्रवर्तनीय नहीं हैं, परंतु शासन के लिए मौलिक माने जाते हैं।
भारत में समान नागरिक संहिता
- गोवा में UCC: यहाँ पुर्तगाली सिविल कोड, 1867 लागू है, जिसके अंतर्गत सभी धर्मों के लोग विवाह, तलाक और उत्तराधिकार के मामलों में समान कानूनों के अधीन हैं।
- गोवा, दमन और दीव प्रशासन अधिनियम, 1962: गोवा के 1961 में भारत में सम्मिलित होने के बाद इस अधिनियम द्वारा सिविल कोड लागू रखने की अनुमति दी गई।
- उत्तराखंड में UCC (2024): उत्तराखंड विधानसभा ने 2024 में उत्तराखंड समान नागरिक संहिता अधिनियम, 2024 पारित किया, जिससे स्वतंत्रता के बाद UCC अपनाने वाला प्रथम भारतीय राज्य बना।
UCC के पक्ष में तर्क
- शासन में एकरूपता: समान कानूनों से शासन और प्रशासनिक प्रक्रियाएँ सरल होंगी, जिससे न्याय वितरण एवं नागरिकों के अधिकार सुनिश्चित करना आसान होगा।
- महिलाओं के अधिकार: विभिन्न धर्मों के व्यक्तिगत कानूनों में महिलाओं के विरुद्ध भेदभावपूर्ण प्रावधान हैं; समान संहिता अधिक समानतावादी विधिक ढाँचा प्रदान करेगी।
- धर्मनिरपेक्षता: समान नागरिक संहिता सभी नागरिकों को उनके धार्मिक संबंधों से परे समान रूप से व्यवहार कर देश की धर्मनिरपेक्ष संरचना को सुदृढ़ करेगी।
- सर्वोच्च न्यायालय ने विभिन्न निर्णयों में, जिनमें मोहम्मद अहमद खान बनाम शाह बानो बेगम (1985) भी शामिल है, UCC के कार्यान्वयन का आह्वान किया है।
- राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा: UCC का कार्यान्वयन विविध समुदायों के लिए साझा मंच स्थापित कर भारत के एकीकरण को प्रोत्साहित करेगा।
UCC के विरुद्ध तर्क
- कार्यान्वयन की कठिनाई: भारत विविध धार्मिक समुदायों वाला देश है, जिनके अपने व्यक्तिगत कानून हैं, जिससे संहिता लागू करना कठिन है।
- यह तर्क दिया गया है कि जनजातीय समुदायों द्वारा पालन किए जाने वाले विवाह और मृत्यु संस्कार हिंदू रीति-रिवाजों से भिन्न हैं, तथा आशंका है कि इन प्रथाओं पर भी प्रतिबंध लग सकता है।
- कानून-व्यवस्था की चुनौती: इसे अल्पसंख्यकों पर अत्याचार माना जा सकता है और लागू होने पर देश में अशांति उत्पन्न हो सकती है।
- संवैधानिक प्रावधानों के विरुद्ध: UCC को अनुच्छेद 25 और 26 तथा संविधान की छठी अनुसूची में निहित धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन माना जाता है।
आगे की राह
- व्यापक सामाजिक सहमति का निर्माण: सरकार को धार्मिक नेताओं, विधि विशेषज्ञों, नागरिक समाज समूहों और अल्पसंख्यक समुदायों से व्यापक परामर्श करना चाहिए ताकि ढाँचा भारत की बहुलतावादी प्रकृति को प्रतिबिंबित करे तथा आशंकाएँ कम हों।
- लैंगिक न्याय पर ध्यान: प्राथमिक उद्देश्य व्यक्तिगत कानूनों में भेदभावपूर्ण प्रावधानों को हटाना होना चाहिए, विशेषकर विवाह, तलाक, भरण-पोषण और उत्तराधिकार से संबंधित मामलों में महिलाओं को प्रभावित करने वाले प्रावधानों को।
स्रोत: IE