अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपया 84 के सर्वकालिक निम्नतम स्तर पर पहुंचा

पाठ्यक्रम: GS3/अर्थव्यवस्था

सन्दर्भ

  • भारतीय रुपया हाल ही में अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 84 के स्तर को पार कर गया, जो अब तक का सबसे निचला स्तर है।

परिचय

  • मुद्रा अवमूल्यन से तात्पर्य किसी एक देश की मुद्रा के मूल्य में दूसरे देश की मुद्रा के सापेक्ष गिरावट से है। 
  • भारतीय रुपए में प्रमुख मुद्राओं, विशेष रूप से अमेरिकी डॉलर के मुकाबले समय-समय पर अवमूल्यन देखा गया है।

रुपए के अवमूल्यन के कारण

  • कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें: वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों में उछाल के कारण भारत के आयात बिल में वृद्धि हुई है, जिससे रुपये पर दबाव बढ़ रहा है।
  • चीन में निकासी: विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) ने भारत से अपना निवेश चीन में स्थानांतरित कर दिया है, जो चीन द्वारा अपनी अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से हाल ही में किए गए मौद्रिक और राजकोषीय उपायों से प्रेरित है।
    • यह प्रवृत्ति ‘भारत बेचो, चीन खरीदो’ की रणनीति को दर्शाती है, जिससे भारतीय रुपये की मांग में कमी आई है।
  • अमेरिकी डॉलर की मांग में वृद्धि: विदेशी बैंकों की ओर से अमेरिकी डॉलर की मांग में वृद्धि हुई है, जिससे रुपये का अवमूल्यन और बढ़ गया है।
  • कमजोर घरेलू बाजार: घरेलू इक्विटी और बॉन्ड बाजारों में समग्र कमजोरी ने रुपये की गिरावट में योगदान दिया है, जिससे यह विदेशी निवेशकों के लिए कम आकर्षक हो गया है।

रुपए के अवमूल्यन का प्रभाव

  • निर्यात और आयात: जबकि कमजोर रुपया विदेशी खरीदारों के लिए भारतीय वस्तुओं को सस्ता बनाकर निर्यात को बढ़ावा दे सकता है, यह आयात की लागत भी बढ़ाता है, विशेष रूप से तेल और मशीनरी जैसी आवश्यक वस्तुओं की।
  • विदेशी ऋण सेवा: महत्वपूर्ण विदेशी मुद्रा ऋण वाली कंपनियों और सरकार के लिए, रुपये में गिरावट ऋण सेवा की लागत को बढ़ाती है, जिससे उनकी वित्तीय स्थिति पर दबाव पड़ता है।
  • मुद्रास्फीति: आयात लागत में वृद्धि से उपभोक्ता कीमतें बढ़ जाती हैं, जिससे क्रय शक्ति प्रभावित होती है और संभावित रूप से अर्थव्यवस्था में समग्र मुद्रास्फीति बढ़ जाती है।
  • निवेशक भावना: गिरती मुद्रा निवेशकों के विश्वास को प्रभावित करती है, जिसके परिणामस्वरूप प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) कम हो जाता है और पूंजी का बहिर्वाह बढ़ जाता है।

 RBI रुपये का मूल्य कैसे बनाए रखता है?

  • विदेशी मुद्रा बाज़ार में हस्तक्षेप: रुपये के मूल्य को स्थिर करने के लिए RBI डॉलर खरीदकर या बेचकर विदेशी मुद्रा बाज़ार में हस्तक्षेप करता है। इससे अत्यधिक अस्थिरता को कम करने में सहायता मिलती है।
  • मौद्रिक नीति समायोजन: ब्याज दरों को समायोजित करके, RBI पूंजी प्रवाह को प्रभावित करता है। उच्च ब्याज दरें विदेशी निवेश को आकर्षित कर सकती हैं, जिससे रुपये के मूल्य को समर्थन मिलता है।
  • विदेशी मुद्रा भंडार प्रबंधन: RBI विदेशी मुद्रा भंडार का एक बफर रखता है जिसका उपयोग मुद्रा अस्थिरता के समय किया जा सकता है।

आगे की राह

  • दीर्घकालिक निवेश: स्थिर रुपये के लिए स्थिर पूंजी प्रवाह की आवश्यकता होती है। भारत को अस्थिर विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (FPI) के बजाय दीर्घकालिक प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) को आकर्षित करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
  • प्रेषण को अधिकतम करना: भारत वैश्विक स्तर पर प्रेषण के सबसे बड़े प्राप्तकर्ताओं में से एक है। ऐसी नीतियाँ जो अनिवासी भारतीयों (NRIs) के लिए घर पर पैसा भेजना आसान बनाती हैं, विदेशी मुद्रा प्रवाह को बढ़ा सकती हैं, जिससे रुपया स्थिर हो सकता है।
  • निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता: प्रौद्योगिकी, फार्मास्यूटिकल्स, कपड़ा और विनिर्माण जैसे क्षेत्रों में निवेश करके भारतीय निर्यात की प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिए।

Source: IE

 

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