बीज अधिनियम 2026 और किसानों पर उसका प्रभाव

पाठ्यक्रम: GS3/कृषि

संदर्भ

  • हाल ही में कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री (MoA&FW) ने बीज अधिनियम 2026 की विशेषताओं और किसानों पर इसके प्रभाव के बारे में विस्तार से जानकारी दी।
    • बीज अधिनियम 2026 को संसद के आगामी बजट सत्र में प्रस्तुत किए जाने की संभावना है।

नए बीज अधिनियम (बीज अधिनियम 2026) लाने के प्रमुख कारण

  • बीज अधिनियम 1966 की पुरानी प्रकृति: बीज अधिनियम 1966 उस समय लागू किया गया था जब बीज बाजार मुख्यतः सार्वजनिक क्षेत्र पर आधारित था; संकर और आनुवंशिक रूप से उन्नत किस्में सीमित थीं; तथा डिजिटल प्रणाली व ट्रेसबिलिटी मौजूद नहीं थी।
    • आज बीज क्षेत्र विशाल, निजी क्षेत्र-प्रधान और तकनीकी रूप से उन्नत है।
    • पुराना कानून डिजिटल निगरानी, आधुनिक प्रमाणन मानकों और प्रभावी प्रवर्तन तंत्र के प्रावधानों से वंचित है।
  • बीज ट्रेसबिलिटी की कमी: वर्तमान में किसान प्रायः नहीं जानते कि बीज किसने उत्पादित किया, क्या वह प्रमाणित था, और यदि फसल विफल हो जाए तो जिम्मेदार कौन है; इससे शिकायत निवारण अत्यंत कठिन हो जाता है।
  • नकली और घटिया बीजों की बढ़ती समस्या: भारत भर के किसान प्रायः मिलावटी या नकली बीजों, गलत लेबल वाले बीजों, खराब अंकुरण एवं कम उत्पादन के कारण हानि की रिपोर्ट करते हैं।
    • पुराने अधिनियम में दंड न्यूनतम थे और अभियोजन धीमा व अप्रभावी था।
  • किसानों के अधिकारों का संरक्षण: वाणिज्यिक बीज बिक्री को विनियमित करते समय किसानों के पारंपरिक अधिकारों—बीज बचाने, उपयोग करने, आदान-प्रदान करने और साझा करने—की रक्षा करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है, ताकि किसानों को पुरानी प्रथाओं के लिए अपराधी न बनाया जाए।तथा 
  • निजी बीज बाजार का विकास: निजी बीज कंपनियों के तीर्वता से विस्तार के साथ गुणवत्ता नियंत्रण असमान हो गया है और छोटे किसान बिना सुरक्षा उपायों के आक्रामक विपणन के संपर्क में हैं।
    • पुराना कानून बीज कंपनियों और विक्रेताओं के पंजीकरण तथा निजी खिलाड़ियों की जवाबदेही को पर्याप्त रूप से विनियमित नहीं करता।
  • खाद्य सुरक्षा और उत्पादकता सुनिश्चित करना: घटिया बीज सीधे राष्ट्रीय फसल उत्पादन, खाद्य उपलब्धता और मूल्य स्थिरता को प्रभावित करते हैं।
    • ऐसे समय में जब जलवायु परिवर्तन कृषि के लिए जोखिम बढ़ा रहा है, बीज की गुणवत्ता और भी महत्वपूर्ण हो जाती है।
  • आयातित बीजों का विनियमन: भारत कई बीज किस्मों का आयात करता है, लेकिन कमजोर विनियमन अनुपयुक्त या घटिया बीजों के प्रवेश का कारण बन सकता है, जिससे पारिस्थितिक और कृषि संबंधी जोखिम उत्पन्न होते हैं।

बीज अधिनियम 2026 की प्रमुख विशेषताएँ

  • राष्ट्रीय स्तर पर बीज ट्रेसबिलिटी: प्रत्येक वाणिज्यिक बीज पैकेट पर एक QR कोड होगा जिसे किसान स्कैन कर सकेंगे।
    • स्कैन करने पर प्रमुख जानकारी मिलेगी: बीज किसने उत्पादित किया, कहाँ से प्राप्त हुआ, और किस विक्रेता ने बेचा।
    • इसका उद्देश्य गुमनाम बीज बिक्री समाप्त करना और नकली या घटिया बीजों का शीघ्र पता लगाना है, जिससे किसानों को त्वरित समाधान मिल सके।
  • बीज कंपनियों और विक्रेताओं का अनिवार्य पंजीकरण: अधिनियम वाणिज्यिक बीज उत्पादकों, व्यापारियों और विक्रेताओं का अनिवार्य पंजीकरण प्रस्तावित करता है।
    • अपंजीकृत विक्रेताओं को बीज बेचने की अनुमति नहीं होगी।
    • यह सुनिश्चित करेगा कि केवल अधिकृत खिलाड़ी ही बाजार में कार्य करें, जिससे संदिग्ध विक्रेताओं का प्रवेश कम होगा।
  • घटिया और नकली बीजों पर कड़े दंड: नया अधिनियम जानबूझकर उल्लंघन करने पर ₹30 लाख तक जुर्माना और संभावित कारावास का प्रस्ताव करता है।
    • इसका उद्देश्य किसानों को बेईमान विक्रेताओं द्वारा नियमित शोषण से बचाना है।
  • पारंपरिक बीज प्रथाओं का संरक्षण: सरकारी अधिकारियों ने बल दिया है कि किसानों की पारंपरिक प्रथाएँ जैसे बीज बचाना, साझा करना और समुदाय के अंदर आदान-प्रदान करना प्रतिबंधित नहीं होंगी।
    • नया अधिनियम वाणिज्यिक बीज गुणवत्ता पर केंद्रित है, न कि पारंपरिक, गैर-ब्रांडेड बीज प्रणालियों पर।
  • आयातित बीजों का वैज्ञानिक मूल्यांकन: आयातित बीज भारतीय बाजार में प्रवेश से पहले कठोर वैज्ञानिक मूल्यांकन से गुजरेंगे, ताकि वे पारिस्थितिक, कृषि संबंधी और गुणवत्ता मानदंडों को पूरा करें।
    • यह स्थानीय किसानों को अनुपयुक्त विदेशी बीजों से बचाता है।
  • संस्थागत तंत्र और संघीय सहयोग: अधिनियम केंद्रीय और राज्य स्तर पर पर्यवेक्षण समितियाँ बना सकता है ताकि बीज परीक्षण, पंजीकरण एवं प्रवर्तन में बेहतर समन्वय हो सके।
    • कृषि एक राज्य विषय (भारतीय संविधान की अनुसूची VII) बनी रहती है, जिसका अर्थ है कि राज्यों को केंद्र के साथ अधिनियम लागू करने और प्रवर्तन में प्रमुख भूमिका निभानी होगी।

किसानों पर अपेक्षित प्रभाव

  • आत्मविश्वास और फसल उत्पादकता में वृद्धि: सत्यापित उत्पत्ति वाले उच्च गुणवत्ता वाले प्रमाणित बीज अंकुरण दरों में सुधार करते हैं, फसल विफलताओं को कम करते हैं और उत्पादन बढ़ाते हैं।
    • किसानों को बेहतर उत्पादन परिणाम और कम जोखिम का लाभ मिलेगा।
  • नकली और घटिया बीजों में कमी: ट्रेसबिलिटी को अनिवार्य बनाने और पंजीकरण व दंड लागू करने से बाजार में मिलावटी या नकली बीजों में उल्लेखनीय कमी आएगी।
    • यह विशेष रूप से छोटे किसानों के लिए महत्वपूर्ण है, जिनके सीमित संसाधन उन्हें घटिया इनपुट के प्रति अत्यधिक संवेदनशील बनाते हैं।
  • पारदर्शी आपूर्ति श्रृंखला: पारदर्शिता किसानों को सूचित खरीद निर्णय लेने और आवश्यकता पड़ने पर डिजिटल रिकॉर्ड का उपयोग कर शिकायत निवारण करने में सक्षम बनाती है।
    • समय के साथ विश्वसनीय बीज ब्रांड और विश्वासपात्र विक्रेता प्रमुखता प्राप्त करेंगे, जिससे बाजार अनुशासन में सुधार होगा।
  • सार्वजनिक और घरेलू बीज नवाचार को प्रोत्साहन: अधिनियम भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थानों (जैसे ICAR, कृषि विश्वविद्यालयों) की भूमिका को सुदृढ़ करता है, जिससे वे बीज विकास में अधिक परिभाषित भूमिका निभा सकें।
    • सुदृढ़ घरेलू प्रणालियाँ आयातित बीज किस्मों पर निर्भरता कम कर सकती हैं और स्थानीय रूप से अनुकूलित बीजों का समर्थन कर सकती हैं।

संबंधित चिंताएँ और चुनौतियाँ

  • कार्यान्वयन क्षमता: प्रभावी प्रवर्तन के लिए सुसज्जित बीज परीक्षण प्रयोगशालाएँ, प्रशिक्षित कर्मी और डिजिटल अवसंरचना की आवश्यकता होगी, विशेषकर छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में।
    • राज्यों की संस्थागत क्षमता में व्यापक भिन्नता है, जो समान रूप से लागू करने को प्रभावित कर सकती है।
  • कॉर्पोरेट प्रभाव को लेकर चिंताएँ: कठोर पंजीकरण और नियामक ढाँचे बड़े बीज निगमों के बीच बाजार शक्ति को केंद्रित कर सकते हैं, जिससे छोटे बीज उत्पादक हाशिए पर जा सकते हैं।
  • किसानों की जागरूकता की आवश्यकता: डिजिटल ट्रेसबिलिटी और शिकायत प्रणाली के लिए किसानों को इनके उपयोग के बारे में जागरूक होना आवश्यक है, जिसके लिए सुदृढ़ जनजागरूकता और शिक्षा कार्यक्रमों की आवश्यकता होगी।

स्रोत: PIB

 

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