पाठ्यक्रम: GS2/अंतर्राष्ट्रीय संबंध; वैश्विक समूह
संदर्भ
- भारत ने वर्ष 2026 में विकास के लिए वित्तपोषण (FfD) पर आयोजित ECOSOC फोरम तथा संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) सुधार संबंधी चर्चाओं में UNSC के त्वरित पुनर्गठन, वैश्विक दक्षिण के अधिक प्रतिनिधित्व तथा वैश्विक वित्तीय संरचना में सुधार की आवश्यकता पर बल दिया।
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) से संबंधित समस्याएँ
- पुरानी संरचना : यह संरचना द्वितीय विश्व युद्ध (1945) के पश्चात की शक्ति-संतुलन व्यवस्था को दर्शाती है तथा वर्तमान वैश्विक परिदृश्य, जैसे भारत, ब्राज़ील, जर्मनी, जापान का उदय तथा अफ्रीका एवं वैश्विक दक्षिण के बढ़ते महत्व को प्रतिबिंबित नहीं करती।
- प्रतिनिधित्व का अभाव : अफ्रीका एवं लैटिन अमेरिका के पास कोई स्थायी सदस्यता नहीं है। वैश्विक दक्षिण का प्रतिनिधित्व अपर्याप्त है, जिससे लोकतांत्रिक कमी (Democratic Deficit) उत्पन्न होती है।
- वीटो शक्ति की समस्या : स्थायी सदस्य (P5) — अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, रूस एवं चीन — के पास वीटो शक्ति है, जो मानवीय संकटों के समय भी निर्णयों को अवरुद्ध कर देती है। इससे नीति-निर्माण में गतिरोध उत्पन्न होता है (जैसे सीरिया एवं यूक्रेन संघर्ष)। इसे अलोकतांत्रिक एवं असमान माना जाता है।
- वैधता का संकट UNSC के निर्णय प्रायः महाशक्तियों की राजनीति से प्रभावित एवं पक्षपाती माने जाते हैं, जिससे इसके प्रस्तावों पर विश्वास कम होता है।
- संघर्ष समाधान में अक्षमता : युद्धों की रोकथाम एवं दीर्घकालिक संघर्षों के समाधान में विफलता।
- शांति स्थापना अभियानों की सफलता P5 देशों के राजनीतिक मतभेदों से सीमित हो जाती है।
- भूराजनीतिक प्रतिस्पर्धा अमेरिका बनाम चीन तथा रूस बनाम पश्चिम के बीच बढ़ते तनाव निर्णय-निर्माण में अवरोध उत्पन्न करते हैं।
- धीमी सुधार प्रक्रिया : सुधार हेतु संयुक्त राष्ट्र चार्टर में संशोधन आवश्यक है, जिसके लिए 2/3 सदस्य देशों तथा सभी P5 की स्वीकृति अनिवार्य है। राजनीतिक विरोध सुधारों में विलंब करता है।
- क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धा : भारत-पाकिस्तान तथा ब्राज़ील-अर्जेंटीना जैसे देशों के बीच मतभेद सुधार प्रक्रिया को कमजोर करते हैं।
- विकास संबंधी मुद्दों पर सीमित ध्यान : UNSC सुरक्षा पर अधिक ध्यान देता है, जबकि जलवायु परिवर्तन, महामारी एवं आर्थिक अस्थिरता जैसे उभरते खतरों की उपेक्षा करता है।
UNSC सुधार पर भारत की स्थिति
- मुख्य तर्क : वर्तमान UNSC संरचना पुरानी एवं विकासशील देशों के अपर्याप्त प्रतिनिधित्व वाली है।
- भारत की मांगें : स्थायी एवं अस्थायी दोनों प्रकार की सदस्यता का विस्तार।
- वैश्विक दक्षिण एवं अफ्रीका को अधिक प्रतिनिधित्व (अफ्रीकी मॉडल के अनुरूप)।
- भारत की मांगें : स्थायी एवं अस्थायी दोनों प्रकार की सदस्यता का विस्तार।
- प्रमुख समूह : यह UNSC की वैधता एवं प्रभावशीलता को बढ़ाता है तथा भारत की स्थायी सदस्यता की आकांक्षा के अनुरूप है।
- G4 देश : भारत, ब्राज़ील, जर्मनी एवं जापान।
- अफ्रीकी संघ : दो स्थायी सीटों की मांग।
- L.69 समूह : सुधार का समर्थन करने वाले विकासशील देशों का समूह।
- भारत एवं संयुक्त राष्ट्र शांति स्थापना: भारत शांति स्थापना अभियानों में सबसे बड़े योगदानकर्ताओं में से एक है; 1948 से अब तक 2,75,000 से अधिक कर्मियों ने भाग लिया है।
- मुख्य फोकस क्षेत्र : संघर्ष समाधान एवं शांति निर्माण।
- हालिया सहभागिता : चर्चाएँ शांति स्थापना अभियानों को सुदृढ़ करने पर केंद्रित रहीं।
सुधार में बाधाएँ एवं कारण
- चीन, रणनीतिक प्रतिस्पर्धा के आधार पर भारत की स्थायी सदस्यता का विरोध करता है तथा अपने वीटो के माध्यम से चार्टर संशोधन को रोक सकता है।
- इटली एवं पाकिस्तान के नेतृत्व वाला ‘यूनाइटिंग फॉर कंसेंसस’ (Coffee Club) समूह स्थायी सदस्यता के विस्तार का विरोध करता है।
- चार्टर संशोधन हेतु अनुच्छेद 23, 27 एवं 108 में परिवर्तन आवश्यक है, जिसके लिए महासभा के 2/3 सदस्यों की स्वीकृति आवश्यक है।
UNSC की वर्तमान संरचना
- संरचना: 5 स्थायी सदस्य (अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, रूस, चीन) तथा 10 अस्थायी सदस्य (2 वर्ष का कार्यकाल)।
वैश्विक दक्षिण
- यह एशिया, अफ्रीका एवं लैटिन अमेरिका के विकासशील देशों को संदर्भित करता है, जिनकी विशेषताएँ कम औद्योगिकीकरण, औपनिवेशिक शोषण का इतिहास एवं विकास संबंधी चुनौतियाँ हैं।
- यह संयुक्त राष्ट्र की सदस्यता का बहुमत प्रतिनिधित्व करता है, किन्तु इसके पास अनुपातिक शक्ति का अभाव है।
वैश्विक वित्तीय प्रणाली से संबंधित समस्याएँ
- सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) के लिए प्रतिवर्ष 4 ट्रिलियन डॉलर का वित्तीय अंतर
- IMF एवं विश्व बैंक जैसे अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों की असमान संरचना
- विकासशील देशों की सीमित भागीदारी
- भारत के प्रस्ताव :
- न्यायसंगत, समावेशी एवं विकास-उन्मुख वित्तीय प्रणाली का निर्माण
- अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों में सुधार, जिससे वर्तमान वैश्विक वास्तविकताओं का प्रतिबिंब हो
- वैश्विक दक्षिण के प्रतिनिधित्व को सुदृढ़ करना
- डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (DPI) को विकास के साधन के रूप में बढ़ावा देना
- सुधारों को सेविला प्रतिबद्धता (FfD एजेंडा) के अनुरूप बनाना
भारत एवं वैश्विक शासन के लिए महत्व
- भारत के लिए: वैश्विक दक्षिण के नेता एवं एक उत्तरदायी वैश्विक शक्ति के रूप में भारत की भूमिका सुदृढ़ होती है।
- विश्व के लिए: UNSC की वैधता एवं संघर्ष समाधान में प्रभावशीलता बढ़ती है तथा बहुध्रुवीय एवं समावेशी वैश्विक व्यवस्था की ओर अग्रसरता होती है।
निष्कर्ष
- संयुक्त राष्ट्र में भारत के हस्तक्षेप वैश्विक शासन संस्थानों में व्यापक सुधार की निरंतर पहल को दर्शाते हैं, जो वित्तीय असमानताओं एवं राजनीतिक अपर्याप्त प्रतिनिधित्व दोनों को संबोधित करते हैं।
- ये सुधार सतत विकास लक्ष्यों की प्राप्ति तथा संतुलित अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था सुनिश्चित करने के लिए अत्यंत आवश्यक हैं।
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