पाठ्यक्रम: GS3/ अर्थव्यवस्था
संदर्भ
- भारत ने दुग्ध क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है, लेकिन छोटे जुगाली करने वाले पशुओं (बकरी, भेड़) और कुक्कुट पालन की संभावनाओं का अभी तक पूर्ण रूप से उपयोग नहीं किया गया है।
भारत का दुग्ध क्षेत्र
- वैश्विक नेतृत्व: भारत विश्व का सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक देश है, जो वैश्विक दुग्ध उत्पादन का 24.76% योगदान देता है।
- उत्पादन वृद्धि: दुग्ध उत्पादन 2014-15 में 146.31 मिलियन टन से बढ़कर 2023-24 में 239.30 मिलियन टन हो गया।
- आर्थिक योगदान: दुग्ध क्षेत्र भारत का सबसे बड़ा कृषि उत्पाद है, जो GDP में 5% योगदान देता है और 8 करोड़ से अधिक किसानों को रोजगार प्रदान करता है।
- विकास प्रदर्शन: पशुपालन क्षेत्र ने 2014-15 से 2020-21 के बीच 7.9% की वार्षिक चक्रवृद्धि दर (CAGR) से वृद्धि की, जो कृषि क्षेत्र से अधिक है।
छोटे जुगाली पशुओं और कुक्कुट पालन की वृद्धि प्रवृत्तियाँ
- बकरी जनसंख्या: भारत में 148 मिलियन बकरियाँ हैं, जो वैश्विक बकरी जनसंख्या का 16% हैं — यह विश्व में सबसे अधिक है।
- भेड़ जनसंख्या: भारत विश्व में तीसरे स्थान पर है, जहाँ 74.26 मिलियन भेड़ें हैं, जो वैश्विक जनसंख्या का 4.03% हैं।
- कुक्कुट पालन: कुल जनसंख्या 851.81 मिलियन है, जो विगत जनगणना से 16.8% की वृद्धि दर्शाती है।
छोटे जुगाली पशुओं और कुक्कुट पालन की भूमिका
- सीमांत किसानों के लिए आजीविका का साधन: बकरी को प्रायः “गरीब आदमी की गाय” कहा जाता है।
- यह भूमिहीन और सीमांत किसानों, विशेष रूप से महिलाओं के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसकी लागत कम होती है और देखभाल आसान होती है।
- संकट के समय आर्थिक सुरक्षा: ये पशु सूखे और फसल विफलता के दौरान वित्तीय सुरक्षा प्रदान करते हैं, जिससे ग्रामीण कमजोर परिवारों की आय बनी रहती है।
- कठिन जलवायु के लिए उपयुक्तता: छोटे जुगाली पशु और कुक्कुट शुष्क, अर्ध-शुष्क और वर्षा आधारित क्षेत्रों के लिए अनुकूल होते हैं, जहाँ फसल उत्पादन और दुग्ध पालन संभव नहीं होता।
- आर्थिक योगदान: छोटे जुगाली पशु दूध, मांस और निर्यात के माध्यम से भारतीय अर्थव्यवस्था में ₹31,449 करोड़ वार्षिक योगदान देते हैं, जो उनकी बढ़ती आर्थिक प्रासंगिकता को दर्शाता है।
विस्तार के लिए आवश्यक प्रमुख हस्तक्षेप
- वैज्ञानिक आहार और पोषण: संतुलित आहार, साइलिज और हे-बेलिंग इकाइयाँ तथा खनिज पूरकता से वजन वृद्धि, प्रजनन प्रदर्शन और दुग्ध उत्पादन में सुधार होता है।
- नस्ल चयन और आवास: स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल देशी नस्लें और बेहतर आवास रोग और मृत्यु दर को कम करते हैं।
- स्वास्थ्य और रोग प्रबंधन: नियमित टीकाकरण, कृमिनाशन, बाह्य परजीवी नियंत्रण और पारंपरिक पशु चिकित्सा पद्धतियाँ मृत्यु दर को घटाती हैं तथा झुंड का स्वास्थ्य सुधारती हैं।
- मूल्य श्रृंखला एकीकरण: सीधे बाजार तक पहुँच और मूल्यवर्धित उत्पादों का समर्थन लाभप्रदता को बढ़ाता है।
- समुदाय आधारित मॉडल: सहकारी समितियाँ और महिला-केंद्रित मॉडल ज्ञान साझा करने, सामूहिक सौदेबाज़ी एवं वित्त व तकनीक तक पहुँच को बढ़ावा देते हैं।
- सतत प्रथाएँ: सिल्वीपास्तोरल प्रणाली, कृषि वानिकी प्रणाली, वैकल्पिक पर्यावरण अनुकूल चारा (फसल अवशेष, झाड़ियाँ, दलहन) और जलवायु अनुकूल मॉडल उत्पादकता और स्थायित्व को बढ़ाते हैं।
आगे की राह
- छोटे जुगाली पशुओं की पूरी क्षमता को प्राप्त करने के लिए भारत को मजबूत नीति और विस्तार समर्थन, सरल सब्सिडी पहुँच, बुनियादी ढांचे में निवेश और जलवायु अनुकूल, सतत प्रथाओं की आवश्यकता है।
- बकरी और भेड़ के लिए NDDB की तर्ज पर एक विशेष एजेंसी का गठन इन क्षेत्रों को संगठित, उच्च प्रभाव वाली मूल्य श्रृंखलाओं में बदलने में सहायता कर सकता है, जैसा कि दुग्ध क्षेत्र में हुआ है।
Source: DTE
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