भारत में सहकारी समितियों की पुनर्कल्पना

पाठ्यक्रम: GS3/ अर्थव्यवस्था

संदर्भ

  • संयुक्त राष्ट्र ने 2025 को ‘अंतर्राष्ट्रीय सहकारी वर्ष (IYC)’ घोषित किया है, जिसका विषय है “सहकारी संस्थाएँ एक बेहतर विश्व का निर्माण करती हैं”। इस घोषणा के साथ भारत के सहकारी क्षेत्र को वैश्विक स्तर पर नया ध्यान प्राप्त हुआ है।

परिचय

  • भारत में सहकारिता का विचार ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ के सभ्यतागत दर्शन में गहराई से निहित है, जो ‘विश्व  एक परिवार है’ के सिद्धांत पर बल देता है और आपसी सहायता, साझा जिम्मेदारी और सामूहिक समृद्धि को बढ़ावा देता है।
  • अंतर्राष्ट्रीय सहकारिता गठबंधन के अनुसार, सहकारी समितियाँ सदस्य-स्वामित्व वाले और सदस्य-शासित उद्यम हैं जो लोकतांत्रिक निर्णय लेने की प्रक्रिया के माध्यम से आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक उद्देश्यों को पूरा करते हैं।

ऐतिहासिक विकास

भारतीय सहकारी आंदोलन चार प्रमुख चरणों से गुज़रा है, जो साधारण ऋण प्रदाताओं से विकसित होकर बहु-क्षेत्रीय आर्थिक इंजन बन गया है।

  • प्रायोगिक चरण (1904–1911): सहकारी ऋण सोसायटी अधिनियम, 1904 द्वारा शुरू किया गया, जिसका मुख्य उद्देश्य किसानों को साहूकारों के ऋण-जाल से बचाना था।
  • विस्तार चरण (1912–1947): 1912 का अधिनियम ने गैर-ऋण सहकारी संस्थाओं (जैसे विपणन, आवास आदि) की अनुमति दी। 1919 सुधार ने “सहकारिता” को प्रांतीय विषय बनाया, जिससे राज्यों को स्थानीय आवश्यकताओं के अनुसार कानून बनाने का अधिकार मिला।
  • राज्य-नेतृत्व वृद्धि (1947–2020): सहकारी संस्थाओं को पंचवर्षीय योजनाओं में शामिल किया गया। प्रमुख उपलब्धियों में अमूल (1946) की स्थापना, NCDC (1963) का गठन विकास के लिए, और NABARD (1982) की स्थापना ग्रामीण ऋण के पुनर्वित्त के लिए शामिल हैं।
  • संरचनात्मक परिवर्तन (2021–वर्तमान): 6 जुलाई 2021 को सहकारिता मंत्रालय की स्थापना ने ध्यान पेशेवरकरण और ईज़ ऑफ़ डूइंग बिज़नेस  की ओर केंद्रित किया।

भारत में सहकारी समितियों का महत्व

आर्थिक प्रभाव :

  • GDP योगदान: सहकारी संस्थाएँ ग्रामीण अर्थव्यवस्था का एक भाग संचालित करती हैं और भारत के $5 ट्रिलियन अर्थव्यवस्था लक्ष्य में महत्वपूर्ण योगदान देने का प्रयास करती हैं।
  • बाज़ार नेतृत्व: IFFCO और अमूल जैसे प्रमुख खिलाड़ी अपने क्षेत्रों में प्रभुत्व रखते हैं, उच्च गुणवत्ता वाले उर्वरक एवं डेयरी उत्पाद उपलब्ध कराते हैं तथा वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा करते हैं।
  • रोज़गार: ये प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से 30 करोड़ से अधिक लोगों को आजीविका प्रदान करती हैं, विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में।

वित्तीय समावेशन :

  • सुलभ ऋण: PACS (प्राथमिक कृषि ऋण समितियाँ) छोटे किसानों को कम ब्याज दर पर ऋण देती हैं, जिससे वे असंगठित साहूकारों से बचते हैं।
  • तीन-स्तरीय बैंकिंग: राज्य, जिला और प्राथमिक स्तर का मजबूत नेटवर्क यह सुनिश्चित करता है कि वित्तीय सेवाएँ “अंतिम छोर” तक पहुँचें, जहाँ वाणिज्यिक बैंक प्रायः कार्य नहीं करते।

कृषि समर्थन:

  • इनपुट आपूर्ति: सहकारी संस्थाएँ बीज, उर्वरक और कीटनाशक समय पर एवं उचित मूल्य पर उपलब्ध कराती हैं।
  • मोलभाव शक्ति: उत्पाद को एकत्रित कर छोटे किसानों को बड़े खरीदारों से बेहतर मूल्य प्राप्त करने की क्षमता मिलती है।
  • भंडारण समाधान: विश्व का सबसे बड़ा अनाज भंडारण योजना PACS स्तर पर स्थानीय गोदाम बना रही है ताकि कटाई के बाद होने वाली हानि को कम किया जा सके।

सामाजिक विकास :

  • लोकतांत्रिक शासन: “एक सदस्य, एक वोट” सिद्धांत पर आधारित संचालन यह सुनिश्चित करता है कि निर्णय लेने की शक्ति समुदाय के पास रहे, न कि शेयरधारकों के पास।
  • महिला सशक्तिकरण: लिज्जत पापड़ और महिला-नेतृत्व वाली डेयरी सहकारी संस्थाओं ने लाखों महिलाओं को आर्थिक स्वतंत्रता प्रदान की है।
  • न्यायसंगत मूल्य निर्धारण: ये बाज़ार स्थिरकर्ता के रूप में कार्य करती हैं, जिससे उपभोक्ताओं को उचित मूल्य और उत्पादकों को लाभ का बड़ा हिस्सा मिलता है।

आधुनिकीकरण एवं नवाचार :

  • डिजिटल परिवर्तन: पारदर्शिता और वास्तविक समय ऑडिट सुनिश्चित करने के लिए 63,000 से अधिक PACS का कंप्यूटरीकरण किया जा रहा है।
  • विविधीकरण: कृषि से आगे बढ़कर सहकारी संस्थाएँ अब जैविक निर्यात, बीज उत्पादन और नवीकरणीय ऊर्जा (बायोगैस) में प्रवेश कर रही हैं।
  • बहु-सेवा केंद्र: गाँव की सहकारी संस्थाओं को कॉमन सर्विस सेंटर (CSC) और जनऔषधि केंद्र में परिवर्तित किया जा रहा है ताकि डिजिटल सेवाएँ और कम लागत वाली दवाएँ उपलब्ध कराई जा सकें।

सहकारिता के लिए की गई प्रमुख पहल

  • प्राथमिक कृषि ऋण समितियों (PACS) को सशक्त बनाना:
    • मॉडल उपनियम : 32 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों द्वारा नए उपनियम अपनाए गए हैं, जिससे PACS साधारण ऋण प्रदाताओं से आगे बढ़कर बहुउद्देशीय संस्थाएँ बन सकें, जो 25 से अधिक व्यावसायिक गतिविधियों (जैसे मत्स्य पालन, डेयरी और भंडारण) में संलग्न हों।
    • राष्ट्रव्यापी कंप्यूटरीकरण : ₹2,925 करोड़ की परियोजना के अंतर्गत 79,630 PACS का डिजिटलीकरण किया जा रहा है। वर्तमान में 59,261 PACS 14 भाषाओं में एक समान राष्ट्रीय ERP सॉफ़्टवेयर का उपयोग कर रही हैं, जिससे पारदर्शिता और वास्तविक समय ऑडिट सुनिश्चित हो रहा है।
    • ई-PACS एकीकरण : 32,119 से अधिक PACS अब “ई-PACS” के रूप में सक्षम हैं, जो राज्य और जिला सहकारी बैंकों के माध्यम से NABARD से डिजिटल रूप से जुड़ी हैं, जिससे निर्बाध ऋण प्रवाह संभव हो रहा है।
  • बहु-सेवा केंद्रों के रूप में विविधीकरण:
    • स्वास्थ्य सेवा पहुँच : 812 PACS अब प्रधानमंत्री भारतीय जनऔषधि केंद्र के रूप में कार्यरत हैं, जो ग्रामीण क्षेत्रों में कम लागत वाली दवाएँ उपलब्ध कराती हैं।
    • डिजिटल सेवा केंद्र : 51,836 से अधिक PACS अब कॉमन सर्विस सेंटर (CSC) के रूप में कार्यरत हैं, जो ग्रामीणों को 300 से अधिक ई-सेवाएँ (जैसे आधार और बिल भुगतान) प्रदान करती हैं।
  • वैश्विक विस्तार एवं विशेषीकृत शीर्ष संस्थाएँ :
    • NCOL (ऑर्गेनिक्स): “भारत ऑर्गेनिक्स” ब्रांड के अंतर्गत प्रमाणित जैविक उत्पादों का विपणन करता है, जिसमें 28 कीटनाशक-परीक्षित उत्पाद शामिल हैं।
    • BBSSL (बीज): उच्च गुणवत्ता वाले “भारत बीज” उत्पादन और ब्रांडिंग के लिए एक शीर्ष संस्था।
  • प्रमुख आजीविका एवं भंडारण परियोजनाएँ:
    • विश्व का सबसे बड़ा अनाज भंडारण योजना: एक पायलट परियोजना के अंतगर्त 112 PACS में 68,702 MT भंडारण क्षमता का निर्माण किया गया है, जिससे कटाई के बाद होने वाली हानि कम हुई है और खाद्य सुरक्षा बेहतर हुई है।
    • श्वेत क्रांति 2.0 : दूध खरीद में 50% वृद्धि के लिए 5-वर्षीय योजना। अब तक 20,070 नई डेयरी सहकारी समितियाँ पंजीकृत की गई हैं।
    • आत्मनिर्भरता अभियान : ई-सम्युक्ति और ई-समृद्धि जैसे डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म के माध्यम से दाल और मक्का की MSP पर सुनिश्चित खरीद।
  • वित्तीय एवं विधायी सुधार :
    • कर राहत: सहकारी अधिभार 12% से घटाकर 7% किया गया और न्यूनतम वैकल्पिक कर (MAT) को 15% किया गया।
    • चीनी क्षेत्र पुनरुद्धार : सहकारी चीनी मिलों को ₹46,000 करोड़ से अधिक कर राहत दी गई और एथेनॉल व सह-उत्पादन इकाइयों के लिए ₹10,005 करोड़ वितरित किए गए।
    • बैंकिंग समर्थन : ग्रामीण सहकारी बैंकों को डिजिटल और ऑडिट सेवाओं में सहयोग देने के लिए “सहकार सारथी” साझा सेवा इकाई शुरू की गई।
  • शिक्षा एवं गतिशीलता :
    • त्रिभुवन सहकारी विश्वविद्यालय (TSU): अप्रैल 2025 में स्थापित, यह भारत का प्रथम राष्ट्रीय विश्वविद्यालय है जो सहकारी क्षेत्र के लिए पेशेवर कार्यबल तैयार करता है।
    • सहकार टैक्सी : भारत का प्रथम सहकारी-नेतृत्व वाला मोबिलिटी प्लेटफ़ॉर्म (अमूल और IFFCO द्वारा समर्थित), जो वर्तमान में 1.5 लाख चालकों के साथ परीक्षण-चरण में है।

सहकारी क्षेत्र के समक्ष चुनौतियाँ

  • क्षेत्रीय असंतुलन : पश्चिमी भारत प्रमुख है जबकि उत्तर-पूर्व और पूर्वी राज्य पिछड़ रहे हैं।
  • शासन संबंधी कमी : राजनीतिकरण, भाई-भतीजावाद (“अंकल जज सिंड्रोम”), कमजोर जवाबदेही।
  • अवसंरचना अंतराल : भंडारण, लॉजिस्टिक्स और प्रसंस्करण अभी भी बड़े पैमाने पर अपर्याप्त हैं।
  • वित्तीय दबाव : सहकारी बैंकों में NPA; दीर्घकालिक पूंजी तक सीमित पहुँच।

आगे की राह

  • संतुलित क्षेत्रीय विस्तार : पिछड़े क्षेत्रों में गुजरात और महाराष्ट्र के सफल मॉडलों को दोहराना।
  • प्रौद्योगिकी गहराई : ऑडिट, ट्रेसबिलिटी और धोखाधड़ी रोकथाम के लिए AI, डेटा एनालिटिक्स एवं ब्लॉकचेन का उपयोग।
  • क्रेडिट-प्लस मॉडल : PACS को सतत बहु-सेवा व्यावसायिक केंद्रों में परिवर्तित करना।
  • वैश्विक ब्रांडिंग : उच्च-मूल्य वाले वैश्विक बाज़ारों तक पहुँचने के लिए बीज, ऑर्गेनिक्स और कृषि-निर्यात में “भारत” ब्रांड का विस्तार।

निष्कर्ष

  • भारत का सहकारी आंदोलन एक संकीर्ण ग्रामीण ऋण तंत्र से विकसित होकर समावेशी विकास का बहु-क्षेत्रीय स्तंभ बन गया है। डिजिटल सुधारों, संस्थागत नवाचार और नीतिगत समर्थन के साथ, आज सहकारी संस्थाएँ ग्रामीण आजीविका को सशक्त बनाने, लोकतंत्र को सुदृढ़ करने और सतत विकास को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।
दैनिक मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न
[प्रश्न] भारत में सहकारी क्षेत्र की स्थिरता के लिए डिजिटलीकरण और  संस्थागत दक्षता (Professionalisation) अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। विश्लेषण कीजिए।

Source: IE

 

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