पाठ्यक्रम: GS2/राजव्यवस्था; स्वास्थ्य
संदर्भ
- सर्वोच्च न्यायालय ने सर्वप्रथम निष्क्रिय इच्छामृत्यु के सिद्धांतों को व्यवहार में लागू करते हुए 32 वर्षीय हरीश राणा के लिए क्लिनिकली-असिस्टेड न्यूट्रिशन एंड हाइड्रेशन (CANH) हटाने की अनुमति प्रदान की।
परिचय
- न्यायालय ने यह निर्धारित किया कि:
- जीवन रक्षक उपकरणों को हटाना रोगी के “सर्वोत्तम हित” में होना चाहिए।
- मार्गदर्शक कारकों में यह शामिल है कि रोगी को दी जा रही जीवन रक्षक सहायता क्या वास्तव में चिकित्सीय उपचार की श्रेणी में आती है;
- क्या दवाओं का कोई चिकित्सीय लाभ है या वे केवल जीवन, पीड़ा और कष्ट को लंबा करने का कार्य करती हैं;
- और क्या रोगी के हित में कृत्रिम रूप से जीवन को लंबा करना उचित होगा।
- न्यायालय ने कहा कि रोगी की देखभाल संवेदनशीलता के साथ की जानी चाहिए और उसकी गरिमा को सर्वोच्च महत्व दिया जाना चाहिए।
- यह निर्णय स्पष्ट रूप से यह सीमा निर्धारित करता है कि कब प्राकृतिक मृत्यु को होने दिया जाए।
- पीठ ने यह भी उल्लेख किया कि देश में जीवन-समाप्ति देखभाल (End-of-Life Care) पर कोई व्यापक कानून नहीं है और केंद्र सरकार से इस संबंध में विधेयक लाने का आग्रह किया।
इच्छामृत्यु (Euthanasia)
- इच्छामृत्यु का अर्थ है किसी व्यक्ति के जीवन को जानबूझकर समाप्त करना ताकि उसके दर्द या कष्ट को दूर किया जा सके।
- नैतिकताविद सक्रिय और निष्क्रिय इच्छामृत्यु में अंतर करते हैं।
- निष्क्रिय इच्छामृत्यु: इसमें जानबूझकर चिकित्सीय हस्तक्षेप, जैसे जीवन रक्षक उपकरण, को रोकने या हटाने का निर्णय लिया जाता है ताकि व्यक्ति की प्राकृतिक मृत्यु हो सके।
- सक्रिय इच्छामृत्यु: इसमें डॉक्टर द्वारा स्वेच्छा से अनुरोध करने वाले असाध्य रोगी को सीधे हस्तक्षेप कर मृत्यु देना शामिल है। यह भारत में अवैध है।
विधिक स्थिति
- सर्वोच्च न्यायालय ने 2018 में निष्क्रिय इच्छामृत्यु को वैध किया था, बशर्ते व्यक्ति के पास “लिविंग विल” हो।
- न्यायालय ने माना कि ‘गरिमा के साथ मरने का अधिकार’ संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत जीवन के अधिकार का हिस्सा है।
- लिविंग विल: यह एक लिखित दस्तावेज़ है जिसमें व्यक्ति यह निर्दिष्ट करता है कि भविष्य में यदि वह स्वयं चिकित्सा संबंधी निर्णय लेने में असमर्थ हो जाए तो उसके लिए कौन-से कदम उठाए जाएँ।
सहायक मृत्यु (Assisted Dying) के पक्ष में तर्क
- स्वायत्तता और विकल्प: व्यक्तियों को अपने जीवन के बारे में निर्णय लेने का अधिकार होना चाहिए, जिसमें लंबे समय तक कष्ट से बचने हेतु जीवन समाप्त करने का विकल्प भी शामिल है।
- कष्ट से मुक्ति: असाध्य रोगों या असहनीय दर्द से पीड़ित लोगों को गरिमा के साथ मृत्यु का करुणामय विकल्प मिलता है।
- व्यक्तिगत अधिकारों का सम्मान: लोगों को अपने शरीर और जीवन पर नियंत्रण होना चाहिए, जिसमें मानवीय और नियंत्रित तरीके से जीवन समाप्त करने का निर्णय भी शामिल है।
सहायक मृत्यु के विरुद्ध तर्क
- नैतिक और धार्मिक चिंताएँ: कई लोग मानते हैं कि जीवन लेना, भले ही व्यक्ति के अनुरोध पर हो, नैतिक रूप से गलत है और जीवन की पवित्रता के विरुद्ध है।
- दुरुपयोग का जोखिम: मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे या पारिवारिक दबाव का सामना कर रहे कमजोर व्यक्तियों को सहायक मृत्यु चुनने के लिए बाध्य किया जा सकता है।
- चिकित्सकीय नैतिकता: स्वास्थ्यकर्मी जीवन बचाने के लिए प्रतिबद्ध होते हैं, और सहायक मृत्यु उनकी मूल भूमिका से टकरा सकती है।
- वैकल्पिक समाधान: तर्क दिया जाता है कि उपशामक देखभाल (Palliative Care) और दर्द प्रबंधन पर्याप्त राहत दे सकते हैं, जिससे सहायक मृत्यु की आवश्यकता नहीं रहती।
आगे की राह
- उपशामक देखभाल का विस्तार: उच्च गुणवत्ता वाली उपशामक देखभाल तक पहुँच बढ़ाना ताकि कष्ट कम हो और सहायक मृत्यु की मांग घटे।
- सार्वजनिक विमर्श: सहायक मृत्यु के नैतिक, विधिक और धार्मिक पहलुओं पर निरंतर चर्चा, जिससे दिशा-निर्देश तैयार करने में सहायता मिले।
- अंतर्राष्ट्रीय दृष्टिकोण: वे देश जहाँ सहायक मृत्यु वैध है (जैसे नीदरलैंड, कनाडा), उनके अनुभवों से प्रभावी विनियमन और सुरक्षा उपायों पर मार्गदर्शन लिया जा सकता है।
- मानसिक स्वास्थ्य सहयोग: मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन उपलब्ध कराना ताकि दबाव या आवेगपूर्ण निर्णयों को रोका जा सके तथा सुनिश्चित किया जा सके कि सहमति सूचित और स्वतंत्र रूप से दी गई है।
स्रोत: DD