जैव-आधारित रसायन और एंज़ाइम: भारत की जैव-अर्थव्यवस्था में एक नया आयाम

पाठ्यक्रम: GS3/ विज्ञान और प्रौद्योगिकी/ पर्यावरण/ अर्थव्यवस्था

संदर्भ

  • भारत, जलवायु कार्रवाई, औद्योगिक विकास और ग्रामीण आय विविधीकरण को समन्वित करते हुए, हरित जैव-अर्थव्यवस्था के प्रमुख स्तंभों के रूप में जैव-आधारित रसायनों एवं एंज़ाइमों को प्रोत्साहित कर रहा है।

जैव-आधारित रसायन और एंज़ाइम क्या हैं?

  • जैव-आधारित रसायन:  जैव-आधारित रसायन वे औद्योगिक रसायन हैं जो जैविक कच्चे माल जैसे गन्ना, मक्का, स्टार्च, कृषि अवशेष या अन्य प्रकार की बायोमास से तैयार किए जाते हैं।
    • इनका निर्माण किण्वन, सूक्ष्मजीवी प्रक्रियाओं या एंज़ाइमीय मार्गों के माध्यम से किया जाता है, जिससे जीवाश्म ईंधन-आधारित कच्चे माल का स्थान लिया जा सके।
    • उदाहरणस्वरूप: कार्बनिक अम्ल (जैसे लैक्टिक अम्ल), जैव-अल्कोहल, विलायक, सर्फेक्टेंट तथा प्लास्टिक, सौंदर्य प्रसाधन और औषधियों में प्रयुक्त मध्यवर्ती रसायन।
  • एंज़ाइम: एंज़ाइम जैविक उत्प्रेरक होते हैं जो हल्की परिस्थितियों में रासायनिक अभिक्रियाओं को तीव्र करते हैं।
    • ये सामान्यतः कम तापमान और दबाव पर कार्य करते हैं, जिससे ऊर्जा की खपत एवं उत्सर्जन कम होता है।
    • इनका व्यापक उपयोग डिटर्जेंट, खाद्य एवं पेय प्रसंस्करण, औषधि एवं टीका निर्माण, वस्त्र एवं चमड़ा प्रसंस्करण, कागज़ एवं गूदा उद्योग तथा उन्नत जैव-निर्माण में होता है।

भारत को जैव-आधारित रसायनों की आवश्यकता क्यों है?

  • आयात निर्भरता कम करना: भारत कई औद्योगिक मध्यवर्ती रसायनों के लिए पेट्रोकेमिकल आयात पर निर्भर है। उदाहरणस्वरूप, भारत ने 2023 में लगभग 479.8 मिलियन अमेरिकी डॉलर मूल्य का एसीटिक अम्ल आयात किया।
    •  जैव-आधारित विकल्प अस्थिर जीवाश्म ईंधन बाज़ारों पर निर्भरता कम कर सकते हैं।
  • कृषि शक्ति का लाभ उठाना: भारत के पास विशाल कृषि आधार है जो बायोमास कच्चे माल की आपूर्ति कर सकता है। इससे अवसर उत्पन्न होते हैं:
    • किसानों की आय में विविधता।
    • फसल अवशेषों में मूल्य संवर्धन।
    • ग्रामीण जैव-औद्योगिक समूहों का विकास।
  • जलवायु प्रतिबद्धताओं को सुदृढ़ करना: जैव-आधारित रसायन भारत की नेट ज़ीरो प्रतिबद्धताओं और सर्कुलर अर्थव्यवस्था लक्ष्यों के अनुरूप हैं। ये जीवाश्म-आधारित उत्पादों की तुलना में जीवनचक्र कार्बन उत्सर्जन को कम करते हैं।
  • औद्योगिक प्रतिस्पर्धात्मकता: भारत के पास किण्वन प्रौद्योगिकियों में गहन विशेषज्ञता है, जो इसकी सुदृढ़ औषधि और टीका पारिस्थितिकी तंत्र से जुड़ी है।
    • जैव-निर्माण का विस्तार भारत को सतत औद्योगिक इनपुट का वैश्विक आपूर्तिकर्ता बना सकता है।

भारत में नीतिगत ढाँचा

  • BioE3 नीति: जैव प्रौद्योगिकी विभाग ने BioE3 (अर्थव्यवस्था, पर्यावरण और रोजगार के लिए जैव प्रौद्योगिकी) नीति के अंतर्गत जैव-आधारित रसायनों एवं एंज़ाइमों को प्राथमिकता दी है। इसका ध्यान केंद्रित है:
    • जैव-निर्माण अवसंरचना।
    • प्रौद्योगिकी रूपांतरण और विस्तार।
    • रोजगार सृजन।
  • Bio-RIDE योजना: ₹9,197 करोड़ का प्रावधान, जो जैव प्रौद्योगिकी अनुसंधान और औद्योगिक विकास को समर्थन देता है, जिसमें जैव-निर्माण एवं जैव-फाउंड्री के लिए विशेष घटक शामिल है।
  • अवसंरचना विकास: जैव-निर्माण हब और Bio-AI हब की स्थापना, ताकि प्रयोगशाला से बाज़ार तक सतत सामग्रियों के संक्रमण को तीव्र किया जा सके।

वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाएँ

  • यूरोपीय संघ (EU): EU जैव-अर्थव्यवस्था रणनीति और कार्य योजना, सर्कुलर जैव-अर्थव्यवस्था लक्ष्यों के हिस्से के रूप में जैव-आधारित रसायनों को समन्वित समर्थन प्रदान करती है।
    • यह औद्योगिक रूपांतरण को जलवायु लक्ष्यों, अपशिष्ट कमी और सतत विकास से जोड़ती है।
  • संयुक्त राज्य अमेरिका (US): USDA बायोप्रेफ़र्ड कार्यक्रम, प्रमाणित जैव-आधारित उत्पादों (रसायन और एंज़ाइम सहित) के लिए संघीय खरीद प्राथमिकता अनिवार्य करता है, जिससे उत्पादकों के लिए प्रारंभिक बाज़ार तैयार होते हैं।
  • चीन: चीन की जैव-अर्थव्यवस्था विकास योजनाएँ उच्च-मूल्य वाले जैव-आधारित रसायनों और एंज़ाइम प्रौद्योगिकियों को रणनीतिक क्षेत्रों के रूप में प्राथमिकता देती हैं।
  • जापान: METI/NARO द्वारा वित्तपोषित प्राथमिक परियोजनाएँ, जैव-आधारित रसायन अनुसंधान को विनिर्माण तत्परता के साथ एकीकृत करती हैं।

जैव-आधारित रसायन क्षेत्र के विकास में जोखिम

  • लागत प्रतिस्पर्धा: जैव-आधारित उत्पादों की उत्पादन लागत, उनके पेट्रोकेमिकल समकक्षों की तुलना में अधिक होती है।
    • यह लागत असमानता, विस्तार के प्रारंभिक चरणों में निजी निवेश के लिए अस्थायी बाधा उत्पन्न कर सकती है।
  • कच्चे माल की उपलब्धता: विश्वसनीय, सतत और सुलभ बायोमास आपूर्ति श्रृंखलाएँ अभी भी एक चुनौती हैं।
    • खाद्य और पशु आहार जैसे अन्य क्षेत्रों से कच्चे माल के लिए तीव्र प्रतिस्पर्धा, रासायनिक उत्पादन हेतु कच्चे माल की उपलब्धता को सीमित कर सकती है।
  • बाज़ार अंगीकरण: यह चिंता बनी हुई है कि क्या जैव-आधारित रसायन वर्तमान विनिर्माण प्रक्रियाओं में सहजता से प्रतिस्थापित हो सकते हैं और क्या डाउनस्ट्रीम निर्माता, लागत तुलनीय होने पर भी, परिवर्तन के लिए तैयार होंगे।

आगे की राह

  • साझा जैव-निर्माण अवसंरचना जैसे जैव-फाउंड्री, पायलट संयंत्र और प्रदर्शन सुविधाओं का विकास, ताकि पूँजीगत जोखिम कम किए जा सकें।
  • सुदृढ़ मानक, प्रमाणन प्रणाली और कार्बन लेखांकन ढाँचे स्थापित करना, ताकि बाज़ार में विश्वास निर्मित हो।
  • उत्पादकता और लागत दक्षता बढ़ाने हेतु सिंथेटिक बायोलॉजी, एंज़ाइम इंजीनियरिंग तथा Bio-AI एकीकरण में अनुसंधान एवं विकास को प्रोत्साहित करना।

स्रोत: TH

 

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