पाठ्यक्रम: GS3/पर्यावरण
संदर्भ
- हाल ही में तीसरा संयुक्त राष्ट्र महासागर सम्मेलन (UNOC) फ्रांस के नीस में आयोजित हुआ, जिसमें पृथ्वी के समुद्री पारिस्थितिक तंत्रों की रक्षा हेतु महत्वपूर्ण प्रतिबद्धताएँ व्यक्त की गईं।
| पृष्ठभूमि: संयुक्त राष्ट्र महासागर सम्मेलन (UNOC) – पहला UNOC (2017): न्यूयॉर्क में आयोजित, स्वीडन और फिजी द्वारा सह-आयोजित; लक्ष्य—एसडीजी 14: जल के नीचे जीवन को समर्थन देना। – दूसरा UNOC (2022): लिस्बन में आयोजित, पुर्तगाल और केन्या द्वारा सह-आयोजित; विज्ञान आधारित समाधान और नवाचारी साझेदारियों की आवश्यकता पर बल। – तीसरा UNOC (2025): नीस, फ्रांस में आयोजित, कोस्टा रिका द्वारा सह-आयोजित। – थीम: कार्रवाई में तेजी और सभी पक्षों की भागीदारी से महासागर के संरक्षण और सतत उपयोग को बढ़ावा देना। |
सम्मेलन (2025) के प्रमुख निष्कर्ष
- उच्च समुद्री संधि (High Seas Treaty) लागू होने के करीब: 60 आवश्यक देशों में से 56 ने बायोडायवर्सिटी बियॉन्ड नेशनल जुरिडिक्शन (BBNJ) समझौते की पुष्टि कर दी है।
- यह अंतरराष्ट्रीय जल क्षेत्र में समुद्री संरक्षित क्षेत्रों (MPAs) की स्थापना, समुद्री आनुवंशिक संसाधनों के विनियमन, और पर्यावरणीय प्रभाव आकलन को अनिवार्य बनाता है।
- स्वैच्छिक प्रतिबद्धताएँ और वित्तीय योगदान: यूरोपीय आयोग ने 1 बिलियन यूरो महासागर संरक्षण और सतत मछली पकड़ने के लिए देने की घोषणा की। फ्रेंच पोलिनेशिया ने अपनी पूरी विशेष आर्थिक क्षेत्र को शामिल करते हुए विश्व का सबसे बड़ा समुद्री संरक्षित क्षेत्र बनाने की योजना घोषित की।
- वैश्विक राजनीतिक घोषणा: 170 से अधिक देशों ने नाइस ओशन एक्शन प्लान को अपनाया, जो एक राजनीतिक घोषणा है और 800 से अधिक स्वैच्छिक प्रतिबद्धताओं के साथ है।
- इसमें युवाओं की भागीदारी, गहरे समुद्री पारिस्थितिक तंत्र की साक्षरता और समुद्री विज्ञान में क्षमताओं के निर्माण जैसे विषय शामिल हैं।
- गहरे समुद्र खनन का विरोध: कई देशों के गठबंधन ने सावधानीपूर्वक विराम की मांग की, क्योंकि यह नाजुक समुद्री पारिस्थितिक तंत्र को अपूरणीय क्षति पहुँचा सकता है।
- भारत की भूमिका और रोडमैप: भारत ने उच्च सागर संधि की पुष्टि करने की प्रतिबद्धता जताई और 10-बिंदुओं वाली समुद्री शासन की योजना प्रस्तुत की:
- समुद्री संरक्षित क्षेत्रों का विस्तार
- ब्लू इकॉनमी को बढ़ावा
- समुद्री प्रदूषण में कमी
- अपतटीय नवीकरणीय ऊर्जा का प्रोत्साहन
- वैश्विक प्लास्टिक संधि का समर्थन
- समुद्री विज्ञान और तकनीक में निवेश
- तटीय लचीलापन को सुदृढ़ करना
- समुद्री संसाधनों तक समान पहुंच सुनिश्चित करना
- गहरे समुद्र खनन पर विराम
- वैश्विक साझेदारियाँ मजबूत करना
उच्च समुद्र के बारे में
- उच्च समुद्र वे क्षेत्र हैं जो किसी एक देश के अधिकार क्षेत्र से बाहर होते हैं — तटीय रेखा से 200 समुद्री मील (लगभग 370 किमी) दूर स्थित क्षेत्र (UNCLOS के अनुसार)।
- ये वैश्विक साझा संसाधनों का भाग माने जाते हैं।
- यह पृथ्वी की सतह का लगभग दो-तिहाई भाग घेरते हैं और जलवायु नियंत्रण, समुद्री जैवविविधता और वैश्विक मत्स्य संसाधन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
महासागर का महत्व
- जलवायु नियंत्रण: महासागर वैश्विक कार्बन उत्सर्जन का 25% से अधिक अवशोषित करते हैं और 50% ऑक्सीजन उत्पन्न करते हैं।
- यह पृथ्वी का सबसे बड़ा कार्बन सिंक और ताप अवशोषक है।
- खाद्य सुरक्षा: महासागर वैश्विक स्तर पर खपत होने वाले 15% पशु प्रोटीन का स्रोत हैं।
- कुछ विकासशील देशों में, समुद्री खाद्य ही मुख्य प्रोटीन स्रोत है।
- आजिविका और अर्थव्यवस्था: 3 अरब से अधिक लोग समुद्री और तटीय संसाधनों पर निर्भर हैं।
- महासागर आधारित अर्थव्यवस्था 3–5 ट्रिलियन डॉलर मूल्य की है — मछली पालन, पर्यटन और शिपिंग जैसे उद्योगों को समर्थन देती है।
- जैवविविधता का भंडार: महासागर में प्रवाल भित्तियों से लेकर गहरे समुद्री पारिस्थितिक तंत्र तक असीम जीव-जंतुओं की विविधता है, जो पारिस्थितिक संतुलन और भविष्य के वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए आवश्यक है।
प्रमुख चिंताएँ
- समुद्र प्रदूषण: अब तक 75 से 199 मिलियन टन प्लास्टिक समुद्र में हैं। प्रत्येक वर्ष 8–12 मिलियन टन प्लास्टिक और जुड़ जाते हैं।
- एशिया (81%) सबसे बड़ा योगदानकर्ता है, मुख्यतः अपशिष्ट प्रबंधन की कमी के कारण।
- 60% मछलियों में 92% माइक्रोप्लास्टिक पाए गए हैं।
- पांच बड़े महासागरीय अपशिष्ट पैच, जिनमें ग्रेट पैसिफिक गारबेज पैच में 1.8 ट्रिलियन प्लास्टिक के टुकड़े हैं।
- 14 मिलियन टन समुद्री कचरा समुद्र की तलहटी में जमा है।
- यदि वर्तमान प्रवृति जारी रहे, तो 2050 तक महासागरों में प्लास्टिक मछलियों से अधिक हो जाएगा।
- वर्तमान में महासागर का औसत pH 8.1 है, जो औद्योगीकरण से पूर्व की तुलना में 30% अधिक अम्लीय है।
- अन्य चिंताएँ:
- अतिमछली पकड़ना – समुद्री जीवों और खाद्य श्रृंखला के लिए खतरा
- जलवायु परिवर्तन – अम्लीकरण, समुद्र-स्तर में वृद्धि और प्रवाल विरंजन
- गहरे समुद्र खनन – नाजुक पारिस्थितिक तंत्र को स्थायी क्षति का खतरा
महासागर संरक्षण के प्रयास
- प्रारंभिक पहल (1970 से पूर्व): अंतर्राष्ट्रीय व्हेलिंग आयोग (1946) — वैश्विक समुद्री संरक्षण का पहला प्रयास।
- संस्थागत युग (1970–1990): अमेरिका का समुद्री संरक्षण, अनुसंधान और अभयारण्य अधिनियम(1972) और समुद्री कानून सम्मेलन (1982) ने अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून की नींव रखी।
- वैज्ञानिक और वैश्विक विस्तार (2000–2010):
- समुद्री संरक्षित क्षेत्र (MPAs) स्थापित किए गए, लेकिन 2020 तक केवल 2.7% महासागर ही उच्च संरक्षित थे।
- मेगामूव जैसे उपग्रह-आधारित अभियान से समुद्री जीवन की महत्वपूर्ण स्थलों की पहचान हुई।
- आधुनिक युग (2020–वर्तमान):
- उच्च सागर संधि (2023) लागू हुआ — अंतरराष्ट्रीय जल में MPAs बनाने की अनुमति देता है।
- 30×30 लक्ष्य: COP15 (2022) में देशों ने 2030 तक 30% महासागर संरक्षित करने की प्रतिबद्धता व्यक्त की।
- आदिवासी ज्ञान का समावेश: प्रशांत द्वीपों की परंपराएँ अब संरक्षण की मुख्य धारा में शामिल की जा रही हैं।
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