ताइवान के आसपास चीन का सैन्य अभ्यास एवं भारत के सामरिक हित

पाठ्यक्रम: GS3/रक्षा और सुरक्षा

संदर्भ

  • हाल ही में चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) ने ताइवान के आसपास ‘जस्टिस मिशन-2025’ नामक एक व्यापक सैन्य अभ्यास आयोजित किया।

‘जस्टिस मिशन-2025’ के बारे में 

  • यह चीन की PLA द्वारा ताइवान के आसपास किया गया एक बड़े पैमाने का सैन्य अभ्यास था।
  • यह वर्ष का दूसरा प्रमुख अभ्यास था, जिसे चीन की संप्रभुता और राष्ट्रीय एकता की रक्षा के संकल्प को प्रदर्शित करने तथा ताइवान के अलगाववादी बलों एवं विदेशी हस्तक्षेप, विशेषकर अमेरिका, को चेतावनी देने के उद्देश्य से आयोजित किया गया।
  • उद्देश्य :
    • चीन की संप्रभुता और राष्ट्रीय एकता की रक्षा करना;
    • ताइवान की स्वतंत्रता की गतिविधियों को रोकना;
    • विदेशी हस्तक्षेप (विशेषकर अमेरिका और जापान से) का प्रतिरोध करना।
  • यह अभ्यास ट्रम्प प्रशासन द्वारा ताइवान को प्रस्तावित 11 अरब डॉलर के हथियार सौदे से भी जुड़ा है, जिसमें स्वचालित हॉवित्ज़र, उन्नत रॉकेट लांचर और मिसाइल प्रणालियाँ शामिल हैं, जिनकी अमेरिकी कांग्रेस से स्वीकृति लंबित है।

मुख्य विशेषताएँ

  • बहु-क्षेत्रीय फोकस : इस अभ्यास में ‘त्रि-आयामी प्रतिरोध’ पर बल दिया गया — भूमि, समुद्र और वायु में समन्वित अभियान।
    •  इसका उद्देश्य PLA की नाकेबंदी क्षमता, युद्ध तत्परता और समग्र श्रेष्ठता को सुदृढ़ करना था।
  • वायु अभियान : पहले दिन 130 से अधिक विमान sorties संचालित किए गए।
    • इनमें से 90 ने ताइवान स्ट्रेट की मध्य रेखा को पार किया, जो एक दुर्लभ और उत्तेजक कदम था और पूर्व की मौन सीमाओं को तोड़ता था।
  • रॉकेट और मिसाइल अभ्यास : दूसरे दिन चीन ने लंबी दूरी की रॉकेट फायरिंग की।
    • 10 रॉकेट ताइवान के सन्निकट क्षेत्र में गिरे, जो अब तक के ऐसे अभ्यासों में सबसे निकटतम दूरी थी।

भारत के सामरिक हितों पर प्रभाव

  • भारत की सुरक्षा संरचना पर सामरिक प्रभाव: भारत PLA की ताइवान के निकट गतिविधियों को चीनी सैन्य विस्तारवाद के व्यापक पैटर्न का हिस्सा मानता है। यह स्पष्ट है:
    • लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश में वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर PLA का आक्रामक व्यवहार, तथा
    • दक्षिण चीन सागर और पूर्वी चीन सागर में उसका आक्रामक दृष्टिकोण।
  • भारत की इंडो-पैसिफिक रणनीति पर प्रभाव: ताइवान अभ्यास भारत के इस विश्वास को सुदृढ़ करता है कि सामूहिक प्रतिरोध तंत्र आवश्यक है, विशेषकर क्वाड गठबंधन (भारत, जापान, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया) के माध्यम से।
    • यह समुद्री क्षेत्रीय जागरूकता में अधिक समन्वय की आवश्यकता को रेखांकित करता है। 
    • इससे मलाबार जैसे संयुक्त नौसैनिक अभ्यासों में तीव्रता आ सकती है, जो नाकेबंदी का सामना करने और नौवहन की स्वतंत्रता बनाए रखने पर केंद्रित हैं।
  • जापान के साथ सहयोग की गहराई: जापान ने घोषणा की है कि ताइवान पर चीनी हमला उसकी सुरक्षा के लिए खतरा होगा।
    • भारत और जापान द्विपक्षीय रक्षा और खुफिया सहयोग को तीव्र कर सकते हैं, विशेषकर भारत–जापान विशेष सामरिक एवं वैश्विक साझेदारी तथा एशिया-अफ्रीका ग्रोथ कॉरिडोर (AAGC) जैसे ढाँचों के अंतर्गत, जो चीन की BRI का आर्थिक विकल्प है।
  • समुद्री और व्यापारिक चिंताएँ: ताइवान स्ट्रेट में किसी भी प्रकार की वृद्धि सीधे इंडो-पैसिफिक समुद्री व्यापार मार्गों को खतरे में डालती है, जिनसे भारत का 55% से अधिक व्यापार और पूर्वी एशिया से लगभग सभी ऊर्जा आयात गुजरते हैं। इससे:
    • भारत, जापान और दक्षिण कोरिया के बीच नौवहन मार्ग बाधित हो सकते हैं;
    • बीमा और मालभाड़ा लागत बढ़ सकती है; तथा
    • दक्षिण चीन सागर मार्गों पर निर्भर ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखलाएँ प्रभावित हो सकती हैं।
  • भारत की भूमिका का विस्तार: भारतीय नौसेना का सामरिक सिद्धांत मलक्का स्ट्रेट और दक्षिण चीन सागर के मार्गों में निरंतर उपस्थिति और निगरानी सुनिश्चित करने हेतु विकसित हो सकता है।
    • भारत का सिंगापुर, वियतनाम और फिलीपींस के साथ सहयोग लॉजिस्टिक समर्थन समझौतों एवं संयुक्त गश्तों के अंतर्गत बढ़ सकता है।
  • चीन और ताइवान के बीच कूटनीतिक संतुलन: भारत आधिकारिक रूप से ‘वन-चाइना नीति’ का पालन करता है, किंतु ताइवान के साथ उसके अनौपचारिक संबंध सुदृढ़ हुए हैं, विशेषकर सेमीकंडक्टर प्रौद्योगिकी, व्यापार और निवेश, तथा शिक्षा एवं कौशल साझेदारी में।
    • भारत की संभावित नीति रणनीतिक अस्पष्टता बनाए रखना होगी — सार्वजनिक रूप से वन-चाइना नीति की पुष्टि करते हुए, ताइवान के साथ संबंधों को गोपनीय रूप से सुदृढ़ करना।
  • भारत के रक्षा आधुनिकीकरण पर प्रभाव: PLA की संयुक्त-बल क्षमताओं का प्रदर्शन भारत के लिए अपने आधुनिकीकरण अभियान का चेतावनी संकेत है।
    • यह नेटवर्क-केंद्रित युद्ध प्रणालियों और एकीकृत त्रि-सेवा कमांड की आवश्यकता को उजागर करता है।
    • भारत की आगामी थिएटर कमांड प्रणाली PLA के संयुक्त प्रशिक्षण एकीकरण से सबक ले सकती है।
    • ताइवान के निकट PLA की लंबी दूरी की मिसाइल प्रदर्शनी भारत को अपने स्वदेशी मिसाइल कार्यक्रमों, जैसे अग्नि-V MIRV और हाइपरसोनिक प्रणालियों, को तीव्र करने के लिए प्रेरित कर सकती है।

निष्कर्ष एवं आगे की राह 

  • ताइवान के आसपास चीन के सैन्य अभ्यास भारत के लिए सामरिक, आर्थिक और सुरक्षा संबंधी चुनौतियाँ प्रस्तुत करते हैं। यह अमेरिका और क्वाड साझेदारों के साथ संबंधों को संतुलित करने की आवश्यकता को रेखांकित करता है, साथ ही चीन के साथ संबंधों का प्रबंधन भी आवश्यक है।
  • जोखिमों में सेमीकंडक्टर आपूर्ति श्रृंखलाओं में व्यवधान, क्षेत्रीय स्थिरता के लिए खतरे, और इंडो-पैसिफिक में भारत की नौसैनिक उपस्थिति को सुदृढ़ करने की आवश्यकता शामिल है।
  • भारत से अपेक्षा है कि वह सावधानीपूर्ण किंतु दृढ़ दृष्टिकोण अपनाएगा, नियम-आधारित व्यवस्था का समर्थन करेगा, क्वाड साझेदारियों को गहरा करेगा, और अपनी समुद्री तथा तकनीकी क्षमता को सुदृढ़ करेगा।

स्रोत: TH

 

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