बॉम्बे उच्च न्यायालय द्वारा वयस्क मानव तस्करी पीड़िता की निरोधात्मक कार्रवाई निरस्त 

पाठ्यक्रम: GS2/राजव्यवस्था और शासन

संदर्भ

  • बॉम्बे उच्च न्यायालय ने एक वयस्क महिला के विरुद्ध पारित एक वर्ष की निरोधात्मक आदेश को निरस्त कर दिया, जिसे पुलिस छापे के दौरान अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम, 1956 (PITA) के अंतर्गत बचाया गया था।

अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम, 1956 (PITA)  

  • धारा 17: PITA सख्त समयसीमाएँ निर्धारित करता है ताकि बचाव की कार्रवाई लंबी अथवा मनमानी निरोध में परिणत न हो। बचाव के तुरंत बाद:
    • यदि मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुतिकरण तुरंत संभव न हो, तो व्यक्ति को अधिकतम 10 दिनों तक अस्थायी सुरक्षित अभिरक्षा में रखा जा सकता है।
    • मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुतिकरण के बाद अन्वेषण अनिवार्य है, जिसके दौरान अंतरिम अभिरक्षा तीन सप्ताह तक जारी रह सकती है।
  • दीर्घकालिक स्थानांतरण (1–3 वर्ष): केवल तभी अनुमेय है जब मजिस्ट्रेट यह दर्ज करे कि व्यक्ति “देखभाल और संरक्षण की आवश्यकता” में है।
  • संरक्षण गृह बनाम सुधारात्मक संस्था:
    • संरक्षण गृह (धारा 2(ग)): इसका उद्देश्य तस्करी के पीड़ितों की देखभाल, पुनर्वास और सहयोग प्रदान करना है।
    • सुधारात्मक संस्था (धारा 2(ख) सहपठित धारा 10A): यह विशेष रूप से उन अपराधियों के लिए है जिन्हें PITA के अंतर्गत दोषसिद्ध किया गया है। इसमें दोषसिद्धि के बाद सुधार हेतु निरोध शामिल है।

न्यायालय के प्रमुख अवलोकन :

  • PITA पीड़ितों के प्रति दंडात्मक नहीं है: अधिनियम का उद्देश्य यौन शोषण और तस्करी को रोकना है, न कि पीड़ितों को दंडित करना।
  • व्यक्तिगत स्वतंत्रता सर्वोपरि है: किसी भी प्रतिबंध को संविधान के अनुच्छेद 19 और 21 मानकों के अनुरूप होना आवश्यक है।
  • मौलिक स्वतंत्रताएँ निलंबित नहीं होतीं: केवल इसलिए कि कोई व्यक्ति तस्करी का शिकार हुआ है, उसकी स्वतंत्रता समाप्त नहीं की जा सकती।
  • गरीबी, आजीविका का अभाव या परिवार/संरक्षक का न होना: ये परिस्थितियाँ राज्य के सहयोग और पुनर्वास की आवश्यकता को उचित ठहरा सकती हैं, किंतु वयस्क की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को सीमित करने का कानूनी आधार नहीं बन सकतीं।
  • वयस्कों के लिए सहमति केंद्रीय है: एक बार जब वयस्क स्पष्ट रूप से संरक्षण गृह छोड़ने की इच्छा व्यक्त करता है, तो निरंतर अभिरक्षा देखभाल नहीं बल्कि निरोध बन जाती है।
  • स्थापित प्रमुख विधिक सिद्धांत :“PITA 1956 यौन शोषण के पीड़ित को दंडित करने हेतु नहीं बनाया गया था।
    • पीड़ित को केवल इस आधार पर अनुचित प्रतिबंधों के अधीन नहीं किया जा सकता कि वह पुनः अनैतिक कृत्यों में संलग्न हो सकती है।”

आगे की राह :

  • गैर-निरोधात्मक सहयोग को सुदृढ़ करना: समुदाय-आधारित पुनर्वास तक पहुँच का विस्तार करना, जिसमें अस्थायी आश्रय, परामर्श, विधिक सहायता और कौशल विकास शामिल हों, बिना अनिवार्य संस्थागतकरण के।
  • कानून प्रवर्तन की क्षमता निर्माण: पुलिस और न्यायिक अधिकारियों को पीड़ित-केंद्रित और संवैधानिक दृष्टिकोण अपनाने हेतु प्रशिक्षित करना, नैतिकतावादी या पितृसत्तात्मक धारणाओं से बचते हुए।
  • जीवित बचे व्यक्तियों के लिए विधिक जागरूकता: बचाए गए व्यक्तियों में उनके विधिक अधिकारों, विकल्पों और उपलब्ध सहयोग तंत्रों के प्रति जागरूकता बढ़ाना, ताकि वे सूचित निर्णय ले सकें।

स्रोत: IE

 

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