माता-पिता को तृतीय संतान के जन्म के लिए प्रोत्साहित करने संबंधी जनसंख्या प्रबंधन नीति का प्रारूप

पाठ्यक्रम: GS1/ समाज, GS2/ शासन

संदर्भ

  • आंध्र प्रदेश सरकार ने घटती प्रजनन दर और भविष्य की जनसांख्यिकीय चुनौतियों से निपटने के लिए एक जनसंख्या प्रबंधन नीति का प्रारूप प्रस्तुत किया है।

परिचय

  • इस नीति का उद्देश्य कुल प्रजनन दर (TFR) को 1.5 से बढ़ाकर प्रतिस्थापन स्तर 2.1 तक पहुँचाना है। इसके लिए परिवारों को तृतीय बच्चे के जन्म हेतु वित्तीय और सामाजिक प्रोत्साहन दिए जाएंगे।
  • कुल प्रजनन दर (TFR) उस औसत संख्या को दर्शाती है जितने बच्चे एक महिला अपने जीवनकाल में जन्म देती है।
    • 2.1 का TFR प्रतिस्थापन स्तर माना जाता है, जो स्थिर जनसंख्या बनाए रखने के लिए आवश्यक है।
  • वैश्विक स्तर पर जापान, इटली और दक्षिण कोरिया जैसे कई विकसित देशों को अत्यंत कम प्रजनन दर के कारण गंभीर जनसांख्यिकीय चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।

प्रारूप नीति की मुख्य विशेषताएँ

  • नीति में तृतीय बच्चे के जन्म पर परिवारों के लिए “पोषण – शिक्षा – सुरक्षा” प्रोत्साहन पैकेज प्रस्तावित है।
  • वित्तीय प्रोत्साहन: तृतीय बच्चे के जन्म पर सरकार ₹25,000 की राशि प्रदान करेगी।
    • परिवारों को पाँच वर्षों तक प्रति माह ₹1,000 की सहायता दी जाएगी ताकि बाल देखभाल और पोषण सुनिश्चित हो सके।
  • शिक्षा सहायता: तृतीय बच्चे को 18 वर्ष की आयु तक निःशुल्क शिक्षा उपलब्ध कराई जाएगी।
  • कार्यान्वयन समयरेखा: यह नीति 1 अप्रैल 2026 से लागू करने का प्रस्ताव है, सार्वजनिक परामर्श की अवधि के पश्चात।

वृद्ध होती जनसंख्या के आर्थिक प्रभाव

  • पेंशन पर सार्वजनिक व्यय में वृद्धि: वृद्ध जनसंख्या बढ़ने से सामाजिक सुरक्षा और पेंशन प्रणालियों पर बोझ बढ़ेगा, जिससे राज्य एवं केंद्र सरकार के बजट पर दबाव पड़ेगा।
  • उपभोक्ता मांग में कमी: वृद्ध जनसंख्या अपेक्षाकृत कम उपभोग करती है, जबकि युवा जनसंख्या अधिक सक्रिय होती है।
  • स्वास्थ्य अवसंरचना पर दबाव: उम्र से संबंधित बीमारियों की अधिकता के कारण स्वास्थ्य प्रणाली पर अतिरिक्त भार पड़ेगा।
    • 2017-18 में, भारत की कुल जनसंख्या का केवल पाँचवाँ हिस्सा रखने वाले दक्षिणी राज्यों ने हृदय रोगों पर देश के कुल निजी खर्च का 32% वहन किया।
  • आर्थिक वृद्धि मॉडल पर दबाव: भारत की आर्थिक वृद्धि अब तक जनसांख्यिकीय लाभांश पर आधारित रही है। वृद्ध होती जनसंख्या के साथ इस मॉडल में बड़े बदलाव की आवश्यकता होगी।

वैश्विक परिदृश्य

  • जापान: यहाँ औसत आयु 48 वर्ष से अधिक है। इस बदलाव ने दीर्घकालिक आर्थिक मंदी, घटती कार्यबल और पेंशन व स्वास्थ्य पर व्यय में वृद्धि करता है।
  • चीन: 1979 से 2015 तक लागू एक-बच्चा नीति ने जन्म दर को काफी कम कर दिया, जिससे जनसंख्या तीव्रता से वृद्ध हो रही है।
  • दक्षिण कोरिया: यहाँ विश्व की सबसे कम प्रजनन दरों में से एक है, जो 2022 में 0.78 रही। इससे दीर्घकालिक आर्थिक प्रभावों जैसे श्रम की कमी और GDP वृद्धि में गिरावट की आशंका बढ़ गई है।

चुनौतियाँ

  • महिलाओं की श्रम भागीदारी पर प्रभाव: प्रजनन दर बढ़ाने के प्रस्ताव महिलाओं की कार्यबल में भागीदारी को कम कर सकते हैं, जिससे आर्थिक वृद्धि पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।
  • राजकोषीय बोझ में वृद्धि: नकद हस्तांतरण, सब्सिडी और दीर्घकालिक लाभों पर आधारित प्रोत्साहन योजनाएँ राज्य के बजट पर अतिरिक्त दबाव डाल सकती हैं, विशेषकर यदि जन्म दर में उल्लेखनीय वृद्धि होती है।
  • पर्यावरणीय दबाव: बड़ी जनसंख्या जल, भूमि और ऊर्जा जैसे प्राकृतिक संसाधनों पर अधिक दबाव डाल सकती है, जिससे पर्यावरणीय चुनौतियाँ और गंभीर हो सकती हैं।

निष्कर्ष

  • यह नीति जनसंख्या नियंत्रण से जनसंख्या स्थिरीकरण की दिशा में बदलाव को दर्शाती है, जो कई भारतीय राज्यों की नई जनसांख्यिकीय वास्तविकताओं को प्रतिबिंबित करती है।
  • यह आने वाले दशकों में जनसंख्या संतुलन, आर्थिक वृद्धि और सामाजिक कल्याण के बीच सामंजस्य स्थापित करने हेतु सक्रिय उपायों की आवश्यकता को रेखांकित करती है।

Source: TH

 

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