पाठ्यक्रम: GS2/शासन; GS3/अर्थव्यवस्था
समाचारों में
- कैबिनेट सचिव टी.वी. सोमनाथन ने कहा कि भूमि अधिग्रहण भारत में बुनियादी ढाँचे के विकास में एक बड़ा अवरोध बना हुआ है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
- ब्रिटिशों ने भारत पर अपना नियंत्रण सुदृढ़ करने के लिए विभिन्न बंदोबस्त प्रणालियाँ लागू कर भूमि राजस्व संग्रह को मानकीकृत किया।
- तीन प्रमुख भूमि स्वामित्व प्रणालियाँ लागू थीं:
- जमींदारी प्रणाली:
- इसमें भूमि जमींदारों के स्वामित्व में होती थी, जो राज्य को भूमि राजस्व चुकाते थे, जबकि खेती उनके नियंत्रण में रहने वाले किसानों द्वारा की जाती थी।
- इस प्रणाली के दो रूप थे:
- स्थायी बंदोबस्त, जिसमें भूमि राजस्व स्थायी रूप से तय किया गया था और यह बंगाल, उड़ीसा, बनारस एवं मद्रास के कुछ हिस्सों में लागू था।
- संशोधित बंदोबस्त, जिसमें राजस्व का समय-समय पर पुनर्मूल्यांकन किया जाता था और यह उत्तर प्रदेश, पंजाब और मध्य प्रांतों जैसे क्षेत्रों में प्रचलित था।
- रैयतवारी प्रणाली: इसमें किसान (रैयत) अपनी भूमि के मालिक और कृषक होते थे तथा भूमि राजस्व सीधे राज्य को चुकाते थे।
- राजस्व प्रत्येक भूमि पर व्यक्तिगत रूप से आंका जाता था और बंदोबस्त अस्थायी होते थे।
- इसे 1792 में कैप्टन रीड और थॉमस मुनरो ने बारा महल में शुरू किया और बाद में इसे बॉम्बे, असम और बिहार जैसे क्षेत्रों में विस्तारित किया गया।
- महलवारी प्रणाली: इसमें भूमि सामूहिक रूप से गाँव समुदाय के स्वामित्व में होती थी, लेकिन खेती व्यक्तिगत रूप से की जाती थी।
- समुदाय राज्य को भूमि राजस्व एकत्र कर चुकाने के लिए जिम्मेदार होता था।
- यह प्रणाली महलों नामक विभाजनों पर आधारित थी और मुख्य रूप से पंजाब, आगरा एवं अवध में प्रचलित थी।
भारत की भूमि अधिग्रहण नीति की वर्तमान स्थिति
- न्यायसंगत मुआवजा और भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन में पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम, 2013 ने औपनिवेशिक युग के भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1894 को प्रतिस्थापित किया ताकि भूमि अधिग्रहण के लिए अधिक पारदर्शी और मानवीय ढाँचा प्रदान किया जा सके।
- यह 1 जनवरी 2014 से प्रभावी हुआ और 2015 में संशोधित किया गया।
- यह भूमि अधिग्रहण के लिए एक आधुनिक ढाँचा स्थापित करता है, जो प्रभावित परिवारों के लिए न्यायसंगत मुआवजा और पुनर्वास की गारंटी देता है।
प्रमुख विशेषताएँ
- भूमि अधिग्रहण में न्यायसंगत मुआवजा, सहमति और पारदर्शिता पर ध्यान केंद्रित करता है।
- पुनर्वास और पुनर्स्थापन (R&R) सुनिश्चित करता है, जिसमें आवास, आजीविका समर्थन, रोजगार या वार्षिकी, एवं पुनर्वास क्षेत्रों में बुनियादी ढाँचा शामिल है।
- भूमि मालिकों को शहरी क्षेत्रों में बाजार मूल्य का दोगुना और ग्रामीण क्षेत्रों में चार गुना मुआवजा मिलता है।
- सहमति अनिवार्य है—PPP परियोजनाओं के लिए 70% और निजी परियोजनाओं के लिए 80%।
- सिंचित बहु-फसली भूमि का अधिग्रहण प्रतिबंधित है, और यदि अधिग्रहित किया जाता है तो समकक्ष बंजर भूमि का विकास करना आवश्यक है।
- सामाजिक प्रभाव आकलन (SIA) अनिवार्य है ताकि सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय प्रभावों का मूल्यांकन किया जा सके।
- “सार्वजनिक उद्देश्य” को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया गया है ताकि दुरुपयोग रोका जा सके, और अनुपयोगी भूमि को पाँच वर्षों के अंदर वापस करना या भूमि बैंक में डालना आवश्यक है।
- रक्षा, रेलवे और परमाणु ऊर्जा परियोजनाएँ कुछ प्रक्रियाओं से मुक्त हैं, लेकिन मुआवजा एवं R&R अभी भी लागू होता है।
- अधिनियम पारदर्शिता, सार्वजनिक सुनवाई पर बल देता है और अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के लिए अतिरिक्त सुरक्षा प्रदान करता है।
- विवादों को भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन (LARR) प्राधिकरण के पास ले जाया जा सकता है।
चुनौतियाँ और चिंताएँ
- अधिनियम के कार्यान्वयन में कई चुनौतियाँ हैं जो इसके पूर्ण क्रियान्वयन को कठिन बनाती हैं।
- कुछ चुनौतियाँ हैं:
- प्रक्रियात्मक आवश्यकताएँ प्रायः विकास परियोजनाओं के लिए भूमि अधिग्रहण में देरी करती हैं।
- कई मंजूरियाँ (वन, वन्यजीव, पर्यावरण) देरी को बढ़ाती हैं।
- लगभग 35% बुनियादी ढाँचा परियोजना समस्याएँ भूमि अधिग्रहण बाधाओं से उत्पन्न होती हैं।
- मुआवजा लागत सार्वजनिक और निजी परियोजना बजट पर दबाव डाल सकती है।
- विकास की आवश्यकताओं और सामाजिक न्याय के बीच संतुलन एक विवादास्पद मुद्दा बना रहता है।
- विस्थापन, अपर्याप्त पुनर्वास और आजीविका की हानि को लेकर चिंताएँ हैं।
- देरी परियोजना लागत बढ़ाती है, जिससे राष्ट्रीय बुनियादी ढाँचा लक्ष्यों पर प्रभाव पड़ता है।
- प्रक्रियात्मक आवश्यकताएँ प्रायः विकास परियोजनाओं के लिए भूमि अधिग्रहण में देरी करती हैं।
निष्कर्ष और आगे की राह
- भारत का 2013 भूमि अधिग्रहण अधिनियम न्याय और पारदर्शिता को बढ़ावा देता है, लेकिन कार्यान्वयन में देरी एवं विवाद बुनियादी ढाँचे के विकास में बाधा डालते हैं।
- इसलिए डिजिटल भूमि अभिलेखों में सुधार, स्वीकृतियों में तीव्रता, और उचित पुनर्वास सुनिश्चित करना आवश्यक है।
- हालाँकि सरकार कानून बदलने की योजना नहीं बना रही है, लेकिन अधिक कुशल क्रियान्वयन की तत्काल आवश्यकता है।
Source :TH