पाठ्यक्रम: GS2/शासन
संदर्भ
- हाल ही में मंत्रिमंडल की राजनीतिक मामलों की समिति (CCPA), जिसकी अध्यक्षता भारत के प्रधानमंत्री कर रहे हैं, ने आगामी जनगणना में जाति गणना को शामिल करने का निर्णय लिया है। यह भारत की जनसांख्यिकीय डेटा संग्रह की पद्धति में एक महत्त्वपूर्ण बदलाव है।
जाति आधारित गणना
- ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य:
- भारत में आखिरी जाति आधारित गणना 1931 में ब्रिटिश शासन के अंतर्गत की गई थी, जिसमें 4,147 विभिन्न जातियों को दर्ज किया गया था।
- 1941 में जातीय डेटा एकत्रित किया गया था, लेकिन द्वितीय विश्व युद्ध के कारण इसे प्रकाशित नहीं किया गया।
- स्वतंत्रता के पश्चात्, केवल अनुसूचित जाति (SCs) और अनुसूचित जनजाति (STs) को दशक में एक बार होने वाली जनगणना में गिना गया।
- 1961 में केंद्र सरकार ने राज्यों को अन्य पिछड़ा वर्ग (OBCs) की पहचान के लिए अपने स्वयं के सर्वेक्षण करने की अनुमति दी।
- 2011 में सामाजिक-आर्थिक जाति गणना (SECC) आयोजित की गई थी, जिसका उद्देश्य विभिन्न समुदायों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति का डेटा प्राप्त करना था।
निर्णय का संवैधानिक आधार
- केंद्र का विषय: भारत के संविधान के अनुच्छेद 246 के अनुसार, जनगणना केंद्र सरकार के संघ सूची में आती है।
- इससे जाति गणना एक एकरूप और पारदर्शी ढाँचा के तहत संचालित की जा सकेगी।
- जनगणना अधिनियम, 1948 भारत में जनसंख्या गणना संचालित करने की कानूनी रूपरेखा प्रदान करता है। यह प्रक्रियाएँ, कर्त्तव्य, और दंड को परिभाषित करता है।
जाति गणना का महत्त्व
- डिजिटल जनगणना:
- अगली जनगणना डिजिटल मोड में आयोजित की जाएगी, जहाँ प्रश्नावली को मोबाइल ऐप के माध्यम से भरा जा सकेगा।
- जाति गणना के लिए एक नया कॉलम जोड़ा जाएगा, जिसमें ड्रॉप-डाउन कोड निर्देशिका से जाति का चयन किया जा सकेगा।
- डाटा आधारित नीति निर्माण:
- विस्तृत जातीय डेटा साक्ष्य-आधारित शासन को सक्षम करेगा, जिससे शिक्षा, रोजगार और कल्याण कार्यक्रमों में उचित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित होगा।
- यह आरक्षण नीतियों को बेहतर बनाने में सहायता करेगा।
- महिलाओं के लिए 33% आरक्षण को संसद और राज्य विधानसभाओं में लागू करने में सहायक होगा।
- सामाजिक-आर्थिक असमानताओं को संबोधित करना:
- डेटा जातीय समूहों के बीच आर्थिक असमानताओं की पहचान करेगा, जिससे लक्षित विकास कार्यक्रमों को लागू किया जा सकेगा।
- न्यायिक माँग:
- इंद्रा साहनी मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि किसी जाति या समूह की पिछड़ेपन की पहचान उचित मूल्यांकन और वस्तुनिष्ठ विश्लेषण के आधार पर ही की जानी चाहिए।
जाति गणना से जुड़ी चिंताएँ
- राजनीतिक दुरुपयोग की संभावना:
- आलोचकों का मानना है कि जाति गणना को चुनावी रणनीतियों को प्रभावित करने के लिए राजनीतिक हथियार के रूप में प्रयोग किया जा सकता है।
- राज्य स्तरीय जाति सर्वेक्षणों की पारदर्शिता पर भी प्रश्न उठाए गए हैं, कुछ मामलों में इन्हें राजनीतिक हितों के लिए संचालित माना गया है।
- सामाजिक विभाजन का खतरा:
- जाति गणना से जातिगत पहचान को मजबूत करने का डर है, जिससे विभाजन बढ़ सकता है।
- जाति-आधारित आरक्षण पर बहस तेज हो सकती है, जिससे सामाजिक तनाव उत्पन्न हो सकता है।
- कार्यान्वयन में चुनौतियाँ:
- सटीक डेटा संग्रह सुनिश्चित करना एक चुनौती होगी, क्योंकि गलत रिपोर्टिंग या बदलाव की संभावना बनी रहती है।
- जातियों के वर्गीकरण की पद्धति को पारदर्शी और वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित किया जाना चाहिए।
निष्कर्ष
- आगामी जनगणना में जाति गणना को शामिल करना एक ऐतिहासिक निर्णय है, जो भारत के सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य को नया आकार देने की क्षमता रखता है।
- इससे सरकार को विस्तृत जातीय जनसांख्यिकी डेटा प्राप्त होगा, जिससे असमानताओं को दूर करने और समावेशी विकास को बढ़ावा देने का प्रयास किया जाएगा।
- जैसे-जैसे जनगणना आगे बढ़ेगी, इसकी नीति निर्माण और सामाजिक प्रभाव पर पैनी नजर रखी जाएगी।
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