पाठ्यक्रम: GS3/अर्थव्यवस्था
संदर्भ
- हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति ने घोषणा की है कि भारत से होने वाले सभी आयातों पर 25% टैरिफ (शुल्क) लगाया जाएगा, जो 1 अगस्त 2025 से प्रभावी होगा। इसके साथ भारत द्वारा रूसी तेल और सैन्य उपकरणों की खरीद जारी रखने पर एक अनिर्दिष्ट दंड भी लगाया जाएगा।
भारत के आयातों पर अमेरिका ने 25% टैरिफ क्यों लगाया?
- अमेरिकी वस्तुओं पर भारत के ऊँचे टैरिफ: अमेरिकी राष्ट्रपति के अनुसार, भारत द्वारा अमेरिकी वस्तुओं पर लगाए गए शुल्क विश्व में सबसे अधिक हैं। अमेरिका को भारत के साथ लगभग $40.8 बिलियन का व्यापार घाटा है।
- भारत की गैर-आर्थिक व्यापार बाधाएं: अमेरिका का आरोप है कि भारत ऊँचे टैरिफ और अन्य गैर-टैरिफ बाधाएं बनाए रखता है, विशेष रूप से भारत की कृषि सब्सिडी और खाद्य सुरक्षा से संबंधित सैनिटरी व फाइटोसेनिटरी (SPS) उपायों का उदाहरण दिया गया है।
- रूस से भारत के ऊर्जा व रक्षा संबंध: भारत रूस से तेल खरीदने वाला सबसे बड़ा ग्राहक है (भारत के कुल तेल आयात का 35–40%) और मास्को के साथ भारत के रक्षा संबंध भी लंबे समय से हैं।
- इस टैरिफ में लगाया गया दंडात्मक भाग इन्हीं खरीदों से जुड़ा बताया जा रहा है, हालांकि इसका सही स्वरूप स्पष्ट नहीं है।
- BRICS सदस्यता: अमेरिका BRICS को एक “एंटी-डॉलर” गठबंधन मानता है, जो अमेरिकी आर्थिक नेतृत्व को चुनौती देता है, और भारत इस समूह का भाग है।
- द्विपक्षीय व्यापार समझौता (BTA) वार्ता की विफलता: जवाबी टैरिफ से बचने के लिए एक “मिनी-डील” अगस्त 2025 की समयसीमा से पहले अंतिम रूप नहीं ले सकी, जबकि वार्ता फरवरी 2025 से चल रही थी। इसे वार्ता को तीव्र करने के लिए एक दबाव तकनीक के रूप में देखा जा रहा है।
भारत से आयात पर 25% अमेरिकी टैरिफ के प्रमुख प्रभाव
- भारतीय निर्यातों पर आर्थिक प्रभाव: यह टैरिफ वार्षिक $129 बिलियन के द्विपक्षीय व्यापार को प्रभावित करता है, जिसमें वित्त वर्ष 2025 में अमेरिका को भारत का निर्यात $86.5 बिलियन रहा।

- अधिक जोखिम वाले क्षेत्र:
- फार्मास्युटिकल्स: भारत अमेरिका को जेनेरिक दवाओं का प्रमुख आपूर्तिकर्ता है।
- ऑटो पार्ट्स व इंजीनियरिंग वस्तुएं: वर्ष 2024 में $2.2 बिलियन मूल्य के ऑटो घटकों का निर्यात अब पूर्ण टैरिफ के दायरे में आ गया है।
- कपड़ा, रत्न व आभूषण, इलेक्ट्रॉनिक्स और समुद्री खाद्य: ये निर्यात-प्रधान क्षेत्र अपनी मूल्य प्रतिस्पर्धा खो सकते हैं।
- MSME और श्रम-प्रधान उद्योगों पर दबाव: यह टैरिफ छोटे उत्पादकों और निर्यातकों पर असमान प्रभाव डाल सकता है, खासकर परिधान, चमड़ा एवं हस्तशिल्प जैसे क्षेत्रों में।
- उद्योग संस्थाओं की चेतावनी: FICCI जैसे संस्थानों ने भारत के निर्यात-प्रधान क्षेत्रों में तत्काल संकट की चेतावनी दी है।
- भूराजनीतिक संकेत: टैरिफ का दंडात्मक भाग भारत के रूस के साथ ऊर्जा व रक्षा संबंधों से जुड़ा है, जिससे यह केवल आर्थिक नहीं बल्कि रणनीतिक मामला बन गया है।
- भारत की विदेश नीति में “रणनीतिक स्वायत्तता” विशेषकर रूस को लेकर, अब नए सिरे से जांच के दायरे में आ सकती है।
- बाजार अस्थिरता व निवेशक भावना: इस घोषणा के पश्चात भारतीय शेयर सूचकांक जैसे सेंसेक्स और निफ्टी में तेज गिरावट देखी गई।
- विश्लेषकों के अनुसार अमेरिकी मांग पर निर्भर क्षेत्रों में अल्पकालिक अस्थिरता संभव है।
भारत की प्रतिक्रिया रणनीति और विकल्प
- तात्कालिक प्रतिक्रिया: वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय ने कहा है कि वह इस टैरिफ के प्रभावों का अध्ययन कर रहा है और निष्पक्ष व पारस्परिक रूप से लाभदायक व्यापार समझौते के प्रति प्रतिबद्ध है।
- भारत ने किसानों, MSMEs और उद्यमियों की रक्षा को प्राथमिकता दी है और यह संकेत दिया है कि घरेलू हितों से कोई समझौता नहीं होगा।
- चल रही व्यापार वार्ता: भारत और अमेरिका फरवरी 2025 से एक द्विपक्षीय व्यापार समझौते (BTA) पर बातचीत कर रहे हैं।
- अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल छठे दौर की वार्ता के लिए 25 अगस्त को भारत आने वाला है। भारत ने एक पूर्व-फसल समझौते को अंतिम रूप दिया था, लेकिन अमेरिका ने 1 अगस्त की समयसीमा से पहले उस पर हस्ताक्षर नहीं किए।
- विचाराधीन रणनीतिक विकल्प:
- बाजार विविधीकरण: अमेरिकी बाजार पर निर्भरता घटाकर यूरोप, दक्षिण-पूर्व एशिया और अफ्रीका में निर्यात बढ़ाना।
- मित्र देशों से सहयोग: जापान और यूरोपीय संघ जैसे उन देशों से संबंध सुदृढ़ करना जिन्होंने अमेरिका के साथ पहले ही लाभप्रद टैरिफ समझौते किए हैं।
- घरेलू स्थायित्व: “मेक इन इंडिया” जैसे अभियानों को बढ़ावा देना ताकि बाहरी आघात को समाहित किया जा सके।
- प्रभावित क्षेत्रों के लिए समर्थन पैकेज: दवाइयों, कपड़ा, ऑटो पार्ट्स और समुद्री खाद्य जैसे क्षेत्रों को सहायता प्रदान करना।
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