पाठ्यक्रम: GS2/राजव्यवस्था और शासन
संदर्भ
- हाल ही में, केरल पुलिस ने एक महिला को उस व्यक्ति की आत्महत्या के मामले में गिरफ्तार किया है, जिसे उसने बस में यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया था।
- गिरफ्तारी उस व्यक्ति के परिवार की शिकायत के बाद हुई, जिन्होंने आरोप लगाया कि महिला द्वारा सोशल मीडिया पर पोस्ट किए गए वीडियो के वायरल होने के बाद उसे ऑनलाइन उत्पीड़न का सामना करना पड़ा।
सोशल मीडिया ट्रायल क्या है?
- सोशल मीडिया ट्रायल से आशय है सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर किसी व्यक्ति के दोषी या निर्दोष होने का सार्वजनिक निर्णय, जो आरोपों, वायरल सामग्री या आंशिक जानकारी के आधार पर किया जाता है, जबकि कानूनी जाँच या न्यायिक कार्यवाही अभी पूरी नहीं हुई होती।
- प्रायः लोग तीव्र भावनाओं से प्रेरित होकर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर चल रहे आपराधिक मामलों, दीवानी विवादों और विवादास्पद मुद्दों पर सार्वजनिक रूप से निर्णय देने लगते हैं।
- जनमत द्वारा ऑनलाइन ट्रायल की यह बढ़ती प्रवृत्ति भारतीय न्याय प्रणाली, न्याय के सिद्धांतों और अभियुक्तों के अधिकारों पर इसके प्रभाव को लेकर गंभीर प्रश्न उठाती है।
सोशल मीडिया ट्रायल का विनियमन
- भारत में मीडिया ट्रायल को नियंत्रित करने वाले कोई विशिष्ट कानून नहीं हैं, हालांकि आपराधिक मामलों पर मीडिया की रिपोर्टिंग विभिन्न कानूनी प्रावधानों के अधीन होती है।
- न्यायालय की अवमानना: न्यायालय अवमानना अधिनियम, 1971 न्यायालय की अवमानना को परिभाषित करता है, जिसमें कोई भी कार्य जो न्यायालय की गरिमा को ठेस पहुँचाए, उसकी प्राधिकरण को कम करे या न्यायालय की विधिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप करे, शामिल है।
- किसी आपराधिक मामले की मीडिया कवरेज, जो न्यायालय के कार्य में हस्तक्षेप करती है या न्यायालय की प्रतिष्ठा को क्षति पहुँचाती है, अवमानना कार्यवाही के अधीन हो सकती है।
- मानहानि: भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 499 के अंतर्गत मानहानि एक अपराध है, जिसमें किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा को हानि पहुँचाने वाला कथन प्रकाशित करना शामिल है।
- यदि मीडिया किसी आपराधिक मामले में संलिप्त व्यक्ति के बारे में मानहानिकारक वक्तव्य प्रकाशित करता है, तो वह विधिक कार्रवाई के अधीन हो सकता है।
- निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार: भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत प्रत्येक व्यक्ति को निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार है।
- यदि मीडिया की रिपोर्टिंग जनमत को प्रभावित करती है, तो इसे अभियुक्त के निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार का उल्लंघन माना जा सकता है।
- दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC): यह निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार प्रदान करती है, जिसमें शीघ्र सुनवाई और निष्पक्ष जूरी का अधिकार शामिल है।
- मीडिया कवरेज जो जनमत को प्रभावित करे या संभावित जूरी को पक्षपाती बनाए, चुनौती दी जा सकती है।
- भारतीय प्रेस परिषद: प्रेस परिषद अधिनियम, 1978 के अंतर्गत स्थापित यह वैधानिक निकाय प्रिंट मीडिया को नियंत्रित करता है और उसकी स्वतंत्रता एवं नैतिक आचरण सुनिश्चित करता है।
- परिषद पत्रकारिता नैतिकता के उल्लंघन, जैसे सनसनीखेज या पक्षपाती रिपोर्टिंग, पर कार्रवाई कर सकती है।
- भारत मानवाधिकारों की सार्वभौम घोषणा (UDHR), 1948 और नागरिक एवं राजनीतिक अधिकारों पर अंतरराष्ट्रीय अनुबंध (ICCR), 1976 का पक्षकार है, जो यह घोषणा करते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति को दोष सिद्ध होने तक निर्दोष मानने तथा विधि द्वारा स्थापित सक्षम, स्वतंत्र और निष्पक्ष न्यायाधिकरण द्वारा निष्पक्ष एवं सार्वजनिक सुनवाई का अधिकार है।
सोशल मीडिया ट्रायल के पक्ष में तर्क
- वॉइस टू द वॉइसलेस: सोशल मीडिया उन पीड़ितों को मंच प्रदान करता है जो संस्थागत उदासीनता, सामाजिक कलंक या शक्ति असमानता से भयभीत हो सकते हैं।
- जन-जागरूकता और संवेदनशीलता: वायरल मामले यौन उत्पीड़न, जातिगत भेदभाव या शक्ति के दुरुपयोग जैसे सामाजिक मुद्दों को उजागर करते हैं और सार्वजनिक परिचर्चा को करते हैं।
- प्राधिकरणों की जवाबदेही: जन दबाव पुलिस और संस्थाओं को शीघ्र कार्रवाई करने के लिए प्रेरित कर सकता है, जहाँ विलंब या लापरवाही हो।
- अभिव्यक्ति का लोकतंत्रीकरण: सोशल मीडिया नागरिकों को सार्वजनिक विमर्श में भाग लेने और खुले, सुलभ मंच पर न्याय की माँग करने की अनुमति देता है।
- प्रणालीगत अन्याय का पर्दाफाश: बार-बार की ऑनलाइन कथाएँ उन दुरुपयोगों या संस्थागत विफलताओं को उजागर कर सकती हैं जो अन्यथा छिपी रह जातीं।
- कानूनी और नीतिगत सुधार का उत्प्रेरक: कई सुधार और दिशा-निर्देश सतत डिजिटल सक्रियता एवं सार्वजनिक निगरानी से प्रभावित हुए हैं।
सोशल मीडिया ट्रायल के विरुद्ध तर्क
- निर्दोषता की धारणा का उल्लंघन: सोशल मीडिया ट्रायल जाँच या दोषसिद्धि से पहले ही दोष घोषित कर देते हैं, जो आपराधिक न्याय का मूल सिद्धांत है।
- विधिक प्रक्रिया का ह्रास: ये निष्पक्ष जाँच, साक्ष्य की समीक्षा और न्यायिक सुनवाई जैसी कानूनी प्रक्रियाओं को दरकिनार कर देते हैं।
- प्रतिष्ठा और गरिमा को क्षति: ऑनलाइन शर्मिंदगी व्यक्ति की गरिमा और प्रतिष्ठा को अपूरणीय हानि पहुँचाती है, जो अनुच्छेद 21 के अंतर्गत संरक्षित है।
- भ्रामक सूचना और अधूरी सच्चाई का जोखिम: वायरल सामग्री प्रायः सत्यापन से रहित होती है, जिससे अधूरी या भ्रामक जानकारी पर आधारित निर्णय होते हैं।
- मनोवैज्ञानिक क्षति और सतर्कतावादी न्याय: निरंतर ऑनलाइन दुर्व्यवहार मानसिक आघात, सामाजिक बहिष्कार या आत्महत्या तक का कारण बन सकता है।
- पुलिस और न्यायपालिका पर प्रभाव: जन आक्रोश अधिकारियों पर दबाव डाल सकता है, जिससे जाँच और निष्पक्ष सुनवाई की वस्तुनिष्ठता प्रभावित होती है।
- कानून के शासन का कमजोर होना: जब जनमत न्यायालयों का स्थान ले लेता है, तो औपचारिक न्याय संस्थाओं पर विश्वास घटता है।
सर्वोच्च न्यायालय के अवलोकन
- महाराष्ट्र बनाम राजेंद्र जवन्मल गांधी (1997): सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि मीडिया की विश्वसनीयता निष्पक्ष और वस्तुनिष्ठ रिपोर्टिंग पर आधारित है, तथा इसकी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। प्रेस द्वारा ट्रायल न्याय की विफलता का कारण बनेगा।
- सिद्धार्थ वशिष्ठ @ मनु शर्मा बनाम राज्य (दिल्ली), (2010): सर्वोच्च न्यायालय ने टिप्पणी की कि यदि मीडिया को असीमित और अनियंत्रित स्वतंत्रता दी जाए तो गंभीर पूर्वाग्रह का खतरा है।
- अनुच्छेद 19(1)(a) के अंतर्गत संरक्षित अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सावधानीपूर्वक उपयोग होना चाहिए ताकि न्याय प्रशासन में हस्तक्षेप न हो।
- नीलेश नवलखा बनाम भारत संघ (2021): बॉम्बे उच्च न्यायालय ने कहा कि अनुच्छेद 19(1)(a) के अंतर्गत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता अनुच्छेद 19(2) के अंतर्गत युक्तिसंगत प्रतिबंधों के अधीन है। यह प्रथम अवसर था जब किसी न्यायालय ने सोशल मीडिया नेटवर्क और प्रकाशनों के लिए रिपोर्टिंग के मानदंड जारी किए।
- पीड़ित की गोपनीयता और गरिमा का सदैव सम्मान होना चाहिए।
- मामले से संबंधित संवेदनशील जानकारी कभी सार्वजनिक नहीं की जानी चाहिए।
- अन्वेषक के सामने किए गए स्वीकारोक्ति/कबूलनामे प्रकाशित नहीं किए जा सकते।
- जब मामला विचाराधीन हो, तो उससे जुड़े किसी भी व्यक्ति का साक्षात्कार नहीं लिया जा सकता।
निष्कर्ष
- प्रेस की स्वतंत्रता, जो देश में एक बहुमूल्य मौलिक अधिकार है, स्वयं संविधान द्वारा परिकल्पित युक्तिसंगत प्रतिबंधों के अधीन है।
- मीडिया लोकतांत्रिक समाज की रीढ़ है क्योंकि यह सभी सार्वजनिक संस्थाओं के कार्यों को जन निगरानी के अधीन करता है और न्याय प्रशासन में सहायक भूमिका निभाता है।
- हालाँकि, कभी-कभी मीडिया न्यायालय में विचाराधीन मामलों में हस्तक्षेप कर देता है, जिससे पूर्वाग्रह उत्पन्न होता है और निष्पक्ष सुनवाई बाधित होती है, न्याय प्रशासन प्रभावित होता है।
- ऐसे समय में न्यायिक प्रणाली प्रेस की स्वतंत्रता को विनियमित करती है ताकि व्यक्तियों एवं राष्ट्र की गोपनीयता और सुरक्षा को खतरे से बचाया जा सके।
| मुख्य परीक्षा दैनिक अभ्यास प्रश्न [प्रश्न] मीडिया ट्रायल आपराधिक न्याय प्रणाली की निष्पक्षता और अखंडता को किस प्रकार प्रभावित करता है? |
Source: TH
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