समकालिक चुनाव संविधान की मूल संरचना का उल्लंघन नहीं 

पाठ्यक्रम: GS2/राजव्यवस्था और शासन

संदर्भ

  • भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई ने कहा कि समकालिक चुनाव संविधान की मूल संरचना अथवा उसके संघीय ढाँचे का उल्लंघन नहीं करते हैं।

परिचय 

  • उन्होंने यह बात संसद की संयुक्त समिति के समक्ष कही, जो संविधान (एक सौ उनतीसवाँ संशोधन) विधेयक, 2024 की समीक्षा कर रही है।
  • पूर्व मुख्य न्यायाधीश का तर्क:
    • यह विधेयक “केवल एक बार चुनाव कराने की पद्धति में परिवर्तन” करता है, जिससे मूल संरचना सिद्धांत का उल्लंघन नहीं होता।
    • चुनाव की संरचना और मतदाता अधिकार यथावत बने रहते हैं, अतः यह संशोधन संवैधानिक होगा।
    • उन्होंने आगे स्पष्ट किया कि इस प्रकार का कानून बनाना संसद की विधायी क्षमता के अंतर्गत पूर्णतः आता है।

पृष्ठभूमि

  • संविधान (एक सौ उनतीसवाँ संशोधन) विधेयक, 2024 तथा संघ शासित प्रदेश विधि (संशोधन) विधेयक, जिन्हें ‘वन नेशन वन इलेक्शन’ विधेयक के रूप में जाना जाता है, वर्ष 2024 में विधि मंत्री द्वारा प्रस्तुत किए गए।
  • इन विधेयकों में लोकसभा और विधानसभाओं के चुनावों को समकालिक बनाने का प्रावधान है, जिसके लिए किसी विशेष लोकसभा के बाद निर्वाचित राज्य विधानसभाओं की अवधि को उसी लोकसभा के कार्यकाल के साथ समाप्त करने हेतु सीमित किया जाएगा।
    • जब विधानमंडलों के कार्यकाल समन्वित हो जाएंगे, तब आगामी आम चुनाव एक साथ आयोजित किया जाएगा।
  • इन विधेयकों को इस उद्देश्य से संयुक्त संसदीय समिति को संदर्भित किया गया कि यह सुनिश्चित किया जा सके कि वे संविधान की मूल संरचना को प्रभावित न करें।
मूल संरचना सिद्धांत
स्रोत: केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य प्रकरण।
– यह सिद्धांत भारत के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा विकसित एक न्यायिक सिद्धांत है, जिसके अनुसार संसद को अनुच्छेद 368 के अंतर्गत संविधान में संशोधन करने की व्यापक शक्ति है, परंतु वह इसकी “मूल संरचना” को परिवर्तित या नष्ट नहीं कर सकती।
– समय-समय पर विभिन्न निर्णयों के माध्यम से निम्नलिखित तत्वों को मूल संरचना का अंग माना गया है:
संविधान की सर्वोच्चता, विधि का शासन, न्यायिक पुनरावलोकन, शक्तियों का पृथक्करण, संघवाद, धर्मनिरपेक्षता, लोकतंत्र, संसदीय प्रणाली, स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव, न्यायपालिका की स्वतंत्रता, भारत की एकता एवं अखंडता, तथा मौलिक अधिकारों एवं राज्य के नीति-निदेशक तत्वों के बीच संतुलन।

समकालिक चुनाव क्या हैं?

  • समकालिक चुनाव (वन नेशन वन इलेक्शन) से आशय लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनावों को एक साथ आयोजित करने की अवधारणा से है, जिसका उद्देश्य चुनावों की आवृत्ति तथा उनसे जुड़े व्ययों को कम करना है।
  • भारत में लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के लिए समकालिक चुनाव वर्ष 1951-52, 1957, 1962 एवं 1967 में आयोजित किए गए थे।
  • इसके पश्चात् यह समय-सारिणी बनाए नहीं रखी जा सकी और लोकसभा तथा राज्य विधानसभाओं के चुनाव अब तक पुनः समन्वित नहीं हो पाए हैं।

वन नेशन वन इलेक्शन के पक्ष में तर्क

  • व्यय में कमी: प्रत्येक वर्ष अलग-अलग चुनाव कराने में होने वाले भारी व्यय में कमी आएगी।
  • प्रक्रिया का सरलीकरण: एक चुनाव चक्र का प्रबंधन, विभिन्न समयों पर अनेक चुनाव कराने की तुलना में अधिक सुव्यवस्थित एवं प्रशासनिक रूप से दक्ष होगा।
  • लगातार चुनावों के कारण आचार संहिता लंबे समय तक लागू रहती है, जिससे सामान्य शासन-प्रक्रिया प्रभावित होती है। समकालिक चुनाव इस समस्या का समाधान कर सकते हैं।
  • शासन पर अधिक ध्यान केंद्रित किया जा सकेगा, बजाय इसके कि सरकार निरंतर चुनावी मोड में रहे।
  • प्रत्यक्ष जवाबदेही: समकालिक चुनावों के माध्यम से मतदाता केंद्र एवं राज्य सरकारों के कार्यों के प्रति एक साथ जवाबदेही सुनिश्चित कर सकते हैं, जिससे यह स्पष्ट होगा कि स्थानीय एवं राष्ट्रीय नीतियाँ उनके जीवन को किस प्रकार प्रभावित करती हैं।
  • सहकारी संघवाद को सुदृढ़ता: समन्वित चुनावी कैलेंडर संघ और राज्यों के बीच बेहतर समन्वय को प्रोत्साहित करेगा, नीति-स्थिरता सुनिश्चित करेगा तथा निरंतर चुनावी अभियानों से उत्पन्न राजनीतिक तनाव को कम करेगा।

वन नेशन वन इलेक्शन के विरुद्ध तर्क

  • लॉजिस्टिक चुनौतियाँ: सभी राज्यों तथा केंद्र सरकार के समक्ष समय-सारिणी, संसाधनों आदि के समन्वय सहित व्यापक प्रशासनिक चुनौतियाँ होंगी।
  • स्थानीय प्राथमिकताएँ: इससे राष्ट्रीय दलों को लाभ हो सकता है, जबकि क्षेत्रीय दलों एवं स्थानीय मुद्दों की उपेक्षा की आशंका रहेगी।
  • जटिल संवैधानिक सुधार: समकालिक चुनाव लागू करने के लिए व्यापक संवैधानिक संशोधनों तथा निर्वाचन कानूनों में परिवर्तन की आवश्यकता होगी, जिससे विधिक जटिलताएँ उत्पन्न होंगी।
  • संघवाद एवं राज्य स्वायत्तता: कार्यकालों का समन्वय राज्य विधानसभाओं की अवधि को घटाने या बढ़ाने का कारण बन सकता है, जिससे राज्यों की संवैधानिक स्वायत्तता प्रभावित हो सकती है।

आगे की दिशा

  • सरकार के तीनों स्तरों पर समन्वित चुनाव शासन संरचना को सुदृढ़ करेंगे। इससे “पारदर्शिता, समावेशन, सुगमता तथा मतदाताओं का विश्वास” बढ़ेगा।
  • विधि आयोग द्वारा वर्ष 2029 से लोकसभा, राज्य विधानसभाओं तथा स्थानीय निकायों—जैसे नगरपालिकाएँ एवं पंचायतें—के लिए समकालिक चुनाव कराने की अनुशंसा किए जाने की संभावना है।

स्रोत: TH

 

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