नेपाल में आकस्मिक बाढ़ आपदा

पाठ्यक्रम: जीएस-1/भूगोल; जीएस-3/आपदा प्रबंधन

सन्दर्भ

  • हाल ही में, नेपाल में ल्हेंदे खोला और भोटे कोशी नदी तंत्र में एक आकस्मिक बाढ़ आई, जिसने बिहार और उत्तर प्रदेश के निचले क्षेत्रों के लिए क्रमिक जोखिमों को उजागर किया।
  • नेपाल में भोटे कोशी नदी घाटी काठमांडू और तिब्बत में ल्हासा के बीच मुख्य संपर्क मार्ग है।

आकस्मिक बाढ़ का परिचय

  • आकस्मिक बाढ़ जल के स्तर में अचानक और तीव्र वृद्धि तथा उसके फैलाव को कहते हैं, जो सामान्यतः अत्यधिक वर्षा, बादल फटने, बाँध या तटबंध के टूटने, अथवा ग्लेशियरों या भूस्खलन से बनी झीलों से अचानक जल छोड़े जाने के कुछ घंटों के भीतर होती है।
  • क्रमिक रूप से आने वाली नदीय बाढ़ के विपरीत, इसका चेतावनी देने का समय बहुत कम और प्रवाह की गति बहुत अधिक होती है, जिससे यह विशेष रूप से विनाशकारी बन जाती है।
  • तीव्र ढलान वाला भू-भाग, संकरी घाटियाँ और तेजी से प्रतिक्रिया करने वाले जलग्रहण क्षेत्र इस खतरे को और बढ़ा देते हैं।
  • आकस्मिक बाढ़ की तीव्र शुरुआत, कम जलवैज्ञानिक प्रतिक्रिया समय और सीमित चेतावनी के कारण, विशेष रूप से पर्वतीय तथा घनी आबादी वाले क्षेत्रों में, यह पूर्वानुमान लगाने के लिए सबसे चुनौतीपूर्ण जल-मौसम संबंधी खतरों में से एक है।

हाल के उदाहरण

  • नेपाल की आकस्मिक बाढ़: ऐसा प्रतीत होता है कि यह मौसम संबंधी और भूवैज्ञानिक कारकों के जटिल संयोजन के परिणामस्वरूप हुई।
  • पश्चिमी विक्षोभ से संबंधित तीव्र वर्षा और प्रचलित मौसम प्रणालियों के साथ उसकी अंतःक्रिया ने इस आपदा में योगदान दिया हो सकता है।
  • किसी उच्च-ऊँचाई वाले हिमनदीय या अस्थिर पर्वतीय क्षेत्र से जल और मलबे का अचानक निकलना संभावित कारण के रूप में देखा गया है, जो हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र की बढ़ती सम्वेदनशीलता एवं नाजुकता को उजागर करता है।
  • भारत और हिमालयी क्षेत्र ने कई विनाशकारी घटनाएँ देखी हैं, जिनमें केदारनाथ आपदा (2013), चमोली आकस्मिक बाढ़ (2021), हिमाचल प्रदेश में बार-बार आने वाली बाढ़ और भूस्खलन, तथा जम्मू-कश्मीर में हाल की बादल फटने से प्रेरित आपदाएँ शामिल हैं।

आकस्मिक बाढ़ के संभावित कारण

  • अत्यधिक वर्षा एवं बादल फटना: कम अवधि में होने वाली अत्यधिक तीव्र वर्षा जल निकासी प्रणालियों और पर्वतीय जलधाराओं की क्षमता को पार कर सकती है।
  • पश्चिमी विक्षोभ–मानसून अंतःक्रिया: बड़े पैमाने की मौसम प्रणालियों के बीच अंतःक्रिया हिमालय के ऊपर वर्षा की तीव्रता को बढ़ा सकती है।
  • जलवायु परिवर्तन: अधिक गर्म वायुमंडल अधिक नमी धारण करता है, जिससे अत्यधिक वर्षा की संभावना बढ़ जाती है, जबकि ग्लेशियरों के पीछे हटने और हिमनद झीलों के विस्तार से GLOF (हिमनद झील विस्फोट बाढ़) का जोखिम बढ़ जाता है।
  • भू-आकृति विज्ञान: युवा एवं नाजुक पर्वत, तीव्र ढलान तथा अस्थिर तलछट अपवाह और मलबा प्रवाह को तेज कर देते हैं।
  • मानवजनित कारक: वनों की कटाई, अव्यवस्थित निर्माण, बाढ़ के मैदानों पर अतिक्रमण और खराब तरीके से डिजाइन किया गया बुनियादी ढाँचा प्राकृतिक जल अवशोषण को कम करता है तथा जल निकासी में बाधा उत्पन्न करता है।

भारत की संवेदनशीलता

  • हिमालयी चाप, पूर्वोत्तर और पश्चिमी घाटों के साथ-साथ अपर्याप्त जल निकासी वाली तेजी से शहरीकरण कर रही शहरों के कारण भारत अत्यधिक संवेदनशील है।
  • हिमालयी राज्य बादल फटने, भूस्खलन और हिमनदीय खतरों से उत्पन्न संयुक्त जोखिम का सामना करते हैं।
  • इसके अलावा, कोसी और गंडक जैसी अंतरराष्ट्रीय नदियाँ ऊपरी क्षेत्रों के जोखिमों को घनी आबादी वाले मैदानी क्षेत्रों तक पहुँचाती हैं, जिससे पड़ोसी देशों के साथ सहयोग महत्वपूर्ण हो जाता है।

प्रभाव

  • आकस्मिक बाढ़ से जन एवं पशुधन की हानि, घरों, सड़कों, पुलों और जलविद्युत परिसंपत्तियों का विनाश तथा कृषि और आजीविका में व्यवधान होता है।
  • ये भूस्खलन और मलबा प्रवाह जैसी द्वितीयक आपदाओं को जन्म देती हैं, जल आपूर्ति को दूषित करती हैं और कमजोर समुदायों को असमान रूप से प्रभावित करती हैं।
  • बार-बार आने वाली आपदाएँ विकास से प्राप्त लाभों को नष्ट कर सकती हैं और सरकार पर पर्याप्त राजकोषीय लागत डाल सकती हैं।

वैश्विक प्रयास एवं पहल

  • आपदा जोखिम न्यूनीकरण के लिए सेंडाई फ्रेमवर्क (2015–2030) जोखिम को समझने, आपदा प्रबंधन को मजबूत करने और लचीलापन बढ़ाने में निवेश करने पर जोर देता है।
  • WMO की ‘सभी के लिए प्रारंभिक चेतावनी’ (Early Warnings for All) पहल प्रभावी बहु-जोखिम चेतावनी प्रणालियों के माध्यम से सार्वभौमिक सुरक्षा सुनिश्चित करने का प्रयास करती है।
  • हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय सहयोग भी डेटा साझा करने और हिमनदीय निगरानी के लिए समान रूप से महत्वपूर्ण है।

भारत के प्रयास एवं पहल

  • भारत ने आपदा प्रबंधन अधिनियम, NDMA के दिशा-निर्देशों, भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) और केंद्रीय जल आयोग (CWC) की पूर्वानुमान प्रणालियों के माध्यम से आपदा तैयारियों को मजबूत किया है।
  • आकस्मिक बाढ़ मार्गदर्शन प्रणाली (Flash Flood Guidance System—FFGS) कम अवधि की बाढ़ के पूर्वानुमान को बेहतर बनाती है, जबकि उपग्रह-आधारित निगरानी और डॉप्लर मौसम रडार स्थिति की जानकारी को बेहतर बनाते हैं।
  • भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (Geological Survey of India) और आपदा-प्रतिक्रिया एजेंसियों जैसी संस्थाएँ खतरे के आकलन और आपातकालीन प्रतिक्रिया में योगदान देती हैं।

आगे की राह

  • भारत को नदी बेसिन-आधारित, बहु-जोखिम दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है, जिसमें बेहतर मौसम पूर्वानुमान, वास्तविक समय में नदी एवं हिमनदी निगरानी, जोखिम-संवेदनशील भूमि उपयोग नियोजन तथा लचीला बुनियादी ढाँचा शामिल हो।
  • समुदाय-आधारित प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों को पूर्वानुमानों को समय पर निकासी में परिवर्तित करने में सक्षम बनाया जाना चाहिए।
  • महत्वपूर्ण रूप से, हिमालयी आपदा प्रबंधन के लिए सीमा-पार डेटा साझा करना और सहयोग आवश्यक है।
  • नाजुक पर्वतीय पारिस्थितिकी तंत्रों में विकास को वहन क्षमता आकलन और पारिस्थितिक सुरक्षा उपायों के अनुरूप होना चाहिए।
  • अंततः, आकस्मिक बाढ़ के बढ़ते खतरे को कम करने के लिए आपदा के बाद राहत से पूर्व-प्रत्याशित कार्रवाई और जलवायु-लचीले विकास की ओर बदलाव आवश्यक है।

स्रोत: IE

 

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