कृषि सब्सिडी और सुधार की आवश्यकता

पाठ्यक्रम: GS3/कृषि

संदर्भ

  • खाद्य सब्सिडी लगभग ₹2.25 ट्रिलियन तक पहुँचने की संभावना है और उर्वरक सब्सिडी ₹2 ट्रिलियन तक जा सकती है, कुल बजट लगभग ₹51 ट्रिलियन है।
    • दोनों मिलकर बजट का लगभग 8 से 8.5 प्रतिशत हैं। दोनों ही उप-इष्टतम स्तर पर हैं।

भारत में कृषि सब्सिडी

  • कृषि सब्सिडी से तात्पर्य सरकार द्वारा किसानों को दी जाने वाली वित्तीय सहायता और प्रोत्साहन से है, जिसका उद्देश्य उत्पादन लागत कम करना, कृषि आय को स्थिर करना, खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करना तथा आधुनिक इनपुट व सतत प्रथाओं को अपनाने को बढ़ावा देना है।
  • मूल्य समर्थन (Price Support):  सरकार कुछ फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) तय करके किसानों को समर्थन देती है।
    • MSP मूलतः एक गारंटीकृत न्यूनतम मूल्य है: यदि बाजार मूल्य गिर जाए तो सरकार किसानों की फसल MSP पर खरीदेगी।
    • यह नीति 1965 में शुरू हुई थी। MSP 25 फसलों के लिए घोषित किया जाता है, जिनमें प्रमुख अनाज (चावल, गेहूँ, मक्का), दलहन (जैसे मसूर), तिलहन (जैसे सोयाबीन), और वाणिज्यिक फसलें जैसे कपास शामिल हैं।
  • इनपुट सब्सिडी :  मूल्य गारंटी से परे, सरकार किसानों को आवश्यक इनपुट्स पर भी सब्सिडी देती है – जैसे उर्वरक, जल पंप करने के लिए विद्युत , सिंचाई अवसंरचना, बीज, ऋण और फसल बीमा।

भारतीय कृषि में सब्सिडी का महत्व

  • खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करना: सब्सिडी उत्पादन लागत कम करती है और खाद्यान्न उत्पादन को बनाए रखती है, जिससे भारत बड़ी जनसंख्या की खाद्य आवश्यकताओं को पूरा कर पाता है और मूल्य स्थिरता बनी रहती है।
  • छोटे और सीमांत किसानों का समर्थन: अधिकांश किसानों की आय कम होती है और जोखिम उठाने की क्षमता सीमित होती है। सब्सिडी खेती को आर्थिक रूप से व्यवहार्य बनाती है तथा उन्हें इनपुट कीमतों के आघातों से बचाती है।
  • कृषि आय को स्थिर करना: मूल्य समर्थन (MSP) और आय समर्थन (PM-किसान) बाजार अस्थिरता एवं फसल विफलताओं के विरुद्ध सुरक्षा जाल का कार्य करते हैं, जिससे कृषि संकट कम होता है।
  • उत्पादकता और तकनीकी अपनाने को बढ़ावा देना: सब्सिडी वाले उर्वरक, बीज, सिंचाई और मशीनीकरण आधुनिक प्रथाओं को अपनाने को प्रोत्साहित करते हैं, जिससे कृषि उत्पादकता बढ़ती है।
  • ग्रामीण आजीविका और रोजगार बनाए रखना: कृषि को व्यवहार्य बनाए रखकर सब्सिडी ग्रामीण रोजगार, सहायक गतिविधियों को समर्थन देती है और मजबूरी में पलायन को रोकती है।

विरोध में तर्क 

  • भारी राजकोषीय भार: उर्वरक, खाद्य और विद्युत पर बड़ी सब्सिडी सार्वजनिक वित्त पर दबाव डालती है और अवसंरचना, अनुसंधान एवं शिक्षा में निवेश के अवसर कम करती है।
  • लाभों का असमान वितरण: सब्सिडी का लाभ बड़े और संपन्न किसानों को अधिक मिलता है, जबकि छोटे एवं सीमांत किसानों को सीमित या अप्रत्यक्ष लाभ मिलता है।
  • संसाधनों का दुरुपयोग और पर्यावरणीय क्षति: सस्ते उर्वरक, मुफ्त विद्युत और कम कीमत वाला जल अत्यधिक उपयोग को बढ़ावा देते हैं, जिससे मृदा की गुणवत्ता घटती है, भूजल का क्षय होता है और पर्यावरण को हानि पहुंचती है।
  • फसल पैटर्न में विकृति: MSP और इनपुट-आधारित सब्सिडी जल-प्रधान फसलों जैसे चावल एवं गन्ने को उन क्षेत्रों में प्रोत्साहित करती हैं जहाँ यह पारिस्थितिक रूप से उपयुक्त नहीं है, जिससे स्थिरता प्रभावित होती है।
  • बाजार विकृति और अक्षमता: सब्सिडी बाजार संकेतों को कमजोर करती है, फसल विविधीकरण को हतोत्साहित करती है और किसानों की मांग व मूल्य खोज के प्रति प्रतिक्रिया को कम करती है।
  • सुधार और नवाचार के प्रति हतोत्साहन: सब्सिडी पर अत्यधिक निर्भरता संरचनात्मक सुधारों, निजी निवेश और जलवायु-स्मार्ट कृषि प्रथाओं को अपनाने को हतोत्साहित करती है।

आगे की राह 

  • इनपुट-आधारित से आय-आधारित समर्थन की ओर बदलाव: धीरे-धीरे इनपुट सब्सिडी को प्रत्यक्ष आय समर्थन से बदलें ताकि किसानों को लचीलापन मिले और संसाधनों का दुरुपयोग कम हो।
  • मूल्य समर्थन और खरीद प्रणाली में सुधार: खरीद को विकेंद्रीकृत करें, MSP कवरेज को चावल और गेहूँ से आगे बढ़ाएँ, तथा e-NAM तथा किसान उत्पादक संगठनों (FPOs) के माध्यम से बाजार-आधारित मूल्य खोज को बढ़ावा दें।
  • प्रमुख समितियों की सिफारिशें: शांता कुमार समिति, केलकर समिति, नीति आयोग और आर्थिक सर्वेक्षण ने कृषि सब्सिडी के तर्कसंगतीकरण पर बल दिया है।
    • वे इनपुट और मूल्य-आधारित सब्सिडी से लक्षित DBT एवं आय समर्थन की ओर बदलाव की सिफारिश करते हैं, साथ ही सब्सिडी को दक्षता, स्थिरता और राजकोषीय विवेक से जोड़ने की बात करते हैं।

Source: IE

 

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