पाठ्यक्रम: GS2/शासन; GS3/आधारभूत अवसंरचना
संदर्भ
- हाल ही में भारत के विमानन क्षेत्र में हुई व्यवधानों—जैसे जून 2025 में अहमदाबाद विमान दुर्घटना और दिसंबर 2025 में इंडिगो की बड़े पैमाने पर उड़ान रद्दीकरण एवं विलंब—ने गहरे संरचनात्मक जोखिमों को उजागर किया है। यह समस्या अब अस्थायी या किसी एक एयरलाइन तक सीमित नहीं रही।
भारत का नागरिक उड्डयन
- यह विश्व के सबसे तीव्रता से बढ़ते विमानन बाज़ारों में से एक बनकर उभरा है और वर्तमान में वैश्विक स्तर पर तीसरा सबसे बड़ा घरेलू विमानन बाज़ार है।
- भारत में 840 से अधिक विमान संचालित होते हैं और प्रतिवर्ष 350 मिलियन से अधिक यात्रियों को ले जाया जाता है।
- आय में वृद्धि, मध्यम वर्ग की आकांक्षाओं का विस्तार और क्षेत्रीय संपर्क में सुधार के साथ हवाई यात्रा विलासिता से आवश्यक परिवहन साधन में परिवर्तित हो गई है।

घरेलू हवाई यात्रा का तीव्र विस्तार
- विगत दशक में भारत का विमानन बाज़ार उल्लेखनीय गति से विस्तारित हुआ है। इसके प्रमुख कारक हैं:
- बढ़ती आय और शहरी गतिशीलता;
- कम लागत वाली एयरलाइनों (LCC) का प्रभुत्व, जिससे उड़ानें सुलभ हुईं;
- नए हवाई अड्डों और टर्मिनल विस्तार सहित बुनियादी ढाँचे का विकास;
- क्षेत्रीय संपर्क हेतु उड़ान (UDAN) योजना जैसी सरकारी पहल।
- उड़े देश का आम नागरिक (UDAN) योजना ने सैकड़ों मार्गों को चालू किया है, जिससे हवाई यात्रा टियर-2 और टियर-3 शहरों तक पहुँची तथा क्षेत्रीय आर्थिक एकीकरण को बढ़ावा मिला।
- अनुमानों के अनुसार 2030 तक घरेलू यात्री यातायात प्रतिवर्ष 715 मिलियन तक पहुँच सकता है।
- संसदीय अनुमान बताते हैं कि 2024 से 2026 के बीच 7,000 नए पायलटों की आवश्यकता होगी, जो आगामी दशक में बढ़कर 25,000–30,000 तक हो सकती है।
भारत के विमानन उद्योग की चिंताएँ एवं समस्याएँ
- पायलट-से-विमान अनुपात की कमी: वैश्विक मानक थकान-नियंत्रित संचालन हेतु प्रति संकीर्ण-शरीर विमान 18–20 पायलट सुझाते हैं, जबकि भारतीय एयरलाइंस प्रायः 14–16 पायलटों के साथ संचालित होती हैं।
- कड़े उड़ान ड्यूटी समय सीमा (FDTL) मानदंड: हाल ही में लागू सख्त नियमों ने रात्रि संचालन को घटाया और अनिवार्य विश्राम बढ़ाया, जिससे समय-सारणी की कमजोरियाँ उजागर हुईं।
- पायलट प्रशिक्षण अवसंरचना अपर्याप्त है—सीमित सिम्युलेटर क्षमता, उच्च प्रशिक्षण लागत, नियामक विलंब और प्रशिक्षकों की कमी।
- बाज़ार का उच्च संकेंद्रण (Duopoly जोखिम): घरेलू विमानन बाज़ार इंडिगो और एयर इंडिया के प्रभुत्व में है, जो लगभग 90% यात्री यातायात नियंत्रित करते हैं।
- इससे राष्ट्रीय संपर्क प्रभावित होता है, विशेषकर टियर-2 और टियर-3 शहरों में।
- वित्तीय अस्थिरता: तीव्र यात्री वृद्धि के बावजूद भारतीय एयरलाइंस कम मार्जिन पर संचालित होती हैं। किराया प्रतिस्पर्धा, उच्च परिचालन लागत और मुद्रा उतार-चढ़ाव इसका कारण हैं।
- एटीएफ (विमानन टरबाइन ईंधन) की कीमतें वैश्विक कच्चे तेल और अमेरिकी डॉलर से जुड़ी हैं। अचानक वृद्धि लाभप्रदता पर गंभीर प्रभाव डालती है।
- भारत ने कई एयरलाइनों के पतन और क्षेत्रीय वाहकों की विफलता देखी है।
- बुनियादी ढाँचे की सीमाएँ: दिल्ली और मुंबई जैसे प्रमुख हवाई अड्डे क्षमता के निकट संचालित होते हैं, जिससे स्लॉट की कमी, टैक्सी-टाइम विलंब एवं वायुक्षेत्र भीड़भाड़ होती है।
- कई क्षेत्रीय हवाई अड्डों में पर्याप्त यात्री सुविधाएँ, रात्रि लैंडिंग क्षमता और उन्नत नेविगेशन प्रणाली का अभाव है।
- नियामक एवं पर्यवेक्षण चुनौतियाँ: DGCA में तकनीकी एवं सुरक्षा निरीक्षण पद रिक्त हैं।
- परिचालन व्यवधान अक्सर अस्थायी छूटों से प्रबंधित किए जाते हैं, न कि कठोर प्रणालीगत सुधार से।
- संपत्तियों का अति-उपयोग: भारतीय एयरलाइंस न्यूनतम बफर क्षमता के साथ संचालित होती हैं—उच्च विमान उपयोग दर, सीमित अतिरिक्त चालक दल और तंग टर्नअराउंड समय।
- वैश्विक स्तर पर एयरलाइंस 20–25% अतिरिक्त चालक दल क्षमता बनाए रखती हैं।
- क्षेत्रीय एयरलाइन स्थिरता: नई क्षेत्रीय एयरलाइंस संपर्क सुधारने का प्रयास करती हैं, लेकिन कमजोर मांग, उच्च स्थायी लागत, प्रमुख एयरलाइनों से प्रतिस्पर्धा और ईंधन व मुद्रा अस्थिरता जैसी चुनौतियाँ बनी रहती हैं।
- बढ़ती मांग बनाम प्रणाली की तैयारी: भारत वैश्विक हवाई यातायात का 4% से अधिक हिस्सा रखता है और 2030 तक यात्री संख्या दोगुनी होने का अनुमान है।
- किंतु प्रशिक्षण क्षमता सीमित है, नियामक संसाधन दबाव में हैं, बुनियादी ढाँचे का उन्नयन असमान है और सुरक्षा बफर अपर्याप्त हैं।
भारत के विमानन उद्योग की समस्याओं को दूर करने के प्रयास और पहलें
- पायलट उपलब्धता और प्रशिक्षण को सुदृढ़ करना: सरकार ने नए फ्लाइंग ट्रेनिंग ऑर्गेनाइजेशन (FTOs) की स्थापना को प्रोत्साहित किया है, जिनमें कम उपयोग वाले हवाई अड्डे भी शामिल हैं। इसका उद्देश्य है:
- वाणिज्यिक पायलट लाइसेंस (CPL) उत्पादन बढ़ाना;
- विदेशी प्रशिक्षण अकादमियों पर निर्भरता कम करना;
- समय के साथ प्रशिक्षण लागत घटाना।
- संशोधित FDTL मानदंडों का कार्यान्वयन: सख्त फ्लाइट ड्यूटी टाइम लिमिटेशन (FDTL) मानदंडों का चरणबद्ध क्रियान्वयन पायलट थकान कम करने, सुरक्षा मानकों को सुधारने और भारत को वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाओं के अनुरूप बनाने के लिए किया गया है।
- ग्रीनफ़ील्ड हवाई अड्डों का विकास: नोएडा अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा (जेवर) और नवी मुंबई अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा जैसे नए हवाई अड्डे प्रमुख केंद्रों पर भीड़भाड़ कम करने, स्लॉट उपलब्धता बढ़ाने और क्षेत्रीय विकास को समर्थन देने की अपेक्षा रखते हैं।
- वर्तमान हवाई अड्डों का आधुनिकीकरण: पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (PPP) मॉडल ने प्रमुख हवाई अड्डों पर टर्मिनल विस्तार, रनवे उन्नयन और यात्री सुविधाओं में सुधार को तीव्र किया है।
- क्षेत्रीय संपर्क को बढ़ावा देना (उड़ान योजना): उड़े देश का आम नागरिक (UDAN) पहल एक आधारभूत नीति बनी हुई है। इसके प्रमुख तत्व हैं:
- क्षेत्रीय मार्गों पर संचालित एयरलाइनों के लिए व्यवहार्यता अंतर वित्तपोषण (VGF);
- छोटे शहरों के लिए हवाई अड्डा शुल्क में कमी;
- अनुपयोगी और कम उपयोग वाले हवाई अड्डों का पुनर्जीवन।
- बाज़ार प्रतिस्पर्धा और नए प्रवेशकों को प्रोत्साहित करना: नई क्षेत्रीय एयरलाइनों को अनापत्ति प्रमाण पत्र(NOCs) जारी करना नीति के प्रयोजन को दर्शाता है:
- प्रमुख वाहकों पर अत्यधिक निर्भरता कम करना;
- टियर-2 और टियर-3 शहरों में सेवा आवृत्ति सुधारना;
- विभिन्न क्षेत्रों में क्षमता का विविधीकरण करना।
- नियामक पर्यवेक्षण को सुदृढ़ करना: DGCA में तकनीकी रिक्तियों को भरने के प्रयास जारी हैं ताकि सुरक्षा ऑडिट और पर्यवेक्षण तंत्र को सुदृढ़ किया जा सके।
- DGCA ने निरीक्षण, ऑडिट और अनुपालन निगरानी को तीव्र किया है, विशेषकर FDTL अनुपालन, विमान रखरखाव मानकों और परिचालन सुरक्षा प्रक्रियाओं के संबंध में।
- वित्तीय और संरचनात्मक सुधार: कमज़ोर वाहकों का सुदृढ़ समूहों में एकीकरण (जैसे, विस्तारा का एयर इंडिया में विलय) वित्तीय रूप से सक्षम संस्थाएँ बनाने के उद्देश्य से किया गया है।
- नई पीढ़ी के विमान आदेश बेहतर ईंधन दक्षता, कम परिचालन लागत और उन्नत पर्यावरणीय प्रदर्शन का वादा करते हैं।
- परिचालन लचीलापन सुधारना: एयरलाइंस धीरे-धीरे चालक दल-से-विमान अनुपात का पुनर्मूल्यांकन कर रही हैं ताकि सख्त FDTL मानदंडों के अंतर्गत व्यवधानों को बेहतर ढंग से संभाला जा सके।
- भारत घरेलू रखरखाव, मरम्मत और ओवरहाल (MRO) सुविधाओं को बढ़ावा दे रहा है ताकि विमान डाउनटाइम कम हो, विदेशी मुद्रा बहिर्वाह घटे और रखरखाव समय में सुधार हो।
- एयर ट्रैफ़िक प्रबंधन का आधुनिकीकरण: सरकार उन्नत वायु नेविगेशन प्रणालियों, उपग्रह-आधारित नेविगेशन (GAGAN) और वायुक्षेत्र पुनःडिज़ाइन पहलों में निवेश कर रही है।
- इन उपायों का उद्देश्य भीड़भाड़ कम करना, ईंधन दक्षता सुधारना और भीड़भाड़ वाले मार्गों में सुरक्षा बढ़ाना है।
- विदेशी पायलटों की उदार भर्ती (अस्थायी उपाय): तत्काल कमी को दूर करने के लिए विदेशी पायलटों को अस्थायी अनुमतियाँ दी गई हैं।
निष्कर्ष
- भारत का विमानन क्षेत्र एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। उच्च बाज़ार संकेंद्रण, सीमित पायलट आपूर्ति, दबावग्रस्त नियामक क्षमता और बढ़ती सुरक्षा चेतावनियों के बीच उद्योग को आक्रामक विस्तार से हटकर लचीलापन निर्माण की ओर बढ़ना होगा।
- यदि सुधारात्मक कार्रवाई में विलंब हुआ, तो इसकी कीमत केवल एयरलाइनों के वित्तीय हानि तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि लाखों यात्रियों और भारत के सबसे तीव्रता से बढ़ते क्षेत्रों में से एक की विश्वसनीयता को भी वहन करनी होगी।
| मुख्य परीक्षा दैनिक अभ्यास प्रश्न [प्रश्न] भारत के विमानन उद्योग के समक्ष उपस्थित संरचनात्मक, नियामक तथा बाज़ार-संबंधी चुनौतियों की विवेचना कीजिए। अपने उत्तर को प्रासंगिक तर्कों और उदाहरणों द्वारा पुष्ट कीजिए। |
स्रोत: TH
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