पाठ्यक्रम: GS3/कृषि; अर्थव्यवस्था
संदर्भ
- हाल ही में केंद्रीय रेशम बोर्ड ने भारत की रेशम मूल्य श्रृंखला को दोगुना करने की महत्वाकांक्षी योजना की घोषणा की है। वर्तमान में इसका मूल्य ₹55,000 करोड़ है, जिसे 2030 तक ₹1.1 लाख करोड़ तक पहुँचाने का लक्ष्य रखा गया है।
| केंद्रीय रेशम बोर्ड (CSB) – यह वस्त्र मंत्रालय के अधीन एक वैधानिक निकाय है, जिसकी स्थापना केंद्रीय रेशम बोर्ड अधिनियम, 1948 (बाद में संशोधित अधिनियम 2006) के अंतर्गत की गई थी। – यह रेशम पालन और रेशम उद्योग के विकास के लिए नीतियाँ बनाने तथा कार्यक्रम लागू करने के लिए उत्तरदायी है। – यह रेशम पालन में वैज्ञानिक, तकनीकी और आर्थिक अनुसंधान करता है तथा गुणवत्तापूर्ण रेशम कीट बीज और कोकून के उत्पादन एवं आपूर्ति की देखरेख करता है। – मुख्यालय: बेंगलुरु, कर्नाटक। |
रेशम और रेशम पालन के बारे में
- रेशम पालन : रेशम उत्पादन की कला और विज्ञान है, जिसमें रेशम कीटों का पालन किया जाता है। यह कृषि, वानिकी और कुटीर उद्योग के तत्वों को जोड़कर लाखों ग्रामीण परिवारों को आजीविका प्रदान करता है।
- ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत:
- भारत का रेशम से संबंध 5,000 वर्ष से भी अधिक प्राचीन है, जिसका उल्लेख अथर्ववेद और महाभारत जैसे प्राचीन ग्रंथों में मिलता है।
- ऐतिहासिक सिल्क रूट पर भारत की रणनीतिक स्थिति ने इसे रेशम व्यापार, शिल्पकला और सांस्कृतिक आदान-प्रदान का केंद्र बनाया।
- भारतीय रेशम जैसे कांचीपुरम, बनारसी, पटोला, मूगा और एरी सौंदर्य परिष्कार एवं पारंपरिक विरासत का प्रतीक हैं।
- भारत में उत्पादित रेशम के प्रकार:
- मलबरी सिल्क (Mulberry Silk): भारत के कुल उत्पादन का 70%।
- तसर (Tussar) सिल्क: जंगली रेशम कीटों से प्राप्त।
- एरी सिल्क (Eri Silk): जिसे ‘अहिंसा सिल्क’ भी कहा जाता है।
- मूगा सिल्क (Muga Silk): एक भौगोलिक संकेत (GI) उत्पाद।
- नीति आयोग की ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना के अनुसार:
- कम प्रारंभिक निवेश और छोटे उत्पादन चक्र।
- उच्च रोजगार क्षमता (कच्चे रेशम के प्रति किलो पर 11 मानव-दिवस)।
- ग्रामीण महिलाओं के सशक्तिकरण और स्वरोजगार में महत्वपूर्ण योगदान।
प्रमुख रेशम उत्पादक क्षेत्र
- दक्षिण भारत (मलबरी): कर्नाटक, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश; केवल कर्नाटक ही भारत के कुल रेशम का ~35% योगदान करता है।
- पूर्वी भारत (तसर): झारखंड, छत्तीसगढ़, ओडिशा, पश्चिम बंगाल; आदिवासी आधारित उत्पादन; व्यापक वन-आधारित पालन।
- उत्तर-पूर्व भारत (मूगा, एरी): असम, मेघालय, मणिपुर; पारंपरिक रेशम पालन; दुर्लभ मूगा रेशम कीट का घर।
- उत्तर भारत (मलबरी): जम्मू और कश्मीर; कालीन और वस्त्रों के लिए उत्तम मलबरी रेशम का उत्पादन।
वर्तमान उत्पादन और रोजगार का महत्व
- भारत वर्तमान में 41,121 मीट्रिक टन कच्चा रेशम उत्पादन करता है, जिसमें 70% से अधिक मलबरी रेशम है और शेष एरी, तसर एवं मूगा रेशम है।
- 2030 तक उत्पादन का अनुमान 54,000 मीट्रिक टन है।
- भारत आज वैश्विक स्तर पर दूसरा सबसे बड़ा रेशम उत्पादक है, जो विश्व के कुल रेशम उत्पादन का लगभग 25% है, चीन के बाद।
- 60 लाख से अधिक लोग, मुख्यतः छोटे किसान, महिलाएँ और आदिवासी समुदाय, रेशम क्षेत्र से जुड़े हुए हैं।
- यह वर्षभर रोजगार प्रदान करता है, विशेषकर वर्षा-आधारित और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में।
रेशम पालन क्षेत्र की चुनौतियाँ
- जलवायु संवेदनशीलता: रेशम कीट पालन मौसम पर निर्भर है; सूखा और तापमान में उतार-चढ़ाव कोकून उत्पादन को प्रभावित करते हैं।
- बाजार अस्थिरता: मूल्य अस्थिरता छोटे पालकों को प्रभावित करती है।
- तकनीकी अंतराल: बेहतर रेशम कीट बीज गुणवत्ता, मशीनीकरण और रीलिंग दक्षता की आवश्यकता।
- कृत्रिम रेशों से प्रतिस्पर्धा: उपभोक्ता की प्राथमिकताएँ सस्ते विकल्पों की ओर शिफ्ट हो रही हैं।
सरकारी पहल और नीतिगत ढाँचा
- सिल्क समग्र 2 योजना (2021–2026): ₹2,161 करोड़ की पहल, जो बीज उत्पादन, बुनाई तकनीक और निर्यात को बढ़ावा देती है।
- उत्तर-पूर्व क्षेत्र वस्त्र प्रोत्साहन योजना (NERTPS): मूगा और एरी रेशम क्लस्टरों को सुदृढ़ करती है।
- रेशम पालन क्लस्टर विकास कार्यक्रम (SCDP): कर्नाटक, झारखंड और असम में अवसंरचना को सुदृढ़ करता है।
- सिल्क समग्र: खेत से कपड़े तक पूरी रेशम मूल्य श्रृंखला को सुदृढ़ करने की व्यापक योजना।
- समर्थ (SAMARTH): कौशल विकास पहल, जो युवाओं और महिलाओं को रेशम पालन और रेशम प्रसंस्करण में प्रशिक्षित करती है।