भारत में ट्रांस पुरुषों के लिए पूर्वाग्रह और स्वास्थ्य सेवा तक पहुंच

पाठ्यक्रम: GS1/समाज, GS2/शासन

संदर्भ

  • कानूनी मान्यता और कल्याणकारी पहलों के बावजूद, ट्रांसजेंडर पुरुष एवं जन्म से महिला (AFAB) के रूप में पहचाने गए लैंगिक-विविध व्यक्ति भारत में अब भी प्रणालीगत भेदभाव तथा समावेशी स्वास्थ्य सेवाओं तक अपर्याप्त पहुँच का सामना करते हैं।

स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच में प्रमुख समस्याएँ

  • संरचनात्मक और संस्थागत बाधाएँ: सार्वजनिक स्वास्थ्य संस्थानों में निरंतर गलत लैंगिक पहचान, निर्णयात्मक दृष्टिकोण और देखभाल से इनकार।
    • स्वास्थ्य सेवाओं की पहुँच ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 के अंतर्गत लैंगिक पहचान प्रमाणपत्रों से जुड़ी है, जिससे प्रशासनिक अवरोध उत्पन्न होते हैं।
    • चिकित्सा पेशेवरों में लैंगिकता की द्विआधारी समझ ट्रांसमैस्क्युलिन और नॉन-बाइनरी पहचानों को बाहर कर देती है।
  • ज्ञान और अनुसंधान की कमी: भारत में ट्रांस पुरुषों और AFAB व्यक्तियों के लिए लैंगिक-पुष्टि देखभाल पर सीमित शोध।
    • चिकित्सा पाठ्यक्रम और नैदानिक अभ्यास मुख्य रूप से ट्रांस महिलाओं के अनुभवों से प्रभावित हैं, जिससे ट्रांस पुरुषों पर असमान ध्यान दिया जाता है।
    • विविध लैंगिक पहचानों और यौन विशेषताओं (GIESC) के लिए ICMR समर्थित, भारत-विशिष्ट नैतिक एवं पुष्ट चिकित्सा प्रोटोकॉल का अभाव।
  • अनैतिक प्रथाएँ: हिस्टेरेक्टॉमी जैसी चिकित्सकीय रूप से आवश्यक प्रक्रियाओं से मनाही, पितृसत्तात्मक और प्रजनन पूर्वाग्रहों के कारण।
    • अनावश्यक आक्रामक परीक्षणों की रिपोर्टें, जो शारीरिक स्वायत्तता और चिकित्सा नैतिकता का उल्लंघन करती हैं।
  • हार्मोन रिप्लेसमेंट थेरेपी (HRT) में चुनौतियाँ: टेस्टोस्टेरोन थेरेपी की खुराक, जोखिम और दीर्घकालिक दुष्प्रभावों पर अपर्याप्त परामर्श।
    • शरीर के वजन या स्वास्थ्य स्थितियों से जुड़ी मानकीकृत खुराक दिशानिर्देशों का अभाव।
    • ट्रांस-पुष्टि एंडोक्रिनोलॉजिस्ट तक सीमित पहुँच और सार्वजनिक बीमा योजनाओं में प्रशासनिक बाधाओं के कारण आत्म-औषधि का उच्च स्तर।

इसके निहितार्थ क्या हैं?

  • नैतिक निहितार्थ: यह सार्वजनिक सेवा वितरण में नैतिकता, सहानुभूति और जीवन-अनुभवों के कमजोर एकीकरण को दर्शाता है।
    • गरिमामय स्वास्थ्य सेवा से मनाही अनुच्छेद 21 (जीवन और गरिमा का अधिकार) का उल्लंघन करता है।
    • औपचारिक समानता (कानून) और वास्तविक समानता (परिणाम) के बीच अंतर को उजागर करता है।
  • स्वास्थ्य निहितार्थ: आत्म-औषधि और असुरक्षित हार्मोन उपयोग को बढ़ाता है, जिससे दीर्घकालिक स्वास्थ्य जोखिम बढ़ते हैं।
    • यह खराब मानसिक स्वास्थ्य परिणामों की ओर ले जाता है, जिनमें चिंता, अवसाद और तनाव शामिल हैं।
  • आर्थिक निहितार्थ: खराब स्वास्थ्य परिणामों के कारण उत्पादक कार्यबल की भागीदारी की हानि।

सरकार द्वारा उठाए गए कदम

  • ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019: संसद द्वारा पारित यह कानून शिक्षा, रोजगार और स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के विरुद्ध भेदभाव को समाप्त करने तथा आत्म-धारित लैंगिक पहचान के अधिकार को मान्यता देने का लक्ष्य रखता है।
  • राष्ट्रीय ट्रांसजेंडर व्यक्ति परिषद: अधिनियम 2019 के अनुपालन में गठित, यह परिषद केंद्र सरकार को नीतियों, कार्यक्रमों, कानूनों और परियोजनाओं के निर्माण एवं मूल्यांकन पर परामर्श देती है।
  • राष्ट्रीय ट्रांसजेंडर व्यक्ति पोर्टल: 2020 में सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय द्वारा लॉन्च किया गया।
    • कोई भी ट्रांसजेंडर आवेदक बिना किसी भौतिक संपर्क के पहचान प्रमाणपत्र और पहचान पत्र प्राप्त कर सकता है।
  • मित्र क्लिनिक: भारत का प्रथम ट्रांसजेंडर-नेतृत्व वाला स्वास्थ्य केंद्र, हैदराबाद, तेलंगाना में स्थापित। यह पूरी तरह से ट्रांस समुदाय के सदस्यों द्वारा संचालित है।
    • जनवरी 2025 में वित्तपोषण कटौती के कारण बंद हुआ लेकिन टाटा ट्रस्ट्स के समर्थन से सबरंग क्लिनिक के रूप में फिर से खोला गया।
    • सेवाएँ: सामान्य स्वास्थ्य सेवाएँ; हार्मोन रिप्लेसमेंट थेरेपी पर नैदानिक परामर्श; एचआईवी/यौन संचारित संक्रमण (STI) का उपचार आदि।

न्यायिक उपाय

  • राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (NLSA) बनाम भारत संघ (2014), जिसे प्रसिद्ध रूप से NALSA केस कहा जाता है, के निम्नलिखित निहितार्थ हैं:
    • न्यायालय ने केंद्र और राज्य सरकारों को लैंगिक पहचान की कानूनी मान्यता देने का निर्देश दिया, चाहे वह पुरुष, महिला या तीसरा-लिंग हो।
    • तीसरे-लिंग व्यक्तियों को “सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े नागरिक वर्ग” के रूप में मान्यता दी गई, जिन्हें शैक्षणिक संस्थानों एवं सार्वजनिक रोजगार में आरक्षण का अधिकार है।

आगे की राह

  • नीति और संस्थागत सुधार: लैंगिक-पुष्टि देखभाल के लिए ICMR-नेतृत्व वाले, भारत-विशिष्ट, साक्ष्य-आधारित प्रोटोकॉल विकसित करना।
  • क्षमता निर्माण: चिकित्सा शिक्षा और सेवा-कालीन कार्यक्रमों में अनिवार्य लैंगिक-पुष्टि प्रशिक्षण।
    • भारतीय सामाजिक-आर्थिक वास्तविकताओं के अनुरूप WPATH (ट्रांसजेंडर स्वास्थ्य के लिए विश्व व्यावसायिक संघ) प्रोटोकॉल को अपनाने की आवश्यकता।
  • समुदाय-केंद्रित दृष्टिकोण: सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा वितरण में जीवन-अनुभव वाले सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं का समावेश।
  • नियमन और सुरक्षा: HRT खुराक, निगरानी और फॉलो-अप के लिए मानकीकृत दिशानिर्देश।

निष्कर्ष

  • ट्रांस पुरुषों और लैंगिक-विविध व्यक्तियों द्वारा स्वास्थ्य सेवाओं में सामना की जाने वाली चुनौतियाँ ज्ञान की कमी, पितृसत्तात्मक मानदंडों एवं अधिकार-आधारित कानूनों के कमजोर कार्यान्वयन जैसी गहरी प्रणालीगत समस्याओं को दर्शाती हैं।
  • इन अंतरालों को दूर करना न केवल समावेशी स्वास्थ्य सेवा के लिए आवश्यक है बल्कि भारत में संवैधानिक नैतिकता, सामाजिक न्याय और नैतिक शासन को आगे बढ़ाने के लिए भी अनिवार्य है।

Source: TH


 

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