गैर-अधिसूचित जनजातियों की संवैधानिक मान्यता और पृथक जनगणना गणना की मांग

पाठ्यक्रम: GS2/ शासन/सामाजिक न्याय

संदर्भ

  • भारत भर में गैर-अधिसूचित जनजातियाँ (DNTs), घुमंतू जनजातियाँ (NTs), और अर्ध-घुमंतू जनजातियाँ (SNTs) 2027 की जाति जनगणना में एक पृथक स्तंभ तथा एक विशिष्ट अनुसूची के माध्यम से संवैधानिक मान्यता की मांग कर रही हैं। उनका कहना है कि लंबे समय से राजनीतिक वर्गीकरण में त्रुटियाँ और कल्याणकारी लाभों से बहिष्करण उन्हें प्रभावित कर रहा है।

घुमंतू, अर्ध-घुमंतू और गैर-अधिसूचित जनजातियाँ (NTs, SNTs, और DNTs)  

  • घुमंतू और अर्ध-घुमंतू समुदाय वे हैं जो एक स्थान पर स्थायी रूप से न रहकर निरंतर एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाते रहते हैं।
  • ‘गैर-अधिसूचित जनजातियाँ’ उन सभी समुदायों को संदर्भित करती हैं जिन्हें ब्रिटिश शासन द्वारा 1871 से 1947 के बीच लागू किए गए क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट के अंतर्गत अधिसूचित किया गया था।
    • इन अधिनियमों को सरकार ने 1952 में निरस्त कर दिया और इन समुदायों को “गैर-अधिसूचित” घोषित किया गया। इनमें से कुछ समुदाय घुमंतू भी थे।
  • अधिकांश DNTs अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) श्रेणियों में फैले हुए हैं, किंतु कुछ DNTs इनमें से किसी भी श्रेणी में सम्मिलित नहीं हैं।

भारत में स्थिति  

  • अनुमान है कि दक्षिण एशिया में विश्व की सबसे बड़ी घुमंतू जनसंख्या है।
  • भारत में लगभग 10 प्रतिशत जनसंख्या गैर-अधिसूचित और घुमंतू है।
    • जहाँ गैर-अधिसूचित जनजातियों की संख्या लगभग 150 है, वहीं घुमंतू जनजातियों की जनसंख्या लगभग 500 विभिन्न समुदायों से मिलकर बनी है।
  • गैर-अधिसूचित जनजातियाँ देश के विभिन्न राज्यों में लगभग स्थायी रूप से बस चुकी हैं, जबकि घुमंतू समुदाय अपने पारंपरिक व्यवसायों की खोज में अब भी मुख्यतः घुमंतू जीवन जीते हैं।

NTs, SNTs और DNTs द्वारा सामना की जाने वाली चुनौतियाँ

  • मान्यता और दस्तावेज़ों का अभाव: गैर-अधिसूचित समुदायों के पास नागरिकता संबंधी दस्तावेज़ों का अभाव है, जिससे उनकी पहचान अदृश्य हो जाती है और उन्हें सरकारी लाभ, संवैधानिक अधिकार तथा नागरिकता अधिकार प्राप्त करने में कठिनाई होती है।
  • सीमित राजनीतिक प्रतिनिधित्व: इन समुदायों के लिए पर्याप्त प्रतिनिधित्व का अभाव है, जिससे उनकी चिंताओं को व्यक्त करना और अपने अधिकारों की वकालत करना कठिन हो जाता है।
  • सामाजिक कलंक और भेदभाव: NTs, SNTs और DNTs को प्रायः उनके ऐतिहासिक गैर-अधिसूचित दर्जे और विशिष्ट जीवनशैली के कारण भेदभाव और सामाजिक कलंक का सामना करना पड़ता है।
  • आर्थिक हाशियाकरण: संसाधनों, बाज़ारों और रोजगार अवसरों तक पहुँच के अभाव से इन समुदायों का आर्थिक हाशियाकरण होता है।
  • शैक्षिक वंचना: इन जनजातियों के लिए शैक्षिक अवसर सीमित हैं, जिससे उच्च निरक्षरता दर बनी रहती है।

सरकार द्वारा उठाए गए कदम  

  • इदाते आयोग की सिफारिशों के आधार पर भारत सरकार ने 2019 में गैर-अधिसूचित, अर्ध-घुमंतू और घुमंतू जनजातियों (DWBDNCs) के लिए विकास एवं कल्याण बोर्ड का गठन किया।
  • गैर-अधिसूचित जनजातियों के आर्थिक सशक्तिकरण हेतु योजना (SEED): यह योजना 2022 में गैर-अधिसूचित, घुमंतू और अर्ध-घुमंतू समुदायों के कल्याण हेतु प्रारंभ की गई। इसके घटक हैं:
    • DNT अभ्यर्थियों को प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं में सम्मिलित होने हेतु उच्च गुणवत्ता वाली कोचिंग प्रदान करना;
    • उन्हें स्वास्थ्य बीमा उपलब्ध कराना;
    • सामुदायिक स्तर पर आजीविका पहल को प्रोत्साहित करना; तथा
    • इन समुदायों के सदस्यों को आवास निर्माण हेतु वित्तीय सहायता प्रदान करना।
इदाते आयोग
– 2014 में गैर-अधिसूचित, घुमंतू और अर्ध-घुमंतू जनजातियों के लिए एक राष्ट्रीय आयोग का गठन किया गया, जिसके अध्यक्ष भिकु रामजी इदाते थे। इसका कार्यकाल तीन वर्ष का था।
– आयोग ने निम्नलिखित सिफारिशें दीं:
– NTs, SNTs और DNTs द्वारा सामना की जाने वाली चुनौतियों की पहचान करना, जो क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट, 1871 और बाद में हैबिचुअल ऑफेंडर्स एक्ट, 1952 द्वारा लगाए गए कलंक के कारण उत्पन्न हुईं, तथा बाद वाले अधिनियम के भेदभावपूर्ण प्रावधानों में संशोधन का मार्ग निकालना।
– DNTs/NTs/SNTs को SC/ST/OBC में सम्मिलित न करना और इनके लिए विशिष्ट नीतियों का निर्माण करना।
– भारत में घुमंतू, अर्ध-घुमंतू और गैर-अधिसूचित जनजातियों के लिए एक स्थायी आयोग की स्थापना करना।
– शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य सेवा और कानूनी दस्तावेज़ जैसी बुनियादी सुविधाओं तक पहुँच में इन समुदायों द्वारा सामना की जाने वाली बाधाओं को दूर करने हेतु उपाय करना।

Source: TH

 

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