नासा की चंद्रमा पर परमाणु रिएक्टर स्थापित करने की योजना

पाठ्यक्रम: GS3/अन्तरिक्ष

संदर्भ

  • अमेरिकी राष्ट्रीय वैमानिकी और अंतरिक्ष प्रशासन (NASA) के 2030 तक चंद्रमा पर परमाणु रिएक्टर बनाने की योजना को तेजी से आगे बढ़ाने की संभावना है।

परिचय 

  • परियोजना का उद्देश्य: यह रिएक्टर देश की उस व्यापक महत्वाकांक्षा का भाग है जिसके तहत चंद्रमा की सतह पर मनुष्यों के स्थायी निवास के लिए आधार स्थापित किया जाना है।
    • यह एक 100-किलोवाट क्षमता वाला रिएक्टर होगा, जो सामान्यतः 2–3 मेगावाट बिजली उत्पन्न करने वाले ऑन-शोर विंड टर्बाइनों से छोटा है।
  • वैश्विक प्रतिस्पर्धा: NASA की इस दिशा में तीव्र पहल चीन और रूस की समान घोषणाओं के बाद आई है।
    • चीन और रूस का लक्ष्य 2035 तक चंद्रमा पर स्वचालित परमाणु ऊर्जा स्टेशन बनाना है।
    • भारत और जापान सहित कई अन्य देश भी चंद्रमा की सतह पर स्थायी मानव बस्तियाँ स्थापित करने की योजना बना रहे हैं।

अंतरराष्ट्रीय कानूनी ढांचा

  • आउटर स्पेस संधि (1967)
    • अनुमेय गतिविधियाँ: यह संधि चंद्रमा एवं अन्य खगोलीय पिंडों पर शांतिपूर्ण उद्देश्यों की अनुमति देती है और अंतरिक्ष में या खगोलीय पिंडों पर परमाणु हथियार/डब्ल्यूएमडी पर प्रतिबंध लगाती है।
    • अनुच्छेद IX: देशों को दूसरों के हितों का ध्यान रखना होगा; कोई क्षेत्रीय दावा नहीं किया जा सकता।
  • उत्तरदायित्व सम्मेलन (1972): प्रक्षेपण करने वाला देश पृथ्वी/विमानों पर हुई हानि के लिए पूर्ण रूप से उत्तरदायी होता है; अंतरिक्ष या चंद्रमा पर  हुई हानि के लिए दोष-आधारित उत्तरदायित्व लागू होता है।
    • यह दावा और निपटान की प्रक्रिया भी प्रदान करता है।
  • मून समझौता (1979) (कुछ पक्ष; व्यापक रूप से स्वीकार नहीं): यह चंद्रमा पर पर्यावरणीय और बचाव संबंधी जिम्मेदारियाँ जोड़ता है; चंद्र संसाधनों को “साझा विरासत” के रूप में मान्यता देता है। केवल इसके पक्षकारों पर लागू होता है।
  • 1992 संयुक्त राष्ट्र सिद्धांत: गैर-बाध्यकारी प्रस्ताव जो उन मिशनों में परमाणु ऊर्जा की भूमिका को मान्यता देता है जहाँ सौर ऊर्जा अपर्याप्त है।
    • सुरक्षा, पारदर्शिता और परामर्श के दिशा-निर्देश निर्धारित करता है।
  • भारत बाह्य अंतरिक्ष संधि पर हस्ताक्षरकर्ता है, लेकिन चंद्रमा समझौते पर नहीं। भारत आर्टेमिस समझौते (2023) पर भी हस्ताक्षरकर्ता है, जिसमें सभी पक्ष पारदर्शिता, सुरक्षा क्षेत्र और डेटा साझाकरण के लिए प्रतिबद्ध हैं।

नया दौड़ क्यों?

  • पहला कदम उठाने वाले को लाभ: मानदंडों, व्यवहारों और कानूनी व्याख्याओं को आकार देने का अवसर।
    • रणनीतिक क्षेत्रों (जैसे जल-बर्फ वाले चंद्र दक्षिणी ध्रुव) तक पहुंच का नियंत्रण।
    • दीर्घकालिक सुविधाओं की स्थापना के माध्यम से भू-राजनीतिक प्रभाव प्राप्त करना।

सौर ऊर्जा की तुलना में परमाणु ऊर्जा क्यों?

  • चंद्रमा की सीमाएँ: चंद्रमा पर वातावरण नहीं है और वहाँ 14-दिन की अंधकारमय अवधि होती है, जिससे सौर ऊर्जा कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में अविश्वसनीय हो जाती है।
  • परमाणु रिएक्टर की क्षमता: एक छोटा चंद्र रिएक्टर लगातार एक दशक या उससे अधिक समय तक कार्य कर सकता है, जिससे आवास, रोवर्स, 3D प्रिंटर और जीवन-सहायक प्रणालियों को ऊर्जा मिल सकती है।
    • यह क्षमता मंगल ग्रह के मिशनों के लिए भी आवश्यक है, जहाँ सौर ऊर्जा और भी सीमित है।

चिंताएँ

  • कानूनी नियमों की कमी: चंद्रमा पर परमाणु अपशिष्ट निपटान के लिए कोई बाध्यकारी वैश्विक नियम नहीं हैं।
  • दुर्घटनाओं का जोखिम: प्रक्षेपण या चंद्र संचालन के दौरान रेडियोधर्मी प्रदूषण का खतरा।
  • सुरक्षा क्षेत्रों और साइट पहुंच पर संभावित विवाद: संसाधन-समृद्ध क्षेत्रों में टकराव की आशंका।
  • अनुपालन सत्यापन की चुनौतियाँ: स्थल निरीक्षण की कठिनाई के कारण निगरानी करना मुश्किल।
  • प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और रिएक्टर तैनाती पर भू-राजनीतिक तनाव: तकनीकी प्रतिस्पर्धा से अंतरराष्ट्रीय संबंधों में तनाव उत्पन्न हो सकता है।

आगे की राह

  • राष्ट्रीय अंतरिक्ष परमाणु सुरक्षा कानून बनाना: आउटर स्पेस संधि और 1992 UN सुरक्षा ढांचे के अनुरूप।
  • अंतर-एजेंसी समन्वय को सुदृढ़ करना: अंतरिक्ष और परमाणु नियामकों के बीच सहयोग बढ़ाना।
  • पारदर्शिता और परामर्श को प्रोत्साहन देना: आर्टेमिस समझौते के माध्यम से।
  • सुरक्षित और छोटे रिएक्टरों में निवेश: पर्यावरणीय प्रभाव को न्यूनतम करने वाले रिएक्टरों के लिए अनुसंधान को प्रोत्साहन।
  • अंतरराष्ट्रीय सहयोग की योजना बनाना: आपातकालीन प्रतिक्रिया, अपशिष्ट प्रबंधन और चंद्र परमाणु स्थलों की दीर्घकालिक देखरेख के लिए।

Source: IE

 

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