पाठ्यक्रम: GS3/ऊर्जा
संदर्भ
- पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य के आसपास उत्पन्न व्यवधानों के कारण ऊर्जा की कीमतों में वृद्धि तथा भारतीय उद्योगों के लिए गैस की उपलब्धता में कमी आई है। यह स्थिति तापीय आत्मनिर्भरता की तात्कालिक आवश्यकता को रेखांकित करती है।
औद्योगिक / तापीय ऊष्मा के बारे में
- औद्योगिक ऊष्मा से तात्पर्य उस तापीय ऊर्जा से है जिसका उपयोग विनिर्माण प्रक्रियाओं में किया जाता है, जैसे—
- तापन (heating), सुखाने (drying), गलन (smelting) तथा रासायनिक अभिक्रियाएँ।
- दशकों से यह ऊष्मा मुख्यतः कोयला, प्राकृतिक गैस और एलपीजी जैसे जीवाश्म ईंधनों को जलाकर उत्पन्न की जाती रही है।
- उदाहरण:
- वस्त्र उद्योग (लुधियाना): कपड़ों की रंगाई, ब्लीचिंग और फिनिशिंग के लिए भाप का उपयोग।
- सिरेमिक उद्योग (मोरबी): टाइलों के उत्पादन हेतु 1000°C से अधिक तापमान पर चलने वाली भट्टियाँ।
- वस्त्र उद्योग (लुधियाना): कपड़ों की रंगाई, ब्लीचिंग और फिनिशिंग के लिए भाप का उपयोग।
- औद्योगिक ऊष्मा भारत की कुल ऊर्जा खपत का लगभग 25% हिस्सा है, जिससे यह औद्योगिक उत्पादकता एवं उत्सर्जन दोनों के लिए एक महत्वपूर्ण घटक बन जाती है।
तापीय आत्मनिर्भरता
- तापीय आत्मनिर्भरता से आशय किसी राष्ट्र की उस क्षमता से है जिसके माध्यम से वह औद्योगिक प्रक्रियाओं के लिए आवश्यक ऊष्मा का उत्पादन आयातित हाइड्रोकार्बनों पर निर्भर हुए बिना, घरेलू और सतत स्रोतों से कर सके।
- इसमें निम्नलिखित प्रौद्योगिकियाँ शामिल हैं—
- विद्युतीकृत हीटिंग तकनीकें
- सौर तापीय ऊर्जा
- हरित हाइड्रोजन
- बायोमास
- अपशिष्ट ऊष्मा पुनर्प्राप्ति
- तापीय ऊर्जा भंडारण
जीवाश्म ईंधन आधारित औद्योगिक ऊष्मा की चुनौतियाँ
- ऊर्जा सुरक्षा जोखिम: आयातित प्राकृतिक गैस पर निर्भरता उद्योगों को भू-राजनीतिक आघातों और मूल्य अस्थिरता के प्रति संवेदनशील बनाती है।
- पश्चिम एशिया जैसे क्षेत्रों में संघर्ष आपूर्ति श्रृंखलाओं को बाधित कर सकते हैं।
- ऊर्जा अक्षमता: पारंपरिक प्रणालियाँ अपेक्षाकृत कम दक्ष होती हैं।
- उदाहरण: गैस बॉयलर निकास ऊष्मा के माध्यम से लगभग 20–30% ऊर्जा खो देते हैं।
- जलवायु प्रभाव: औद्योगिक ऊष्मा वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में महत्वपूर्ण योगदान देती है, जिससे जलवायु लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए इसका डीकार्बोनाइजेशन आवश्यक हो जाता है।
भारत में संरचनात्मक बाधाएँ
- विद्युत ग्रिड की सीमाएँ: यदि उद्योग तीव्र गति से ऊष्मा प्रणालियों का विद्युतीकरण करते हैं, तो विद्युत की मांग में तीव्र वृद्धि होगी।
- औद्योगिक क्लस्टरों को बड़े पैमाने पर और 24×7 निरंतर बिजली आपूर्ति की आवश्यकता होती है।
- किन्तु सौर और पवन जैसी नवीकरणीय ऊर्जा स्रोत अंतरालिक (intermittent) होते हैं तथा भारत की ऊर्जा भंडारण क्षमता अभी सीमित है।
- कमज़ोर वितरण अवसंरचना: औद्योगिक क्लस्टरों के स्थानीय ग्रिड प्रायः पुराने हो चुके हैं। मुख्य समस्याएँ—
- अधिक भार वाले ट्रांसफॉर्मर
- सीमित वितरण क्षमता
- उच्च वोल्टेज उपकेंद्रों की कमी
- अवसंरचना उन्नयन के लिए प्रेषण और वितरण नेटवर्क में बड़े निवेश की आवश्यकता होगी।
औद्योगिक ऊष्मा के लिए उभरते विकल्प
- संकेन्द्रित सौर तापीय : इस तकनीक में दर्पणों की सहायता से सूर्य के प्रकाश को संकेन्द्रित कर ऊष्मा उत्पन्न की जाती है, जबकि सौर फोटोवोल्टाइक विद्युत उत्पादन करते हैं।
- यह लगभग 400°C तक तापमान उत्पन्न कर सकती है, जो वस्त्र, खाद्य प्रसंस्करण और रसायन उद्योगों जैसी कई औद्योगिक प्रक्रियाओं के लिए उपयुक्त है।
- इसके प्रमुख लाभ:
- प्रत्यक्ष औद्योगिक ऊष्मा का उत्पादन
- तापीय भंडारण टैंकों में ऊष्मा का संचयन
- लिथियम-आयन बैटरियों की तुलना में कम भंडारण लागत
- भारत में CST की संभावित क्षमता लगभग 6.4 गीगावाट आंकी गई है, किंतु इसका उपयोग अभी सीमित है।
- औद्योगिक ऊष्मा का विद्युतीकरण: विद्युतीकरण में दहन आधारित प्रणालियों के स्थान पर विद्युत-आधारित हीटिंग तकनीकों का उपयोग किया जाता है। मुख्य तकनीकें:
- इंडक्शन हीटिंग: एक कॉइल से विद्युत धारा प्रवाहित होने पर चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न होता है, जो धातु को सीधे गर्म करता है। इसकी दक्षता अक्सर 90% से अधिक होती है क्योंकि ऊष्मा सीधे पदार्थ में उत्पन्न होती है।
- प्लाज्मा हीटिंग: इसमें गैस को आयनीकृत कर प्लाज्मा (पदार्थ की चौथी अवस्था) में परिवर्तित किया जाता है। प्लाज्मा टॉर्च अत्यधिक उच्च तापमान उत्पन्न कर सकती हैं, जो सिरेमिक, धातु एवं रासायनिक प्रसंस्करण के लिए उपयुक्त है।
वैश्विक उदाहरण
- मिराह परियोजना (ओमान): यह विश्व के सबसे बड़े सौर तापीय संयंत्रों में से एक है, जो तेल उत्पादन सुविधा के साथ एकीकृत है।
- परिणाम: दिन के समय सौर ऊर्जा से भाप उत्पन्न होती है और गैस की खपत लगभग 80% तक कम हो जाती है।
- औद्योगिक प्रक्रियाओं के लिए सौर ऊष्मा (स्पेन): कंपनियों ने ऐसे प्लग-एंड-प्ले सौर तापीय इकाइयाँ विकसित की हैं जिन्हें कारखानों की छतों या पार्किंग स्थलों पर स्थापित कर सीधे मौजूदा भाप नेटवर्क से जोड़ा जा सकता है।
- डेनमार्क के हीट क्रय समझौते: ऊर्जा कंपनियाँ ऊष्मा प्रणालियों की स्थापना और संचालन करती हैं, जबकि कारखाने निश्चित कीमतों पर ऊष्मा खरीदते हैं, जिससे पूंजी निवेश की बाधाएँ कम होती हैं।
भारत में आवश्यक नीतिगत उपाय
- राष्ट्रीय तापीय नीति: भारत में औद्योगिक ऊष्मा के डीकार्बोनाइजेशन पर केंद्रित समग्र नीति का अभाव है। एक राष्ट्रीय ढाँचे में निम्नलिखित शामिल होने चाहिए—
- औद्योगिक ऊष्मा के विद्युतीकरण के लक्ष्य
- सौर तापीय प्रौद्योगिकियों को बढ़ावा
- औद्योगिक ऊर्जा दक्षता उपाय
- CST के लिए प्रोत्साहन: सौर फोटोवोल्टाइक की भांति उत्पादन-संलग्न प्रोत्साहन (PLI) और सौर तापीय संयंत्रों के लिए सब्सिडी जैसी सरकारी प्रोत्साहन योजनाएँ आवश्यक हैं।
- कार्बन बाजार सुधार: भारत की कार्बन क्रेडिट व्यापार योजना उद्योगों को डीकार्बोनाइजेशन के वित्तपोषण में सहायता कर सकती है।
- उत्सर्जन में कमी लाने वाले कारखाने कार्बन क्रेडिट बेचकर पूंजी लागत की भरपाई कर सकते हैं।
- ग्रिड आधुनिकीकरण: उच्च क्षमता वाले ट्रांसफॉर्मर, ऊर्जा भंडारण प्रणालियाँ और स्मार्ट ग्रिड के माध्यम से विद्युत अवसंरचना को सुदृढ़ करना आवश्यक है।
- हाइब्रिड ऊर्जा समाधान: उद्योग विभिन्न तकनीकों को मिलाकर हाइब्रिड प्रणाली अपना सकते हैं, जैसे—
- दिन के समय CST
- अधिक मांग के समय गैस बैकअप
- सटीक प्रक्रियाओं के लिए इंडक्शन हीटिंग
- यह वर्तमान अवसंरचना को पूरी तरह बदले बिना क्रमिक संक्रमण को संभव बनाता है।
निष्कर्ष
- भू-राजनीतिक तनावों से उत्पन्न ऊर्जा व्यवधानों ने भारत के औद्योगिक क्षेत्र की संवेदनशीलता को उजागर किया है। तापीय आत्मनिर्भरता प्राप्त करना ऊर्जा सुरक्षा, औद्योगिक लचीलापन और जलवायु प्रतिबद्धताओं की पूर्ति के लिए अत्यंत आवश्यक है।
- संकेन्द्रित सौर तापीय प्रणालियाँ, विद्युतीकृत हीटिंग तथा हाइब्रिड ऊर्जा समाधान इस दिशा में व्यवहार्य मार्ग प्रदान करते हैं।
- हालाँकि, इसकी सफलता ग्रिड उन्नयन, नीतिगत समर्थन और औद्योगिक नवाचार पर निर्भर करेगी।
- भारत के विनिर्माण क्षेत्र को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी और सतत बनाए रखने के लिए औद्योगिक ऊष्मा का डीकार्बोनाइजेशन राष्ट्रीय प्राथमिकता बनना चाहिए।
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