पाठ्यक्रम: GS3/ अर्थव्यवस्था
संदर्भ
- नीति आयोग ने सीमेंट, एल्यूमिनियम और सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम (MSME) क्षेत्रों के लिए डीकार्बोनाइजेशन (कार्बन उत्सर्जन में कमी) रोडमैप प्रस्तुत करते हुए तीन रिपोर्टें जारी की हैं।
सीमेंट क्षेत्र का डीकार्बोनाइजेशन
- संवृद्धि: सीमेंट उत्पादन 2023 में 391 मिलियन टन से बढ़कर 2070 तक लगभग 2,100 मिलियन टन होने का अनुमान है, जो भारत की अधोसंरचना और शहरीकरण आवश्यकताओं को दर्शाता है।
- भारत, चीन के बाद विश्व का दूसरा सबसे बड़ा सीमेंट उत्पादक है, जो वैश्विक वार्षिक उत्पादन का लगभग 13% योगदान करता है।
- यह क्षेत्र भारत के कुल ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का लगभग 7% योगदान करता है।
- डीकार्बोनाइजेशन लक्ष्य : रोडमैप का उद्देश्य वर्तमान में प्रति टन सीमेंट 0.63 tCO₂e की कार्बन तीव्रता को 2070 तक घटाकर 0.09–0.13 tCO₂e प्रति टन करना है।
- मुख्य डीकार्बोनाइजेशन रणनीतियाँ :
- कोयले पर निर्भरता कम करने हेतु अपशिष्ट-उत्पन्न ईंधनों (RDF) को प्राथमिकता प्रदान करना।
- पूरक सीमेंटयुक्त पदार्थों के अधिक उपयोग के माध्यम से क्लिंकर प्रतिस्थापन।
- अवशिष्ट प्रक्रिया उत्सर्जन के लिए कार्बन कैप्चर, उपयोग और भंडारण (CCUS) का विस्तार।
- न्यून-कार्बन उत्पादन को प्रोत्साहित करने हेतु कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग योजना (CCTS) का प्रभावी क्रियान्वयन।
एल्यूमिनियम क्षेत्र का डीकार्बोनाइजेशन
- उत्पादन परिदृश्य : एल्यूमिनियम उत्पादन 2023 में 4 मिलियन टन से बढ़कर 2070 तक 37 मिलियन टन होने का अनुमान है।
- चरणबद्ध डीकार्बोनाइजेशन मार्ग :
- लघु अवधि : नवीकरणीय ऊर्जा–निरंतर (RE-RTC) विद्युत आपूर्ति की ओर संक्रमण तथा ग्रिड संपर्कता एवं विश्वसनीयता को सुदृढ़ करना।
- मध्यम अवधि : स्थिर, कम-कार्बन बेसलोड बिजली हेतु परमाणु ऊर्जा का अपनाना।
- दीर्घ अवधि : शेष उत्सर्जन को नियंत्रित करने हेतु CCUS का एकीकरण।
MSME क्षेत्र का डीकार्बोनाइजेशन
- आर्थिक महत्व : MSMEs भारत के GDP में लगभग 30% योगदान करते हैं, 250 मिलियन से अधिक लोगों को रोजगार प्रदान करते हैं और भारत के निर्यात का लगभग 46% हिस्सा हैं।
- हरित संक्रमण रोडमैप के तीन प्रमुख आधार :
- ऊर्जा-क्षम उपकरणों का उपयोग कर ऊर्जा तीव्रता को कम करना।
- वैकल्पिक ईंधनों को अपनाकर जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता घटाना।
- नवीकरणीय ऊर्जा की खरीद और स्व-उत्पादन के माध्यम से हरित विद्युत का एकीकरण।
भारत द्वारा उठाए गए कदम
- उद्योग पंजीकरण एवं MSME सतत (ZED) प्रमाणन: MSMEs में संसाधन दक्षता, ऊर्जा दक्षता और स्वच्छ उत्पादन पद्धतियों को बढ़ावा देना।
- प्रदर्शन, उपलब्धि और विनिमय (PAT) योजना: राष्ट्रीय ऊर्जा दक्षता संवर्धन मिशन के अंतर्गत प्रमुख पहल, जो सीमेंट जैसे ऊर्जा-गहन उद्योगों को विशिष्ट ऊर्जा खपत में कमी के लक्ष्य निर्धारित करती है।
- राष्ट्रीय स्मार्ट ग्रिड मिशन एवं ग्रीन ओपन एक्सेस नियम (2022): ऊर्जा-गहन उद्योगों और MSMEs के लिए नवीकरणीय ऊर्जा की खरीद को सुगम बनाना।
- भारत की कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग योजना (CCTS): सीमेंट और एल्यूमिनियम जैसे भारी उद्योगों में उत्सर्जन कम करने हेतु बाजार तैयार करना, जिसमें अनिवार्य तीव्रता लक्ष्य निर्धारित किए जाते हैं, लक्ष्य से अधिक प्रदर्शन करने वालों को कार्बन क्रेडिट प्रमाणपत्र(CCCs) प्रदान किए जाते हैं और कम-कार्बन प्रौद्योगिकी में नवाचार को प्रोत्साहित किया जाता है।
हरित संक्रमण में चुनौतियाँ
- कठिन-से-नियंत्रित उत्सर्जन: चूना पत्थर कैल्सिनेशन से उत्पन्न सीमेंट प्रक्रिया उत्सर्जन और विद्युत -गहन एल्यूमिनियम स्मेल्टिंग केवल नवीकरणीय ऊर्जा से नियंत्रित नहीं हो सकते।
- उच्च पूंजी लागत: CCUS, RE-RTC ऊर्जा और परमाणु एकीकरण जैसी तकनीकों हेतु बड़े प्रारंभिक निवेश एवं लंबी वापसी अवधि की आवश्यकता होती है।
- हरित वित्तीय बाधाएँ: MSMEs को सस्ती ऋण तक सीमित पहुँच, कमजोर बैलेंस शीट और उच्च उधारी लागत का सामना करना पड़ता है।
- स्वच्छ ऊर्जा उपलब्धता:विश्वसनीय निरंतर नवीकरणीय ऊर्जा की अनुपलब्धता तथा ग्रिड संबंधी बाधाएँ गहन डीकार्बोनाइजेशन में अवरोध उत्पन्न करती हैं।
आगे की राह
- हरित वित्त का विस्तार: मिश्रित वित्त, क्रेडिट गारंटी और रियायती ऋण का विस्तार करना, विशेषकर MSMEs के लिए।
- प्रौद्योगिकी विकास और स्थानीयकरण: स्वच्छ औद्योगिक प्रौद्योगिकियों के घरेलू निर्माण में तीव्रता लाना।
- कार्बन बाजारों को सुदृढ़ करना: कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग योजना का पारदर्शी और विश्वसनीय क्रियान्वयन सुनिश्चित करना।
स्रोत: PIB
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