भारत में बाल तस्करी

पाठ्यक्रम: GS2/राजव्यवस्था और शासन

संदर्भ

  • बाल तस्करी भारत में एक गंभीर मानवाधिकार चुनौती बनी हुई है, यद्यपि एक सुदृढ़ संवैधानिक ढाँचा और अनेक वैधानिक संरक्षण उपस्थित हैं।

बाल तस्करी क्या है?

  • पालेर्मो प्रोटोकॉल (संयुक्त राष्ट्र प्रोटोकॉल, 2000) बाल तस्करी को परिभाषित करता है: “किसी बच्चे की भर्ती, परिवहन, स्थानांतरण, आश्रय या प्राप्ति, शोषण के उद्देश्य से।”
  • भारतीय दंड संहिता (भारतीय न्याय संहिता – BNS), 2023 की धारा 143 तस्करी को परिभाषित करती है: “शोषण के लिए व्यक्तियों की भर्ती, परिवहन, आश्रय, स्थानांतरण या प्राप्ति।”
    • साधन: धमकी, बल, दबाव, अपहरण, धोखाधड़ी, छल, शक्ति का दुरुपयोग या प्रलोभन।
    • शोषण का दायरा: शारीरिक और यौन शोषण, दासता, बंधुआ मजदूरी, अंगों का जबरन निष्कासन।
    • परिभाषा में सहमति की स्थिति अप्रासंगिक है।

बाल तस्करी के कारण

  • निर्धनता: निर्धन परिवार झूठे वादों और बेहतर अवसरों के लालच में तस्करों के शिकार बनते हैं।
  • जागरूकता का अभाव: ग्रामीण क्षेत्रों में कम साक्षरता और सीमित जानकारी लोगों को धोखे एवं शोषण के प्रति अधिक संवेदनशील बनाती है।
  • प्रवासन: असंगठित घरेलू और अंतरराष्ट्रीय प्रवासन तस्करों को ऐसे व्यक्तियों को निशाना बनाने का अवसर देता है जो अपने सामाजिक नेटवर्क से कटे होते हैं।
  • कानून प्रवर्तन की कमी और भ्रष्टाचार: पुलिस प्रशिक्षण की कमी और भ्रष्टाचार तस्करी से निपटने की चुनौतियों को और बढ़ाते हैं।

भारत में संवैधानिक संरक्षण

  • अनुच्छेद 21: जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार, जिसमें गरिमा के साथ जीने का अधिकार भी शामिल है।
  • अनुच्छेद 23: मानव तस्करी और बंधुआ मजदूरी पर प्रतिबंध।
  • अनुच्छेद 24: 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों को खतरनाक उद्योगों में रोजगार देने पर प्रतिबंध।
  • अनुच्छेद 39(e): राज्य को सुनिश्चित करना चाहिए कि श्रमिकों और बच्चों का स्वास्थ्य और बल का दुरुपयोग न हो।
  • अनुच्छेद 39(f): बच्चों को स्वतंत्रता, गरिमा और नैतिक व भौतिक परित्याग से सुरक्षा के साथ विकास के अवसर प्रदान करना।

बाल तस्करी के विरुद्ध न्यायिक हस्तक्षेप

  • विशाल जीत बनाम भारत संघ, 1990: न्यायालय ने कहा कि तस्करी और बाल वेश्यावृत्ति गंभीर सामाजिक-आर्थिक समस्याएँ हैं, जिनसे निपटने हेतु मानवीय एवं निवारक दृष्टिकोण आवश्यक है।
  • एम. सी. मेहता बनाम तमिलनाडु राज्य, 1996: न्यायालय ने बच्चों को खतरनाक उद्योगों में रोजगार से रोकने हेतु दिशा-निर्देश जारी किए।
  • बचपन बचाओ आंदोलन बनाम भारत संघ, 2011: सर्वोच्च न्यायालय ने बाल तस्करी और शोषण को रोकने हेतु निर्देश दिए।
  • के. पी. किरण कुमार बनाम राज्य: न्यायालय ने कठोर दिशा-निर्देश दिए और कहा कि तस्करी बच्चों के जीवन के मौलिक अधिकार का गंभीर उल्लंघन है।

तस्करी-रोधी अपराधों को नियंत्रित करने वाले कानून

  • अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम, 1956: अनैतिक तस्करी और वेश्यावृत्ति रोकने हेतु बनाया गया। इसमें 1978 और 1986 में संशोधन हुए।
  • बाल श्रम (निषेध और विनियमन) अधिनियम, 1986: बच्चों को कुछ रोजगारों से रोकता है और अन्य क्षेत्रों में कार्य की शर्तों को नियंत्रित करता है।
  • बंधुआ मजदूरी प्रणाली (उन्मूलन) अधिनियम, 1976: बंधुआ मजदूरी पर प्रतिबंध लगाता है और मुक्त श्रमिकों के पुनर्वास का प्रावधान करता है।
  • किशोर न्याय (बालकों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम, 2015: कानून से संघर्षरत बच्चों से संबंधित प्रावधान करता है।
  • बाल यौन अपराधों से संरक्षण अधिनियम (POCSO), 2012: बच्चों के वाणिज्यिक यौन शोषण को रोकने हेतु बनाया गया।

आगे की राह

  • ऑनलाइन भर्ती रोकने हेतु डिजिटल निगरानी और जागरूकता बढ़ाना।
  • जाँच और अभियोजन की गुणवत्ता सुधारकर दोषसिद्धि दर बढ़ाना।
  • पीड़ित-केंद्रित पुनर्वास सुनिश्चित करना, जिसमें मनोवैज्ञानिक देखभाल, शिक्षा और आजीविका समर्थन शामिल हो।
  • केंद्र–राज्य समन्वय को गहरा करना, संयुक्त टास्क फोर्स, साझा डेटाबेस और क्षमता निर्माण के माध्यम से।

Source: TH

 

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