खंडित वैश्विक व्यवस्था में भारत की विदेश नीति का पुनर्परिनियोजन

पाठ्यक्रम: GS2/ अंतर्राष्ट्रीय संबंध

संदर्भ

  • संसद में प्रधानमंत्री मोदी ने स्वीकार किया कि नियम-आधारित बहुपक्षीयता से शक्ति-प्रधान, लेन-देन आधारित भू-राजनीति की ओर एक संरचनात्मक परिवर्तन हो रहा है।

बहुपक्षीयता का क्षरण

  • सहमति-आधारित संस्थाओं का पतन: दशकों तक संयुक्त राष्ट्र और विश्व व्यापार संगठन जैसी संस्थाएँ सामूहिक निर्णय-निर्माण एवं कूटनीति के माध्यम से वैश्विक नियम-निर्माण का आधार रहीं।
    • किंतु यह नियम-आधारित व्यवस्था कमजोर हो गई है क्योंकि प्रमुख शक्तियाँ सहमति तंत्र को दरकिनार कर रही हैं, जिससे संस्थाएँ कम प्रभावी हो रही हैं।
  • लेन-देन आधारित शक्ति राजनीति का उदय: बहुपक्षीय मंचों को लेन-देन आधारित कूटनीति प्रतिस्थापित कर रही है, जहाँ शक्ति और द्विपक्षीय दबाव सामूहिक मानदंडों से अधिक महत्व रखते हैं।
    • अमेरिका द्वारा एकतरफा शुल्क लगाना और सहयोगी ढाँचों से पीछे हटना इस प्रवृत्ति को दर्शाता है।
  • प्रतिस्पर्धी भू-अर्थशास्त्र का उदय: चीन 120 से अधिक देशों का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार बन गया है और उसने आपूर्ति श्रृंखलाओं एवं बाज़ारों का विविधीकरण किया है।
    • इसके प्रत्युत्तर में अमेरिका ने तकनीकी नियंत्रण और आपूर्ति श्रृंखला पुनर्गठन को प्राथमिकता दी है।
    • इस परिवर्तित वातावरण में भारत जैसे मध्यम शक्तियों को आर्थिक संरेखण के बदलावों के कारण अधिक संवेदनशीलता का सामना करना पड़ रहा है।

रणनीतिक स्वायत्तता का विकास

  • शीत युद्ध की उत्पत्ति: रणनीतिक स्वायत्तता का उद्भव भारत के गुटनिरपेक्ष आंदोलन के नेतृत्व के दौरान हुआ। इससे भारत को शीत युद्ध के दौरान गुट राजनीति से बचने का अवसर मिला।
  • शीत युद्धोत्तर संक्रमण: 1991 के बाद यह सिद्धांत संरचनात्मक से अधिक घोषणात्मक हो गया। भारत ने 2017 में चतुष्कोणीय सुरक्षा संवाद (Quad) में भाग लिया, जो इंडो-पैसिफ़िक सुरक्षा चिंताओं के साथ संरेखण का संकेत था।
    • रूस से रक्षा खरीद: भारत ने अमेरिकी प्रतिबंधों के दबाव के बावजूद रूस से S-400 प्रणाली खरीदी।
  • स्विंग स्टेट विमर्श: अमेरिकी विश्लेषक भारत को अमेरिका-चीन प्रतिद्वंद्विता में बढ़ते हुए “स्विंग स्टेट” के रूप में वर्णित करते हैं।

भारत की वर्तमान विदेश नीति

  • भारत की वर्तमान विदेश नीति बहु-संरेखण, आर्थिक कूटनीति और रणनीतिक लचीलापन से परिभाषित है। इसके प्रमुख आयाम हैं:
    • अमेरिका और इंडो-पैसिफ़िक साझेदारों के साथ रक्षा एवं प्रौद्योगिकी सहयोग को बेहतर करना।
    • रूस के साथ रक्षा और ऊर्जा संबंध बनाए रखना।
    • चीन के साथ प्रतिस्पर्धा और संवाद को संतुलित करना तथा निरोधक नीति अपनाना।
    • “पड़ोस प्रथम” नीति को बढ़ावा देना और दक्षिण एशिया में क्षेत्रीय संपर्क को सुदृढ़ करना।
    • वैश्विक संस्थाओं में सुधार का समर्थन करना ताकि वे समकालीन शक्ति वास्तविकताओं को प्रतिबिंबित करें।
  • भारत का दृष्टिकोण स्वायत्तता को संरक्षित करते हुए उन साझेदारियों का विस्तार करना है जो आर्थिक विकास और तकनीकी प्रगति को प्रोत्साहित करें।

आगे की राह

  • लचीला बहुपक्षीय संलग्नता: खंडित व्यवस्था में लचीले गठबंधन और मुद्दा-आधारित संरेखण भारत की रणनीतिक स्थिति को सुरक्षित रख सकते हैं।
    • BRICS जैसे मंच आर्थिक सहयोग को बढ़ावा देने और वैश्विक वित्तीय शासन में सुधार के अवसर प्रदान करते हैं।
  • विविधीकृत व्यापार रणनीति: भारत का निर्यात कुछ चुनिंदा बाज़ारों में केंद्रित है। किसी एक साझेदार पर अत्यधिक निर्भरता कम करने के लिए ASEAN, अफ्रीका और पश्चिम एशिया के साथ सुदृढ़ व्यापारिक संबंध आवश्यक हैं।
    • व्यापक आर्थिक साझेदारियों का विस्तार और वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं में एकीकरण शुल्क अस्थिरता के विरुद्ध लचीलापन बढ़ाएगा।

Source: TH

 

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