लैंगिक न्याय का अंतर: किसी भी देश ने महिलाओं के लिए पूर्ण कानूनी समानता प्राप्त नहीं की है

पाठ्यक्रम: GS1/समाज; GS2/महिलाओं से संबंधित मुद्दे

संदर्भ

  • हाल ही में अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर यूएन वूमेन(UN Women) ने एक वैश्विक चेतावनी जारी की, जिसमें विश्वभर की न्यायिक व्यवस्थाओं में गंभीर अंतरालों को उजागर किया गया।

यूएन रिपोर्ट के प्रमुख निष्कर्ष

  • वैश्विक कानूनी असमानता: विश्वभर में महिलाओं के पास पुरुषों की तुलना में केवल 64% कानूनी अधिकार हैं।
    • कई राष्ट्रीय कानूनी व्यवस्थाएँ महिलाओं के अधिकारों की पर्याप्त सुरक्षा करने में विफल रही हैं।
    • कमजोर न्यायिक तंत्र कानून के शासन और लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करते हैं।
  • महिलाओं को प्रभावित करने वाले प्रमुख कानूनी अंतराल: 54% देशों में बलात्कार की परिभाषा सहमति पर आधारित नहीं है। इससे अभियोजन सीमित होता है और यौन हिंसा के कई रूपों को मान्यता नहीं मिलती।
    • लगभग तीन-चौथाई देशों में अब भी कुछ शर्तों के अंतर्गत लड़कियों का कानूनी विवाह संभव है।
  • आर्थिक भेदभाव: 44% देशों में समान मूल्य के कार्य के लिए समान वेतन सुनिश्चित करने वाले कानून नहीं हैं।
    • यह कानूनी अंतराल लैंगिक वेतन अंतर और आर्थिक असमानता को स्थायी बनाता है।
  • महिलाओं के अधिकारों पर बढ़ते खतरे: यूएन वूमेन ने चेतावनी दी है कि कमजोर प्रवर्तन और जवाबदेही की कमी के कारण महिलाओं के अधिकारों का उल्लंघन बढ़ रहा है।
    • तीव्र तकनीकी विस्तार ने ऑनलाइन उत्पीड़न, साइबर-स्टॉकिंग और डिजिटल दुर्व्यवहार को जन्म दिया है।
  • संघर्ष में यौन हिंसा: बलात्कार अब भी युद्ध के हथियार के रूप में प्रयुक्त होता है।
    • विगत दो वर्षों में यौन हिंसा के मामलों में 87% की वृद्धि दर्ज की गई है।

न्याय तक पहुँच में बाधाएँ

  • सामाजिक मानदंड और कलंक: पीड़िता को दोषी ठहराना और सामाजिक दबाव रिपोर्टिंग को हतोत्साहित करते हैं।
  • संस्थागत बाधाएँ: पुलिस, न्यायालय और कानूनी संस्थाओं पर विश्वास की कमी।
  • व्यावहारिक सीमाएँ: उच्च कानूनी लागत, लंबी न्यायिक प्रक्रिया, भाषा संबंधी बाधाएँ और कानूनी जागरूकता का अभाव।
  • दण्डमुक्ति और कमजोर प्रवर्तन: स्त्रीहत्या और यौन हिंसा जैसे अपराध प्रायः बिना दंडित रह जाते हैं।

उभरती वैश्विक चुनौतियाँ

  • लैंगिक समानता के विरुद्ध प्रतिक्रिया: हाल के वर्षों में कई देशों में लैंगिक समानता नीतियों के प्रति बढ़ता विरोध देखा गया है।
    • महिलाओं की स्वतंत्रता और भागीदारी को सीमित करने वाले कानून लागू किए जा रहे हैं।
    • राजनीतिक और सार्वजनिक क्षेत्रों में महिलाओं की आवाज़ को दबाया जा रहा है।
  • डिजिटल और ऑनलाइन हिंसा: तीव्र तकनीकी वृद्धि ने महिलाओं को लक्षित करते हुए ऑनलाइन उत्पीड़न, साइबर-बुलिंग और डिजिटल दुर्व्यवहार को बढ़ावा दिया है।
    • कमजोर नियमन के कारण अपराधियों को दण्डमुक्ति मिलती है।

अब तक हुई प्रगति

  • 87% देशों ने घरेलू हिंसा विरोधी कानून बनाए हैं।
  • विगत दशक में 40 से अधिक देशों ने महिलाओं और लड़कियों के लिए संवैधानिक संरक्षण को सुदृढ़ किया है।
  • CEDAW, SDG-5 (लैंगिक समानता) और यूएनएससी प्रस्ताव 1325 जैसे अंतर्राष्ट्रीय ढाँचे ने सुधारों को प्रोत्साहित किया है।
    • तथापि, केवल कानून पर्याप्त नहीं हैं यदि उनका प्रभावी क्रियान्वयन न हो।

वैश्विक आह्वान

  • अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस 2026 की थीम ‘अधिकार. न्याय. कार्रवाई. सभी महिलाओं और लड़कियों के लिए’ त्वरित सुधारों पर बल देती है:
    • लैंगिक हिंसा के लिए दण्डमुक्ति समाप्त करें।
    • कानून के शासन और लैंगिक-संवेदनशील न्यायिक तंत्र को सुदृढ़ करें।
    • समान कानूनी अधिकार और आर्थिक अवसर सुनिश्चित करें।
    • ऑनलाइन दुर्व्यवहार रोकने हेतु डिजिटल प्लेटफॉर्म का नियमन करें।
    • महिलाओं के लिए कानूनी जागरूकता और सुलभ कानूनी सहायता को बढ़ावा दें।
  • महिलाओं की स्थिति पर आयोग (CSW) का 70वाँ सत्र वैश्विक स्तर पर पिछड़ेपन को दूर करने और लैंगिक न्याय को तीव्रता से आगे बढ़ाने का एक महत्वपूर्ण अवसर माना जा रहा है।

भारत और महिलाएँ: संवैधानिक प्रावधान

  • अनुच्छेद 14: कानून के समक्ष समानता।
  • अनुच्छेद 15(1) एवं 15(3): भेदभाव का निषेध और महिलाओं के लिए विशेष प्रावधान।
  • अनुच्छेद 39(d): समान कार्य के लिए समान वेतन।

प्रमुख कानून

  • महिला घरेलू हिंसा से संरक्षण अधिनियम (2005)
  • कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न से संरक्षण अधिनियम (2013)
  • बाल विवाह निषेध अधिनियम (2006)

Source: DTE

 

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