‘भारतीय वैज्ञानिक सेवा’ के माध्यम से विभाजन का समापन

पाठ्यक्रम: GS2/शासन

संदर्भ

  • भारत की स्वतंत्रता-उपरांत सामान्य प्रशासनिक सेवा नियम, जो कभी राष्ट्र-निर्माण के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण थे, अब प्रौद्योगिकी-प्रधान और जटिल पर्यावरणीय चुनौतियों वाले युग में प्रभावी वैज्ञानिक शासन में बाधा उत्पन्न कर रहे हैं।

मूल समस्या

  • सरकार में प्रवेश करने वाले वैज्ञानिकों पर सामान्य सिविल सेवा नियम लागू होते हैं।
  • प्रशासनिक प्रणालियाँ पदानुक्रम, एकरूपता और प्रक्रियात्मक अनुपालन को प्राथमिकता देती हैं।
  • वैज्ञानिक कार्य हेतु साक्ष्य-आधारित तर्क, पारदर्शिता, सहकर्मी समीक्षा और अनिश्चितताओं पर खुली चर्चा आवश्यक होती है।
  • यह असंगति नीतिनिर्माण में वैज्ञानिक विशेषज्ञता के प्रभावी उपयोग को कमजोर करती है।

इस प्रणाली का प्रभाव

  • वैज्ञानिक परामर्श संस्थागत होने के बजाय प्रतिक्रियात्मक बना रहता है।
  • विशेषज्ञों को दीर्घकालिक जोखिम दर्ज करने या भिन्न तकनीकी मत प्रस्तुत करने की स्वायत्तता प्रायः नहीं मिलती।
  • विज्ञान निर्णय-निर्माण में केंद्रीय होने के बजाय परामर्शात्मक और परिधीय बन जाता है।
  • सीमित कैरियर गतिशीलता और मान्यता, शीर्ष वैज्ञानिक प्रतिभाओं को शासन भूमिकाओं में प्रवेश करने से हतोत्साहित करती है।

अंतर्राष्ट्रीय शासन मॉडल

  • कई उन्नत लोकतंत्रों में सरकार के अंदर समर्पित वैज्ञानिक कैडर या परामर्श प्रणाली होती है। ये प्रणालियाँ:
    • वैज्ञानिक अखंडता की रक्षा करती हैं।
    • नीतिनिर्माण में विशेषज्ञ योगदान को संस्थागत करती हैं।
    • लोकतांत्रिक अधिकार और तकनीकी विशेषज्ञता के बीच संतुलन स्थापित करती हैं।
  • भारत में ऐसी विशेषीकृत शासन संरचना का अभाव है।

सुधारों की आवश्यकता

  • शासन की बदलती प्रकृति: आधुनिक नीतिनिर्माण में जलवायु विज्ञान, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, जैव प्रौद्योगिकी, महामारी विज्ञान और पर्यावरणीय जोखिम जैसे क्षेत्रों में विशेष वैज्ञानिक विशेषज्ञता की आवश्यकता होती है।
  • सेवा नियमों में असंगति: वर्तमान सामान्य सिविल सेवा नियम वैज्ञानिक पद्धतियों, सहकर्मी समीक्षा संस्कृति या अनिश्चितताओं के दस्तावेज़ीकरण को समायोजित करने हेतु निर्मित नहीं हैं।
  • वैज्ञानिक परामर्श का कमजोर एकीकरण: वैज्ञानिक योगदान संरचनात्मक रूप से निर्णय-निर्माण में अंतर्निहित होने के बजाय परामर्शात्मक और प्रतिक्रियात्मक बना रहता है।
  • दीर्घकालिक जोखिम आकलन की कमी: जलवायु परिवर्तन, जल संकट, महामारी और तकनीकी व्यवधान जैसे मुद्दों हेतु दीर्घकालिक पूर्वानुमान आवश्यक है, जिसके लिए प्रशासनिक प्रणालियाँ संरचनात्मक रूप से सक्षम नहीं हैं।
  • वैज्ञानिक अखंडता की सुरक्षा: वैज्ञानिकों को संस्थागत सुरक्षा की आवश्यकता है ताकि वे साक्ष्य-आधारित मत प्रस्तुत कर सकें, बिना नौकरशाही या राजनीतिक दबाव के।
  • प्रतिभा आकर्षण और संरक्षण: स्पष्ट कैरियर प्रगति और मान्यता के अभाव में शीर्ष वैज्ञानिक पेशेवर सार्वजनिक नीति भूमिकाओं में प्रवेश करने से हतोत्साहित होते हैं।
  • वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाएँ: कई उन्नत लोकतंत्रों ने शासन में वैज्ञानिक कैडर को संस्थागत किया है, जबकि भारत में ऐसी संरचित व्यवस्था का अभाव है।

आगे की राह

  • भारतीय वैज्ञानिक सेवा (ISS) का निर्माण: सरकार के अंदर एक समर्पित वैज्ञानिक कैडर स्थापित किया जाए। प्रमुख विशेषताएँ:
    • वैज्ञानिक योग्यता के आधार पर पृथक भर्ती।
    • स्वतंत्र पेशेवर मूल्यांकन प्रणाली।
    • स्पष्ट कैरियर प्रगति मार्ग।
    • वैज्ञानिक स्वतंत्रता हेतु सुरक्षा उपाय।
    • मंत्रालयों और नियामक निकायों में वैज्ञानिकों का प्रत्यक्ष समावेश।
  • संस्थागत परिप्रेक्ष्य: भारत ने हाल ही में अनुसंधान वित्तपोषण को सुदृढ़ करने हेतु अनुसंधान राष्ट्रीय अनुसंधान फाउंडेशन (ANRF) की स्थापना की है।
    • तथापि, ANRF का ध्यान अनुसंधान प्रोत्साहन पर है, शासन संरचनाओं में वैज्ञानिकों के समावेश पर नहीं।
    • अतः नीति एकीकरण हेतु पृथक वैज्ञानिक सेवा की आवश्यकता है।

स्रोत: TH

 

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