सर्वोच्च न्यायालय द्वारा न्यायिक भ्रष्टाचार पर NCERT अध्याय पर प्रतिबंध लगाया

पाठ्यक्रम: GS2/राजव्यवस्था और शासन

संदर्भ

  • हाल ही में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने कक्षा 8 की NCERT पाठ्यपुस्तक में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार से संबंधित अध्याय पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया है और अनुपालन न होने की स्थिति में ‘कठोर कार्रवाई’ की चेतावनी दी है।

सर्वोच्च न्यायालय के अवलोकन

  • मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने निम्नलिखित प्रमुख अवलोकन किए:
    • अध्याय का समावेश ‘संस्था को कमजोर करने की सुनियोजित चाल’ प्रतीत होता है।
    • यह न्यायपालिका की प्रतिष्ठा को कम करने की क्षमता के कारण आपराधिक अवमानना के अंतर्गत आ सकता है।
    • यह विषय गहन जांच की मांग करता है।
    • यदि इसे अनियंत्रित छोड़ दिया गया तो ऐसे कदम न्यायपालिका में जनविश्वास को कमजोर कर सकते हैं।
    • न्यायालय ने संस्थागत उत्तरदायित्व पर बल दिया: ‘जिम्मेदारों को जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए’
  • सॉलिसिटर जनरल ने शिक्षा मंत्रालय की ओर से बिना शर्त और बिना किसी आरक्षण के क्षमा याचना प्रस्तुत की।

संवैधानिक एवं विधिक आयाम

  • न्यायपालिका की स्वतंत्रता: केसवानंद भारती मामले में प्रतिपादित मूल संरचना सिद्धांत का हिस्सा।
    • यह कार्यपालिका और विधायिका के हस्तक्षेप से स्वायत्तता सुनिश्चित करता है।
    • विधि के शासन और संवैधानिक सर्वोच्चता के लिए आवश्यक।
    • न्यायालय इस अध्याय को संस्थागत स्वतंत्रता को कमजोर करने का प्रयास मानता है।
  • न्यायालय की अवमानना: न्यायालय की अवमानना ​​अधिनियम, 1971 द्वारा शासित। आपराधिक अवमानना में वे कृत्य शामिल हैं जो:
    • न्यायालय की प्रतिष्ठा को कलंकित या कम करते हैं,
    • न्यायिक कार्यवाही में हस्तक्षेप करते हैं,
    • न्याय प्रशासन में बाधा डालते हैं।
    • पीठ ने संकेत दिया कि अध्याय इस परिभाषा में आ सकता है।
  • अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बनाम संस्थागत अखंडता:
    • अनुच्छेद 19(1)(a) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी देता है।
    • अनुच्छेद 19(2) के अंतर्गत युक्तिसंगत प्रतिबंधों में न्यायालय की अवमानना, मानहानि और लोक व्यवस्था शामिल हैं।
    • यह मुद्दा शैक्षणिक विमर्श एवं संस्थाओं की आलोचना और न्यायपालिका की गरिमा एवं अधिकार की रक्षा के बीच तनाव को उजागर करता है।
  • NCERT एवं पाठ्यचर्या शासन की भूमिका:
    • NCERT राष्ट्रीय पाठ्यचर्या ढाँचे विकसित करता है।
    • पाठ्यचर्या की सामग्री प्रायः राजनीतिक और संवैधानिक रूप से संवेदनशील होती है।
    • विचारधारा, इतिहास और संवैधानिक मूल्यों से संबंधित मामलों में पाठ्यपुस्तकों की न्यायिक समीक्षा पूर्व में भी हुई है।
    • यह घटना पाठ्यचर्या पर्यवेक्षण तंत्र, शैक्षणिक जवाबदेही और संस्थागत परामर्श प्रक्रियाओं पर प्रश्न उठाती है।
  • शासन एवं संस्थागत विश्वास:
    • सर्वोच्च न्यायालय ने बल दिया कि अनियंत्रित कदम न्यायपालिका में जनविश्वास को कमजोर कर सकते हैं।
    • लोकतंत्र में न्यायालय अपनी वैधता जनविश्वास से प्राप्त करते हैं और रचनात्मक आलोचना संस्थाओं को सुदृढ़ करती है।
    • किंतु निराधार या सनसनीखेज आरोप संस्थागत विश्वसनीयता को कमजोर कर सकते हैं।
    • संतुलन बनाए रखना लोकतांत्रिक स्थिरता के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
भारत में न्यायिक भ्रष्टाचार
न्यायिक भ्रष्टाचार का अर्थ है निजी लाभ हेतु न्यायिक अधिकार का दुरुपयोग, जिसमें रिश्वतखोरी, पक्षपात, नियुक्तियों में प्रभाव एवं मामलों में हेरफेर शामिल हैं।
भारत में न्यायपालिका की संवैधानिक स्थिति
भारत में उच्च न्यायपालिका संवैधानिक स्वतंत्रता का आनंद लेती है, किंतु समय-समय पर पारदर्शिता, जवाबदेही और नैतिक मानकों को लेकर चिंताएँ उठती रही हैं।
अनुच्छेद 50: न्यायपालिका को कार्यपालिका से पृथक करना।
अनुच्छेद 124–147: सर्वोच्च न्यायालय की संरचना एवं स्वतंत्रता।
अनुच्छेद 214–231: उच्च न्यायालय।
अनुच्छेद 129 एवं 215: अवमानना के लिए दंडित करने की शक्ति।
मूल संरचना सिद्धांत: न्यायिक स्वतंत्रता इसका हिस्सा है।
न्यायिक स्वतंत्रता विधि के शासन के लिए आवश्यक है, किंतु जवाबदेही के बिना स्वतंत्रता संस्थागत अलगाव का जोखिम उत्पन्न करती है।
प्रमुख संस्थागत चिंताएँ
नियुक्ति प्रक्रिया (कोलेजियम प्रणाली): तीन न्यायाधीश मामलों के माध्यम से विकसित कोलेजियम प्रणाली को पारदर्शिता की कमी के लिए आलोचना मिली है।
यह अस्पष्टता और अभिजात्य वर्चस्व को बढ़ावा देती है।
अवमानना अधिकार क्षेत्र: न्यायपालिका की ‘न्यायालय को कलंकित करने’ हेतु दंडित करने की शक्ति कभी-कभी जवाबदेही और संस्थागत संरक्षण के बीच तनाव उत्पन्न करती है।
इन-हाउस तंत्र: आंतरिक न्यायिक जांच प्रक्रियाओं में वैधानिक आधार और पारदर्शिता का अभाव है।

स्रोत: TH

 

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