भारत की कृषि-वनीकरण महत्वाकांक्षाएँ एवं वित्तपोषण तथा नीतिगत बाधाएँ

पाठ्यक्रम: GS3/पर्यावरण

संदर्भ

  • हाल ही में विशेषज्ञों ने प्रथम दक्षिण एशियाई कृषि-वनीकरण एवं वन क्षेत्र से बाहर वृक्ष (AF-TOF) कांग्रेस के दौरान यह रेखांकित किया कि भारत का कृषि-वनीकरण वित्तीय पहुँच, नीतिगत क्रियान्वयन और किसानों की जागरूकता के मामले में गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहा है।
दक्षिण एशियाई कृषि-वनीकरण एवं वन क्षेत्र से बाहर वृक्ष (AF-TOF) कांग्रेस
– इसे ट्रीस्केप्स 2026 कांग्रेस  कहा गया।
– यह दक्षिण एशिया में कृषि-वनीकरण और वन क्षेत्र से बाहर वृक्षों (TOF) को आगे बढ़ाने हेतु समर्पित पहला क्षेत्रीय मंच था।
– इसका आयोजन अंतर्राष्ट्रीय वानिकी अनुसंधान और विश्व कृषि वानिकी केंद्र (CIFOR-ICRAF) ने भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के सहयोग से किया।

कृषि-वनीकरण के बारे में

  • यह एक भूमि-उपयोग प्रणाली है जिसमें एक ही भूमि पर वृक्षों को फसलों और/या पशुधन के साथ एकीकृत किया जाता है।
  • यह खाद्य सुरक्षा, मृदा स्वास्थ्य, जैव विविधता, कार्बन अवशोषण और किसानों के लिए आय विविधीकरण को बढ़ाता है।
  • यह भूमि क्षरण और जलवायु जोखिमों से निपटने में सहायक है।

वर्तमान स्थिति एवं भविष्य की परिकल्पना 

  • वर्तमान में भारत में लगभग 2.8 करोड़ हेक्टेयर भूमि कृषि-वनीकरण के अंतर्गत है, और सरकार का लक्ष्य 2050 तक इसे 5 करोड़ हेक्टेयर तक विस्तारित करना है।
  • वृक्ष-आधारित प्रणालियाँ भारत के राष्ट्रीय कार्बन भंडार का लगभग 20% हिस्सा हैं।

संबंधित मुद्दे एवं चिंताएँ 

  • वित्तीय पहुँच की कमी: लगभग ₹20 लाख करोड़ वार्षिक संस्थागत कृषि ऋण में से 5% से भी कम कृषि-वनीकरण तक पहुँचता है।
    • कारण:
      • लंबी परिपक्वता अवधि (5–30 वर्ष)।
      • भूमि अधिकार और स्वामित्व की जटिलताएँ।
      • स्वीकार्य संपार्श्विक का अभाव।
  • नीतिगत जागरूकता की कमी: किसानों में राष्ट्रीय कृषि-वनीकरण नीति, 2014 के प्रति कम जागरूकता, विशेषकर:
    • वृक्ष कटाई अधिकार।
    • पारगमन और नियामक स्वीकृतियाँ।
  • कमज़ोर नीतिगत क्रियान्वयन: यद्यपि कृषि-वनीकरण को जलवायु और आजीविका के अनुकूल माना जाता है, फिर भी संस्थागत एवं वित्तीय समर्थन की कमी के कारण इसका विस्तार और प्रभाव सीमित है।
  • आर्थिक अवसरों का अभाव: भारत प्रतिवर्ष $7 बिलियन से अधिक मूल्य की लकड़ी आयात करता है, जो घरेलू संसाधनों के अपर्याप्त उपयोग और किसानों व हरित अर्थव्यवस्था के लिए खोए हुए अवसर को दर्शाता है।

भारत में कृषि-वनीकरण हेतु प्रयास 

  • राष्ट्रीय कृषि-वनीकरण नीति, 2014: वृक्ष-आधारित खेती को बढ़ावा देने हेतु विश्व की प्रथम नीति।
  • ICAR-नेतृत्व वाले अनुसंधान और क्षेत्रीय अध्ययन: प्रमाण बताते हैं कि कृषि-वनीकरण वनों की कटाई को कम करने और प्रतिवर्ष करोड़ों टन ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन से बचने में सहायक है।
  • AF-TOF/Treescapes कांग्रेस: नीति-निर्माताओं, शोधकर्ताओं, वित्तीय संस्थानों, उद्योग, किसानों और युवाओं को शामिल करने वाला क्षेत्रीय मंच, जो शासन एवं निवेश ढाँचे को सुदृढ़ करता है।

आगे की राह 

  • लंबी परिपक्वता वाले वृक्ष प्रणालियों के लिए अनुकूलित वित्तीय उत्पादों के माध्यम से संस्थागत ऋण प्रवाह में सुधार।
  • वृक्ष कटाई और पारगमन पर विनियमों को सरल बनाना, स्पष्ट एवं किसान-हितैषी दिशा-निर्देशों के साथ।
  • बुनियादी स्तर पर कृषि-वनीकरण नीतियों की जागरूकता बढ़ाना।
  • कार्बन बाज़ार और डिजिटल उपकरणों का उपयोग: कार्बन क्रेडिट, डिजिटल ट्रेसबिलिटी और निजी क्षेत्र की खरीद को छोटे किसानों की वास्तविकताओं के अनुरूप बनाना।
  • आयात निर्भरता कम करना: घरेलू लकड़ी और वृक्ष-आधारित मूल्य श्रृंखलाओं को बढ़ावा देना, जिससे ग्रामीण आय सुदृढ़ हो, विशेषकर भारत के 86% सीमांत किसानों के लिए।
  • जलवायु, कृषि और व्यापार नीतियों को संरेखित करना, ताकि कृषि-वनीकरण की आय सृजन, जलवायु शमन और पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं की क्षमता को खोला जा सके।

Source: DTE

 

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