पाठ्यक्रम: GS1/समाज ; GS2/शासन
संदर्भ
- राष्ट्रीय बालिका दिवस प्रतिवर्ष 24 जनवरी को मनाया जाता है।
परिचय
- राष्ट्रीय बालिका दिवस 2008 से प्रतिवर्ष 24 जनवरी को मनाया जा रहा है।
- मंत्रालय: महिला एवं बाल विकास मंत्रालय (MWCD)।
- यह भारत में बालिकाओं के अधिकारों, सशक्तिकरण और समान अवसरों के प्रति जागरूकता को बढ़ावा देता है।
भारत में बालिकाओं के अधिकार सुनिश्चित करने में चुनौतियाँ
- पुत्र वरीयता की सांस्कृतिक प्रवृत्ति: पुत्रों को परिवार का नाम आगे बढ़ाने, धार्मिक अनुष्ठान करने और वृद्धावस्था में आर्थिक सहारा देने के लिए प्राथमिकता दी जाती थी।
- इससे पुत्रियों की उपेक्षा हुई, जिन्हें दहेज प्रथा के कारण आर्थिक भार माना जाता था।
- लैंगिक भेदभाव: बालिकाओं को पोषण, शिक्षा और स्वास्थ्य के मामले में ऐतिहासिक रूप से उपेक्षित किया गया, जिससे महिलाओं में मृत्यु दर अधिक रही।
- कन्या भ्रूण हत्या: कुछ क्षेत्रों में बालिकाओं को कम मूल्यवान समझकर त्याग दिया जाता था या उनकी हत्या कर दी जाती थी।
- लिंग-चयनात्मक गर्भपात: अल्ट्रासाउंड जैसी चिकित्सा तकनीकों ने लिंग-चयनात्मक गर्भपात को संभव बनाया, जिससे पुत्र जन्म की संख्या असमान रूप से बढ़ी।
- आर्थिक कारक: कृषक समाजों में पुत्रों का श्रम कृषि कार्य के लिए अधिक मूल्यवान माना जाता था, जिससे पुत्र वरीयता सुदृढ़ हुई।
- शिक्षा तक पहुँच का अभाव: विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तक सीमित पहुँच ने बालिकाओं के भविष्य के अवसरों को प्रभावित किया।
- सुरक्षा और संरक्षा: लैंगिक हिंसा की उच्च दरें, जिनमें यौन उत्पीड़न, घरेलू हिंसा और तस्करी शामिल हैं।
- बाल विवाह: ग्रामीण क्षेत्रों में बाल विवाह की व्यापकता, जिसने महिलाओं के स्वास्थ्य, शिक्षा और स्वायत्तता को प्रभावित किया।
- सामाजिक मानदंड और अपेक्षाएँ: कठोर सामाजिक भूमिकाएँ, जो महिलाओं की स्वतंत्रता और आत्म-अभिव्यक्ति तथा विकास के अवसरों को सीमित करती हैं।
सरकारी पहल

उपलब्धियाँ
- लिंगानुपात में सुधार: सतत प्रयासों, विशेषकर बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ (BBBP) योजना के अंतर्गत, उल्लेखनीय प्रगति हुई है। जन्म के समय लिंगानुपात (SRB) 2014-15 में लगभग 918 से बढ़कर 2023-24 में 930 तक पहुँच गया है।
- बालिका शिक्षा में प्रगति: 2024-2025 की अवधि में माध्यमिक स्तर पर बालिकाओं का सकल नामांकन अनुपात (GER) 80.2% तक पहुँच गया है, जैसा कि UDISE रिपोर्ट में दर्ज है।
- देशभर के 97.5 प्रतिशत विद्यालयों में बालिकाओं के लिए शौचालय की सुविधा उपलब्ध है।

- बाल विवाह की रोकथाम: जनवरी 2026 तक कुल 2,153 बाल विवाह रोके गए हैं और देशभर में 60,262 बाल विवाह निषेध अधिकारी नियुक्त किए गए हैं।
- मासिक धर्म देखभाल:

- सुकन्या समृद्धि योजना (SSY): 2024 तक देशभर में 4.2 करोड़ से अधिक खाते खोले गए हैं, जो इस योजना में जनसहभागिता और विश्वास को दर्शाता है।
आगे की राह
- सामुदायिक जागरूकता और शिक्षा: बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ जैसी अभियान जारी रहनी चाहिए, ताकि बालिका के महत्व और लैंगिक भेदभाव के दुष्प्रभावों के प्रति जागरूकता बढ़े।
- महिलाओं के स्वास्थ्य और स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच में सुधार: विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं और बालिकाओं को बेहतर स्वास्थ्य सेवाएँ उपलब्ध कराना, महिला मृत्यु दर को कम करने में सहायक होगा।
- सामाजिक मानदंड और दृष्टिकोण में परिवर्तन: लैंगिक-संवेदनशील शिक्षा को बढ़ावा देना, पुरुषों को लैंगिक समानता की चर्चाओं में शामिल करना और दहेज प्रथा का उन्मूलन करना पारंपरिक पक्षपात को तोड़ने में सहायता करेगा।
- सुदृढ़ आँकड़ा संग्रह और अनुसंधान: लिंगानुपात असंतुलन के पीछे के कारणों की सतत निगरानी और अनुसंधान भविष्य की नीतियों को बेहतर बनाने एवं वर्तमान पहलों की सफलता को ट्रैक करने में सहायक होगा।
स्रोत: PIB
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