2024-25 में विदेशों में स्थित 71 भगोड़े(Fugitives)

पाठ्यक्रम: GS2/ शासन; GS3/ अर्थव्यवस्था

संदर्भ

  • कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग (DoPT) की 2024-25 की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) ने विदेशों में भारत द्वारा वांछित 71 व्यक्तियों का पता लगाया, जो विगत 12 वर्षों में सबसे अधिक है।

परिचय

  • भगोड़े(Fugitives) वे व्यक्ति होते हैं जो किसी अपराध के आरोपी या दोषी होते हैं और जिस देश में अपराध किया गया है, वहाँ की न्यायिक प्रक्रिया से जानबूझकर बचने के लिए भाग जाते हैं।
  •  वे गिरफ्तारी, मुकदमे, दोषसिद्धि या कानून प्रवर्तन अधिकारियों द्वारा दंड से बचने के लिए पलायन करते हैं। उनकी वापसी के लिए एक विधिक रूप से मान्यता प्राप्त अंतर्राष्ट्रीय तंत्र आवश्यक होता है, जिसे प्रत्यर्पण कहा जाता है।

प्रत्यर्पण क्या है?

  • प्रत्यर्पण विदेशों से भगोड़ों की समयबद्ध वापसी के लिए मान्यता प्राप्त अंतर्राष्ट्रीय तंत्र है।
  •  इसे परिभाषित किया गया है कि — “किसी आरोपी या दोषसिद्ध व्यक्ति को उस देश से, जहाँ वह पाया गया है, उस देश को सौंपना जिसने उसका प्रत्यर्पण अनुरोध किया है।”
  •  यह प्रक्रिया संधियों और समझौतों द्वारा संचालित होती है, जो भगोड़ों के समर्पण हेतु अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त विधिक सिद्धांतों को अपनाती हैं।
  • प्रत्यर्पण अनुरोध:
    • विगत पाँच वर्षों में भारत ने विदेशी देशों को 137 प्रत्यर्पण अनुरोध भेजे हैं, जिनमें से अधिकांश स्वीकार किए गए हैं, परंतु अभी लंबित हैं।
    • लेटर रोगेटरी (Letters Rogatory) में लगातार विलंब होता रहा है। वर्ष 2025 तक विदेशी देशों में 533 लेटर रोगेटरी लंबित थे।
प्रत्यर्पण को नियंत्रित करने वाला संस्थागत ढाँचा

केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI): भारत के इंटरपोल राष्ट्रीय केंद्रीय ब्यूरो के रूप में कार्य करता है, इंटरपोल नोटिस जारी करता है और विदेशी पुलिस एजेंसियों के साथ मिलकर भगोड़ों का पता लगाता है।
विदेश मंत्रालय: प्रत्यर्पण और आपसी विधिक सहायता से संबंधित राजनयिक संवाद का प्रबंधन करता है।
भारत के लगभग 48 देशों के साथ प्रत्यर्पण संधियाँ और 12 देशों के साथ प्रत्यर्पण व्यवस्थाएँ हैं।

आपसी विधिक सहायता संधि (MLAT): यह एक तंत्र है जिसके माध्यम से देश अपराध की रोकथाम, दमन, जाँच एवं अभियोजन में औपचारिक सहायता प्रदान करने और प्राप्त करने के लिए सहयोग करते हैं।
उद्देश्य: यह सुनिश्चित करना कि अपराधी विभिन्न देशों में उपलब्ध साक्ष्यों के अभाव में कानून की प्रक्रिया से बच न सकें या उसे बाधित न कर सकें।

लेटर रोगेटरी (LRs): ये भारतीय न्यायालय से विदेशी न्यायालय को न्यायिक सहायता हेतु औपचारिक अनुरोध होते हैं, जैसे साक्ष्य संग्रह, सम्मन की सेवा।
यह राजनयिक चैनलों के माध्यम से किया जाता है और सामान्यतः MLAT की तुलना में धीमा होता है।

प्रत्यर्पण का विधिक ढाँचा

  • भारत में प्रत्यर्पण(Extradition ), प्रत्यर्पण अधिनियम, 1962 द्वारा शासित है, जो संधियों या कार्यकारी व्यवस्थाओं के अंतर्गत भगोड़ों को सौंपने या प्राप्त करने का विधिक आधार प्रदान करता है।
  • भारत बहुपक्षीय अभिसमयों का भी पक्षकार है, जैसे:
    • संयुक्त राष्ट्र भ्रष्टाचार विरोधी अभिसमय
    • संयुक्त राष्ट्र अंतर्राष्ट्रीय संगठित अपराध विरोधी अभिसमय
  • भगोड़ा आर्थिक अपराधी अधिनियम, 2018 (FEOA): यह कानून आर्थिक अपराधियों को भारतीय कानून की प्रक्रिया से बचने और भारतीय न्यायालयों के अधिकार क्षेत्र से बाहर रहने से रोकने के लिए बनाया गया।
    • इस अधिनियम के अंतर्गत प्रवर्तन निदेशालय को उन भगोड़े आर्थिक अपराधियों की संपत्तियों को संलग्न करने का अधिकार है, जो भारत से गिरफ्तारी वारंट से बचकर भाग गए हैं, और उनकी संपत्तियों को केंद्र सरकार के पक्ष में जब्त करने का प्रावधान है।

प्रत्यर्पण में संरचनात्मक चुनौतियाँ

  • विदेशी न्यायालयों में न्यायिक समीक्षा: विदेशी न्यायालय स्वतंत्र रूप से प्रत्यर्पण अनुरोधों, कारागार स्थितियों और मानवाधिकार सुरक्षा उपायों की जाँच करते हैं।
    • ये मूल्यांकन प्रायः भारतीय अनुरोधों से संबंधित प्रत्यर्पण कार्यवाही को लंबा या बाधित कर देते हैं।
  • शरण और राजनीतिक संरक्षण दावे: कई भगोड़े राजनीतिक उत्पीड़न का दावा करते हैं या मेजबान देशों में शरण लेते हैं, जिससे आपराधिक कार्यवाही जटिल विधिक और मानवीय विवादों में बदल जाती है।
  • कुछ न्यायक्षेत्रों के साथ संधियों का अभाव: कई भगोड़े उन देशों में रहते हैं जिनके साथ भारत की प्रत्यर्पण संधि नहीं है, जिससे कानूनी रूप से उनकी वापसी सुनिश्चित करने की भारत की क्षमता सीमित हो जाती है।
  • पुरानी संधि संरचनाएँ: पुरानी संधियाँ प्रतिबंधात्मक सूची प्रणाली का पालन करती हैं, जिसमें साइबर अपराध और जटिल वित्तीय धोखाधड़ी जैसे आधुनिक अपराध शामिल नहीं होते।

शासन और सुरक्षा पर प्रभाव

  • कानून के शासन पर प्रभाव: कम प्रत्यर्पण परिणाम आर्थिक और अंतर्राष्ट्रीय अपराधों के विरुद्ध निवारक क्षमता को कमजोर करते हैं तथा अपराधियों को घरेलू न्यायिक प्रक्रिया से बचने हेतु विदेश भागने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।
  • आंतरिक सुरक्षा और वित्तीय अखंडता: विलंबित प्रत्यर्पण भारत के धन शोधन, भ्रष्टाचार और संगठित अपराध से लड़ने के प्रयासों को बाधित करता है, साथ ही आपराधिक न्याय प्रणाली में जनविश्वास को भी कमजोर करता है।

आगे की राह

  • भारत को अपने प्रत्यर्पण संधि नेटवर्क का विस्तार करना चाहिए, विशेषकर प्रमुख वित्तीय केंद्रों के साथ, और लंबित मामलों को शीघ्रता से निपटाने हेतु सतत राजनयिक संवाद करना चाहिए।
  • विदेशी न्यायालयों द्वारा उठाई गई चिंताओं को दूर करने और भारत की प्रत्यर्पण विश्वसनीयता को सुदृढ़ करने के लिए कारागार अवसंरचना में सुधार, समयबद्ध मुकदमे एवं प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों को सुदृढ़ करना आवश्यक है।

स्रोत: TH

 

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