पाठ्यक्रम: GS3/ ऊर्जा
संदर्भ
- विद्युत मंत्रालय ने भारत के विद्युत क्षेत्र में सुधार और वितरण कंपनियों (डिस्कॉम) को सुदृढ़ करने के लिए विद्युत (संशोधन) विधेयक, 2025 का मसौदा जारी किया है।
प्रमुख प्रस्ताव क्या हैं?
- लागत-प्रतिबिंबित शुल्क:
- राज्य विद्युत नियामक आयोग राष्ट्रीय शुल्क नीति के अनुरूप शुल्क निर्धारित करेंगे और देरी से बचने के लिए स्वतः ही शुल्कों में संशोधन कर सकते हैं।
- समय पर लागत वसूली सुनिश्चित करने के लिए शुल्क आदेश वित्तीय वर्ष से पहले प्रकाशित किए जाने चाहिए।
- औद्योगिक और वाणिज्यिक उपभोक्ता अंततः वास्तविक लागतों को दर्शाते हुए शुल्क का भुगतान करेंगे, जबकि घरों और कृषि के लिए सब्सिडी पारदर्शी तरीके से वित्तपोषित की जाएगी।
- क्रॉस-सब्सिडी का चरणबद्ध समापन:
- वर्तमान प्रथा घरों और किसानों को मुफ्त या सस्ती विद्युत की सब्सिडी देने के लिए औद्योगिक उपयोगकर्ताओं से लागत से अधिक शुल्क लेती है।
- इसने छिपी हुई सब्सिडी को प्रत्यक्ष राजकोषीय सहायता या डीबीटी से बदलने के लिए सब्सिडी को पाँच साल के चरणबद्ध समापन का प्रस्ताव रखा, जिससे वित्तीय व्यवहार्यता एवं बाजार पारदर्शिता बढ़ेगी।
- बड़े उपभोक्ता डिस्कॉम को दरकिनार करते हुए सीधे जनरेटर से विद्युत खरीद सकते हैं।
- निजी क्षेत्र की भागीदारी:
- निजी कंपनियां साझा बुनियादी ढांचे का उपयोग करके किसी भी क्षेत्र में कार्य कर सकती हैं, जिससे बाजार के 90% से अधिक हिस्से पर नियंत्रण रखने वाले राज्य डिस्कॉम के एकाधिकार को समाप्त किया जा सकता है।
- अपेक्षित परिणाम: कम टैरिफ, बेहतर सेवा और स्मार्ट ग्रिड।
- नवीकरणीय ऊर्जा उपभोग संबंधी अनिवार्य दायित्व, जिनका पालन न करने पर ₹0.35-0.45/kWh तक का जुर्माना लगेगा।
- छूट और प्रोत्साहन:
- डिस्कॉम को 1 मेगावाट से अधिक क्षमता वाले ओपन एक्सेस उपभोक्ताओं के लिए सार्वभौमिक सेवा दायित्वों से छूट दी गई है।
- औद्योगिक निवेश आकर्षित करने के लिए नई विनिर्माण इकाइयों को पाँच वर्षों के लिए क्रॉस-सब्सिडी शुल्क से छूट दी गई है।
- रेलवे और मेट्रो प्रणालियों को भी दक्षता में सुधार के लिए छूट दी गई है।
- शासन और निगरानी:
- केंद्रीय ऊर्जा मंत्री की अध्यक्षता में प्रस्तावित राष्ट्रीय विद्युत परिषद, जिसमें राज्य मंत्री सदस्य होंगे।
- सीईआरसी और एसईआरसी के सदस्यों को जानबूझकर उल्लंघन या घोर लापरवाही के लिए हटाया जा सकता है, जिससे जवाबदेही बढ़ेगी।
- एकीकृत विद्युत प्रणाली के लिए साइबर सुरक्षा उपाय केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण द्वारा तैयार किए जाएँगे।
इसके निहितार्थ क्या हैं?
- राजकोषीय पारदर्शिता: छिपी हुई क्रॉस-सब्सिडी को समाप्त करके, यह विधेयक राजकोषीय जवाबदेही को बढ़ावा देता है, हालाँकि इससे अल्पकालिक घाटा बढ़ सकता है।
- औद्योगिक प्रतिस्पर्धात्मकता: लागत-प्रतिबिंबित टैरिफ उद्योगों और परिवहन क्षेत्रों पर बोझ कम करेंगे, दक्षता में सुधार करेंगे तथा निवेश आकर्षित करेंगे।
- उपभोक्ता सशक्तिकरण: खुली पहुँच और निजी भागीदारी प्रतिस्पर्धा और सेवा की गुणवत्ता को बढ़ाती है, हालाँकि समान ग्रामीण पहुँच को सुरक्षित रखना होगा।
- लक्षित कल्याण: गरीबों और किसानों के लिए सब्सिडी बनी रहेगी, लेकिन प्रत्यक्ष राजकोषीय हस्तांतरण के माध्यम से पारदर्शी तरीके से प्रदान की जाएगी, जिससे लीकेज और डिस्कॉम घाटे में कमी आएगी।
- सतत परिवर्तन: नवीकरणीय ऊर्जा दायित्व और बाजार-आधारित हरित उपकरण इस सुधार को भारत की स्वच्छ ऊर्जा और शुद्ध-शून्य प्रतिबद्धताओं के अनुरूप बनाते हैं।
चुनौतियाँ
- राजकोषीय दबाव: प्रत्यक्ष सब्सिडी भुगतान से राज्य का घाटा बढ़ेगा।
- कार्यान्वयन में देरी: नौकरशाही की अक्षमताएँ और विलंबित हस्तांतरण पारदर्शी सब्सिडी तंत्र में बदलाव को कमज़ोर करते हैं।
- समता संबंधी चिंताएँ: निजी कंपनियाँ शहरी और लाभदायक क्षेत्रों को प्राथमिकता दे सकती हैं, जिससे ग्रामीण एवं कम आय वाले क्षेत्रों में सेवा की गुणवत्ता कमज़ोर होने का जोखिम है।
निष्कर्ष
- मसौदा विद्युत (संशोधन) विधेयक, 2025 एक पारदर्शी, प्रतिस्पर्धी और वित्तीय रूप से टिकाऊ विद्युत क्षेत्र के निर्माण की दिशा में एक निर्णायक कदम है।
- क्रॉस-सब्सिडी को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करके, लागत-प्रतिबिंबित टैरिफ लागू करके और निजी भागीदारी को बढ़ावा देकर, यह दक्षता एवं समता के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास करता है।
Source: BS
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