भारत द्वारा अपनी समुद्री मत्स्य पालन क्षमता का दोहन करने का प्रयास

पाठ्यक्रम: GS3/ कृषि और पशुपालन

संदर्भ

  • मत्स्य पालन, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय ने हाल ही में भारतीय विशेष आर्थिक क्षेत्र (EEZ) एवं खुले समुद्रों में “सतत” मत्स्य पालन को सक्षम करने के लिए प्रारूप नियम और दिशा-निर्देश जारी किए हैं।

भारत के मत्स्य क्षेत्र की संभावनाएँ 

  • भारत के पास लगभग 11,098.81 किमी लंबी समुद्री तटरेखा है, जिसमें 1,457 लैंडिंग केंद्र एवं 3,461 मछली पकड़ने वाले गाँव हैं, जो मत्स्य विकास के लिए एक सुदृढ़ आधार प्रदान करते हैं। 
  • भारत विश्व में तीसरा सबसे बड़ा मछली उत्पादक देश है, जिसने 2022-2023 में वैश्विक उत्पादन का 8% योगदान दिया। 
  • देश का विशेष आर्थिक क्षेत्र (EEZ) लगभग 20 लाख वर्ग किमी में फैला है, जिसमें 5.31 मिलियन मीट्रिक टन (MMT) वार्षिक पकड़ क्षमता का अनुमान है। 
  • भारत का समुद्री मछली पकड़ना 2023-24 में 44.95 लाख टन और 2022-23 में 44.32 लाख टन दर्ज किया गया। 
  • उच्च मूल्य वाली टूना और टूना जैसी प्रजातियाँ विशेष रूप से निर्यात के लिए विकास का प्रमुख क्षेत्र मानी गई हैं।

नए नियामक ढाँचे की प्रमुख विशेषताएँ 

  • प्रारूप दिशा-निर्देशों के अनुसार, कोई भी भारतीय ध्वजांकित पोत बिना प्राधिकरण पत्र (LOA) के खुले समुद्रों में मछली नहीं पकड़ सकता। 
  • LOA तीन वर्षों के लिए वैध होगा, जिससे एक निश्चित अवधि के लिए नियामक निगरानी सुनिश्चित होगी। 
  • यह ढाँचा अवैध, अपंजीकृत और अनियमित (IUU) मछली पकड़ने पर रोक लगाता है, जिससे भारत वैश्विक मत्स्य शासन मानकों के अनुरूप हो जाता है। 
  • भारतीय पोतों को क्षेत्रीय मत्स्य प्रबंधन संगठनों (RFMOs) के संरक्षण और प्रबंधन उपायों का पालन करना होगा, जिनमें शामिल हैं:
    • पकड़ सीमा,
    • उपकरण प्रतिबंध,
    • उपपकड़ (bycatch) न्यूनीकरण,
    • मछली समुच्चय उपकरण (FAD) प्रबंधन,
    • यात्रा रिपोर्टिंग आवश्यकताएँ। 
  • दिशा-निर्देशों में छोटे पैमाने एवं पारंपरिक मछुआरों को खुले समुद्रों में भाग लेने तथा मूल्य श्रृंखला दक्षता को सुदृढ़ करने के लिए प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण कार्यक्रमों का प्रावधान भी है।

अंडमान और निकोबार तथा लक्षद्वीप द्वीपों पर विशेष ध्यान 

  • अंडमान और निकोबार द्वीप समूह भारत के कुल समुद्री क्षेत्र का लगभग एक-तिहाई (6.6 लाख वर्ग किमी EEZ) हिस्सा रखते हैं। 
  • एक समर्पित “टूना क्लस्टर” अधिसूचित किया गया है, जिसमें शामिल हैं:
    • ऑन-बोर्ड प्रसंस्करण और फ्रीजिंग सुविधाएँ,
    • गहरे समुद्र में टूना पोतों का लाइसेंसिंग,
    • अंडमान और निकोबार प्रशासन द्वारा संचालित एकल-खिड़की मंजूरी प्रणाली। 
  • लक्षद्वीप द्वीप समूह भारत के कुल EEZ का लगभग 17% (4 लाख वर्ग किमी) कवर करते हैं, साथ ही 4,200 वर्ग किमी का लैगून क्षेत्र भी है।
    • लक्षद्वीप के विकास योजनाएँ टूना मत्स्य पालन, जलीय कृषि और सतत लैगून-आधारित मत्स्य प्रणालियों में अवसरों का दोहन करने पर केंद्रित हैं, जिससे द्वीपों को समुद्री संसाधन विकास का प्रमुख केंद्र बनाया जा सके।

क्या हैं चुनौतियाँ? 

  • तटीय क्षेत्रों में अत्यधिक दोहन हो रहा है, जबकि अपतटीय और गहरे समुद्र की संभावनाएँ अभी भी कम उपयोग में हैं। 
  • पारंपरिक और छोटे पैमाने के मछुआरे उच्च समुद्री मत्स्य पालन के लिए आवश्यक तकनीक, पूंजी और प्रशिक्षण तक पहुँच में सीमित हैं। 
  • अपर्याप्त कोल्ड चेन, बंदरगाहों एवं आधुनिक प्रसंस्करण सुविधाओं जैसी आधारभूत संरचना की कमी दक्षता और निर्यात क्षमता को कम करती है। 
  • पर्यावरणीय चिंताएँ जैसे उपपकड़, प्रवाल भित्तियों का क्षरण और असतत मछली पकड़ने वाले उपकरण पारिस्थितिक जोखिम उत्पन्न करते हैं। 
  • IUU मत्स्य पालन के विरुद्ध निगरानी एवं प्रवर्तन के लिए सुदृढ़ निगरानी तंत्र और संस्थागत क्षमता की आवश्यकता है।

सरकारी पहलें 

  • समुद्री उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (MPEDA): यह तकनीकी उन्नयन, बाज़ार विकास और गुणवत्ता प्रमाणन को सुविधाजनक बनाता है। 
  • राष्ट्रीय समुद्री मत्स्य कार्य योजना (NMFAP): इसमें मत्स्य संसाधनों के आकलन, मत्स्य क्षेत्र में आधारभूत संरचना और तकनीक को बढ़ाने तथा जलीय कृषि विकास को बढ़ावा देने के उपाय शामिल हैं। 
  • प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (PMMSY): इसे FY 2020-21 से FY 2024-25 तक भारत में मत्स्य क्षेत्र के सतत और उत्तरदायी विकास के माध्यम से ब्लू रिवोल्यूशन लाने के लिए लागू किया गया। 
  • मत्स्य और जलीय कृषि आधारभूत संरचना विकास निधि (FIDF): इसे मत्स्य क्षेत्र की आधारभूत संरचना आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए कोष बनाने हेतु लागू किया गया। 
  • किसान क्रेडिट कार्ड (KCC) योजना: 2018-19 में इसे मत्स्य और पशुपालन किसानों तक विस्तारित किया गया ताकि वे अपनी कार्यशील पूंजी आवश्यकताओं को पूरा कर सकें।

आगे की राह 

  • आधारभूत संरचना को सुदृढ़  करना: आधुनिक बंदरगाहों, कोल्ड-चेन लॉजिस्टिक्स और प्रसंस्करण सुविधाओं में निवेश करें ताकि कटाई के बाद नुकसान को कम किया जा सके और निर्यात प्रतिस्पर्धा को बढ़ाया जा सके। 
  • मूल्य संवर्धन और निर्यात को बढ़ावा देना: टूना जैसी उच्च मूल्य वाली प्रजातियों पर ध्यान केंद्रित करें, मजबूत मूल्य श्रृंखला, ऑन-बोर्ड प्रसंस्करण और वैश्विक बाज़ार से जुड़ाव बनाएं। 
  • मछुआरों के लिए क्षमता निर्माण: पारंपरिक और छोटे पैमाने के मछुआरों के लिए प्रशिक्षण एवं कौशल विकास कार्यक्रमों का विस्तार करें ताकि वे गहरे समुद्र तथा खुले समुद्रों में भाग ले सकें।

Source: IE

 

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