प्रधानमंत्री द्वारा भारतीयों से ‘वोकल फॉर लोकल’ मंत्र अपनाने का आग्रह

पाठ्यक्रम: GS3/अर्थव्यवस्था

संदर्भ

  • हाल ही में अपने नवीनतम ‘मन की बात’ संबोधन में भारत के प्रधानमंत्री ने नागरिकों से ‘वोकल फॉर लोकल’ के मंत्र को अपनाने का पुनः आह्वान किया, और आत्मनिर्भर भारत के निर्माण हेतु स्वदेशी उत्पादों के समर्थन की महत्ता को रेखांकित किया।

‘वोकल फॉर लोकल’ पहल के बारे में 

  • यह पहल 2024 में नीति आयोग द्वारा अपनी आकांक्षी ब्लॉक कार्यक्रम के अंतर्गत शुरू की गई थी। 
  • इसका उद्देश्य स्थानीय रूप से निर्मित उत्पादों, कारीगरों एवं उद्योगों को समर्थन देकर भारत की अर्थव्यवस्था को सशक्त बनाना और आयात पर निर्भरता को कम करना है। 
  • यह महात्मा गांधी द्वारा संचालित स्वदेशी आंदोलन से प्रेरणा लेती है, लेकिन इसे वैश्वीकरण और डिजिटल बाजारों की आधुनिक पृष्ठभूमि में प्रस्तुत किया गया है।
  • india.gov.in, सरकारी ई-मार्केटप्लेस (GeM), एवं ओपन नेटवर्क फॉर डिजिटल कॉमर्स (ONDC) जैसे सरकारी प्लेटफॉर्म स्थानीय खरीद को बढ़ावा देते हैं और स्वदेशी नवाचारों को प्रदर्शित करते हैं।

उद्देश्य: ‘वोकल फॉर लोकल’ क्यों? 

  • आर्थिक आत्मनिर्भरता: भारतीय वस्तुओं को बढ़ावा देकर यह अभियान घरेलू उद्योगों, MSMEs और स्टार्टअप्स को सशक्त करता है।
  •  रोजगार सृजन: स्थानीय निर्माण ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में रोजगार के अवसर उत्पन्न करता है। 
  • सांस्कृतिक पहचान: पारंपरिक शिल्प, हथकरघा और स्वदेशी प्रथाओं के संरक्षण को प्रोत्साहित करता है। 
  • आयात पर निर्भरता में कमी: भारत को विनिर्माण केंद्र बनाने की दृष्टि को समर्थन देता है और विदेशी आपूर्ति श्रृंखलाओं पर निर्भरता को घटाता है। 
  • वैश्विक प्रतिस्पर्धा: उद्देश्य है कि ‘स्थानीय वैश्विक बने’—ऐसे ब्रांड्स का निर्माण जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का प्रतिनिधित्व करें।

‘वोकल फॉर लोकल’ के प्रमुख उदाहरण 

  • खादी एवं ग्रामोद्योग: बिक्री ₹1.25 लाख करोड़ से अधिक हो गई है, और खादी राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक बनकर आत्मनिर्भरता का प्रतीक भी बन गई है। 
  • GI-टैग प्राप्त उत्पाद: पोचमपल्ली इकट, पश्मीना, दार्जिलिंग चाय से लेकर मधुबनी चित्रकला तक—पारंपरिक शिल्प वैश्विक पहचान प्राप्त कर रहे हैं। 
  • हथकरघा एवं हस्तशिल्प – ‘एक जिला एक उत्पाद’ (ODOP) और ‘प्रधानमंत्री विश्वकर्मा योजना’ जैसी योजनाएँ कारीगरों को प्रोत्साहित करती हैं। 
  • डिजिटल इंडिया उत्पाद: UPI, RuPay और भारत में निर्मित फिनटेक ऐप्स व्यापक रूप से अपनाए जा चुके हैं। 
  • स्टार्टअप्स और MSMEs: ‘स्टार्टअप इंडिया’ और ‘मेक इन इंडिया’ जैसी सरकारी योजनाओं ने हजारों स्थानीय उद्यमियों को आगे बढ़ने में सहायता की है। 
  • त्योहार अभियान – दीपावली, रक्षाबंधन एवं होली जैसे त्योहारों पर नागरिकों से स्थानीय रूप से निर्मित दीये, मिठाइयाँ और हस्तशिल्प खरीदने का आग्रह किया जाता है।

प्रमुख चिंताएँ 

  • गुणवत्ता मानक: स्थानीय उत्पादों को प्रायः वैश्विक ब्रांड्स की तुलना में असंगत गुणवत्ता के लिए आलोचना का सामना करना पड़ता है। 
  • मूल्य प्रतिस्पर्धा: चीन जैसे देशों से आयातित वस्तुएँ कभी-कभी सस्ती होती हैं, जिससे भारतीय निर्माताओं को चुनौती मिलती है। 
  • डिजिटल मार्केटिंग अंतर: कई स्थानीय कारीगरों और MSMEs को आधुनिक ई-कॉमर्स उपकरणों की पहुंच नहीं है। 
  • आपूर्ति श्रृंखला की बाधाएँ: बुनियादी ढांचे और लॉजिस्टिक्स की समस्याएँ स्थानीय उत्पादकों को प्रभावित करती हैं। 
  • सततता संबंधी मुद्दे: पारंपरिक शिल्पों का अत्यधिक व्यावसायीकरण उनकी प्रामाणिकता और पारिस्थितिक संतुलन को खतरे में डाल सकता है। 
  • वैश्विक व्यापार दबाव: संरक्षणवादी दृष्टिकोण अंतरराष्ट्रीय व्यापार समझौतों में तनाव उत्पन्न कर सकते हैं।

आगे की राह 

  • ‘वोकल फॉर लोकल’ की दीर्घकालिक सफलता के लिए भारत को निवेश करना होगा:
    • कौशल विकास और नवाचार में;
    • छोटे व्यवसायों के लिए डिजिटल अवसंरचना में;
    • गुणवत्ता और प्रतिस्पर्धा के लिए नीति समर्थन में;
  • सचेत विकल्प चुनकर, प्रत्येक भारतीय अधिक लचीली और आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था में योगदान दे सकता है।

Source: TH

 

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