भारत के कौशल परिणामों पर पुनर्विचार

पाठ्यक्रम: GS3/अर्थव्यवस्था

संदर्भ

  • विगत एक दशक में भारत ने विश्व के सबसे बड़े कौशल पारिस्थितिक तंत्रों में से एक का निर्माण किया है, फिर भी कौशल अधिकांश युवा भारतीयों के लिए प्रथम पसंद का मार्ग नहीं बन पाया है।

परिचय 

  • इंडिया स्किल्स रिपोर्ट 2025 दर्शाती है कि केवल लगभग 2% स्नातक अपनी डिग्री पूरी करने के बाद अतिरिक्त कौशल प्रमाणपत्र प्राप्त करते हैं।
  • 2015 से 2025 के बीच भारत के प्रमुख कौशल कार्यक्रम प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना (PMKVY) ने लगभग 1.40 करोड़ उम्मीदवारों को प्रशिक्षित और प्रमाणित किया है, जो गंभीर सार्वजनिक निवेश एवं नीतिगत प्रयोजन को दर्शाता है।
  • PLFS डेटा दिखाता है कि व्यावसायिक प्रशिक्षण से वेतन वृद्धि मामूली और असंगत है, जिससे प्रमाणित कौशल को सीमित मान्यता मिलती है तथा जीवन की गुणवत्ता में कोई स्पष्ट सुधार नहीं होता।
    • इसके विपरीत, जर्मनी एवं जापान में व्यावसायिक भागीदारी 70% से अधिक है और दक्षिण कोरिया (OECD) में 90% से भी अधिक है।

कौशल को प्राथमिकता न देने के कारण 

  • डिग्रियों की वैधता: डिग्रियाँ दीर्घकालिक गतिशीलता, सामाजिक मान्यता और आर्थिक विश्वसनीयता का संकेत देती हैं।
    • कौशल मान्यता प्राप्त योग्यताओं और प्रगतिशील रोजगार की ओर नहीं ले जाता, इसलिए भागीदारी प्रेरणाहीन हो जाती है।
  • सार्वजनिक प्रमाणपत्रों पर सीमित भरोसा: अधिकांश नियोक्ता सरकारी कौशल प्रमाणपत्रों को विश्वसनीय भर्ती मानक नहीं मानते, बल्कि आंतरिक प्रशिक्षण प्रणालियों, रेफ़रल या निजी प्लेटफ़ॉर्म को प्राथमिकता देते हैं।
  • अप्रेंटिसशिप का असमान प्रभाव: यद्यपि राष्ट्रीय अप्रेंटिसशिप प्रोत्साहन योजना (NAPS) ने उद्योग की भागीदारी बढ़ाई है, लाभ बड़े उद्यमों तक ही सीमित रहे हैं, जबकि MSMEs हाशिये पर हैं।
  • मांग–आपूर्ति असंतुलन: कौशल उद्योग द्वारा उपभोग की जाने वाली चीज़ बनी हुई है, न कि सह-डिज़ाइन की गई। परिणामस्वरूप प्रशिक्षण अक्सर बदलती श्रम-बाज़ार आवश्यकताओं से पीछे रह जाता है।

पारिस्थितिक तंत्र में प्रमुख चुनौतियाँ 

  • सेक्टर स्किल काउंसिल्स (SSCs): ये राष्ट्रीय कौशल विकास निगम (NSDC) के अंतर्गत उद्योग-नेतृत्व वाली संस्थाएँ हैं, जिन्हें कौशल मानक परिभाषित करने, उद्योग प्रासंगिकता सुनिश्चित करने और रोजगार क्षमता बढ़ाने का दायित्व दिया गया है; लेकिन यह दायित्व पूरी तरह से पूरा नहीं हुआ है।
    • AWS, Google Cloud या Microsoft के प्रमाणपत्र इसलिए कार्य करते हैं क्योंकि प्रमाणक की विश्वसनीयता दांव पर होती है।
    • जब तक SSCs को रोजगार क्षमता के लिए जवाबदेह नहीं ठहराया जाता, प्रमाणन प्रतीकात्मक रहेगा, आर्थिक नहीं।
  • जिम्मेदारी का विखंडन: उच्च शिक्षा या तकनीकी संस्थानों के विपरीत, जहाँ प्रतिष्ठा का जोखिम जवाबदेही लागू करता है, कौशल प्रणाली में जिम्मेदारी बिना परिणाम के बिखरी हुई है, जिससे विश्वास कमजोर हुआ है।
  • पाठ्यक्रम डिज़ाइन में उद्योग की कमजोर भूमिका: उद्योग के पास पाठ्यक्रम विकास, प्रमाणन मानकों या मूल्यांकन ढाँचे में भाग लेने के लिए न तो सुदृढ़ प्रोत्साहन हैं और न ही बाध्यकारी दायित्व।
    • गहरे उद्योग स्वामित्व के बिना, कौशल कार्यक्रम प्रासंगिक, विश्वसनीय और विस्तार योग्य बने रहने के लिए संघर्ष करते हैं।

आगे की राह

  • कार्यस्थल-निहित कौशल: NAPS का विस्तार और उद्योग एकीकरण को गहरा करना वास्तविक कार्य वातावरण में कौशल अधिग्रहण को स्थानांतरित करके नौकरी की तैयारी को तीव्रता से सुधार सकता है।
  • औपचारिक शिक्षा के साथ कौशल का एकीकरण: डिग्री और डिप्लोमा मार्गों में कौशल को शामिल करना विश्वसनीयता, आकांक्षा और श्रम-बाज़ार संरेखण को बढ़ाता है।
  • उद्योग को सह-स्वामी बनाना, केवल उपभोक्ता नहीं: उद्योग को कौशल कार्यक्रमों का सह-डिज़ाइनर एवं सह-स्वामी मानना पाठ्यक्रम प्रासंगिकता और भर्ती संरेखण सुनिश्चित करता है।
  • SSCs के लिए परिणाम जवाबदेही: सेक्टर स्किल काउंसिल्स को प्लेसमेंट और रोजगार क्षमता परिणामों के लिए उत्तरदायी बनाना प्रमाणन की विश्वसनीयता पुनर्स्थापित कर सकता है।

निष्कर्ष 

  • भारत का सकल नामांकन अनुपात (GER) 28% है, लेकिन राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 का लक्ष्य है कि यह 2035 तक 50% तक पहुँचे।
  • कौशल को विश्वसनीय और समावेशी रूप से बढ़ाने के लिए इसे औपचारिक शिक्षा प्रणालियों के साथ एकीकृत करना आवश्यक है, न कि उनसे अलग चलाना।
  • उद्योग-संबद्ध, शिक्षा-निहित कौशल भारत की जनसांख्यिकीय शक्ति को सतत आर्थिक विकास और उत्पादकता लाभ में बदलने के लिए आवश्यक है।

Source: TH

 

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