पाठ्यक्रम: GS1/ शहरीकरण से संबंधित चुनौतियाँ, GS2/ शासन
संदर्भ
- भारतीय शहरों में हाल ही में पीने योग्य जल में सीवेज के मिल जाने की घटनाएँ शहरी अपशिष्ट जल प्रबंधन (UWM) में गंभीर खामियों को उजागर करती हैं, जो बड़े पैमाने पर सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट का कारण बन सकती हैं।
परिचय
- उत्पादन बनाम उपचार अंतर: भारत लगभग 72,368 MLD (मिलियन लीटर प्रति दिन) शहरी अपशिष्ट जल उत्पन्न करता है, लेकिन उपचार क्षमता केवल लगभग 28-44% है।
- स्वास्थ्य प्रभाव: अनुपचारित सीवेज जलजनित रोगों (दस्त, हैजा, टायफाइड) का मुख्य कारण है, जो भारत में लगभग 80% बीमारियों और बाल मृत्यु दर के बड़े हिस्से के लिए जिम्मेदार है।
- बुनियादी ढाँचे की कमी: लगभग 55% शहरी घर सीवर नेटवर्क से जुड़े नहीं हैं और सेप्टिक टैंकों पर निर्भर हैं, जो प्रायः रिसाव करते हैं या ठीक से प्रबंधित नहीं होते (सेप्टेज प्रबंधन)।
शहरी अपशिष्ट जल प्रबंधन की चुनौतियाँ
- संस्थागत चुनौतियाँ:
- कई विभागों के बीच खंडित शासन और समन्वय की कमी।
- शहरी स्थानीय निकायों (ULBs) में तकनीकी, वित्तीय और मानव संसाधन क्षमता की कमी।
- बुनियादी ढाँचे की चुनौतियाँ:
- सीवरेज और पेयजल नेटवर्क के बीच अपर्याप्त भौतिक अलगाव, जिससे क्रॉस-कंटैमिनेशन का खतरा बढ़ता है।
- पुरानी और जंग लगी जल आपूर्ति पाइपलाइनों से सीवेज का रिसाव पीने योग्य जल की लाइनों में होता है।
- आर्थिक चुनौतियाँ:
- उच्च गैर-राजस्व जल (NRW) हानि।
- अवास्तविक उपयोगकर्ता शुल्क और खराब संग्रह दक्षता।
- कम लागत वसूली निजी निवेश को हतोत्साहित करती है।
- प्रौद्योगिकी चुनौतियाँ:
- किफायती और ऊर्जा-कुशल तकनीकों का सीमित अपनाना।
- सीवर कनेक्टिविटी का खराब मानचित्रण और निगरानी।
प्रभाव
- स्वास्थ्य प्रभाव:
- दूषित पेयजल से दस्त, हैजा, टायफाइड, पेचिश और हेपेटाइटिस A एवं E जैसे जलजनित रोग फैलते हैं।
- पाँच वर्ष से कम आयु के बच्चों में मृत्यु दर और दीर्घकालिक कुपोषण का खतरा अधिक होता है।
- आर्थिक प्रभाव:
- घरेलू और सार्वजनिक स्वास्थ्य देखभाल व्यय में वृद्धि से आर्थिक उत्पादकता घटती है।
- कार्य दिवसों की हानि से आजीविका प्रभावित होती है, विशेषकर असंगठित श्रमिकों में।
- पर्यावरणीय प्रभाव:
- अनुपचारित सीवेज जल निकायों में प्रवेश कर शहरी पारिस्थितिकी तंत्र को हानि पहुँचाता है।
- प्रदूषण सतत जल पुन: उपयोग और रीसाइक्लिंग के प्रयासों को कमजोर करता है।

आगे की राह
- विकेन्द्रीकृत अपशिष्ट जल उपचार प्रणाली (DEWATS): छोटे पैमाने पर, स्थानीय उपचार इकाइयों (जैसे आवासीय सोसाइटी या पार्कों में) को लागू करना ताकि मुख्य सीवर लाइनों पर बोझ कम हो।
- द्वि-नलसाजी प्रणाली: नए शहरी विकासों में अनिवार्य रूप से पेयजल और पुनर्नवीनीकृत जल (फ्लशिंग/बागवानी के लिए) को अलग करना।
- रीयल-टाइम मॉनिटरिंग: IoT सेंसर और AI का उपयोग (जैसा कि 2025-26 CPCB दिशानिर्देशों में बताया गया है) ताकि जल-सीवेज नेटवर्क में रिसाव एवं प्रदूषण का तुरंत पता लगाया जा सके।
- प्रदूषक भुगतान सिद्धांत: “सीवरेज शुल्क” के माध्यम से ULBs की वित्तीय स्थिति को सुदृढ़ करना और उपचारित अपशिष्ट जल के लिए बाजार बनाना (जैसे औद्योगिक कूलिंग या निर्माण में बेचने के लिए)।
Source: IT
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संक्षिप्त समाचार 02-01-2026