भू-आकृति विज्ञान और भारत का वैज्ञानिक आत्मनिर्भरता हेतु प्रयास

पाठ्यक्रम: GS3/विज्ञान और प्रौद्योगिकी

संदर्भ

  • प्रथम राष्ट्रीय भू-आकृति विज्ञान सम्मेलन (GeodCon-26) में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी तथा पृथ्वी विज्ञान के स्वतंत्र प्रभार राज्यमंत्री ने राष्ट्रीय भू-स्थानिक नीति 2022 की महत्त्वपूर्ण भूमिका पर प्रकाश डाला।
    • भू-आकृति विज्ञान पृथ्वी के आकार, गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र और स्थानिक अभिविन्यास को मापने एवं समझने का विज्ञान है।

परिचय

  • भारत की राष्ट्रीय भू-स्थानिक नीति 2022 का उद्देश्य नवाचार, डेटा उपलब्धता और अवसंरचना को बढ़ावा देकर देश को भू-स्थानिक प्रौद्योगिकी में वैश्विक अग्रणी बनाना है।
  • भू-स्थानिक प्रौद्योगिकी में रिमोट सेंसिंग, जीआईएस, LiDAR, GPS और इंटरनेट मैपिंग (जैसे Google Earth) जैसे उपकरण शामिल हैं, जिनका उपयोग पृथ्वी की सतह से संबंधित डेटा को एकत्रित करने, विश्लेषण करने और दृश्य रूप देने के लिए किया जाता है।
  • “भू-स्थानिक” शब्द उन आँकड़ों से संबंधित है जो भौगोलिक स्थानों से जुड़े होते हैं, जैसे भू-भाग, अवसंरचना, जनसंख्या, जल निकाय या पर्यावरणीय विशेषताएँ।

भू-स्थानिक प्रौद्योगिकी का सामरिक महत्व

  • शासन: शहरी नियोजन, भूमि अभिलेखन (स्वामित्व योजना – SVAMITVA) और स्मार्ट सिटी अवसंरचना हेतु उच्च-सटीकता डेटा उपलब्ध कराता है।
  • राष्ट्रीय सुरक्षा: NavIC (भारत का GPS), मिसाइल मार्गदर्शन, सीमा निगरानी और स्वतंत्र भू-आकृति संदर्भ फ्रेम बनाए रखने में महत्त्वपूर्ण।
  • आर्थिक विकास: लॉजिस्टिक्स, सटीक कृषि (Agri-tech) और स्वायत्त डिलीवरी स्टार्टअप्स के लिए “सक्षम परत” प्रदान करता है।
  • आपदा लचीलापन: भूकंप, समुद्र-स्तर वृद्धि और चक्रवात की दिशा का पूर्वानुमान लगाने हेतु भूपर्पटी विकृति की निगरानी में आवश्यक।
  • वैज्ञानिक अनुसंधान: विवर्तनिक प्लेट निगरानी, जलवायु अध्ययन और महासागर तल मानचित्रण में सहायक।

भू-स्थानिक प्रौद्योगिकी को समर्थन देने वाली सरकारी पहलें

  • राष्ट्रीय भू-स्थानिक नीति (NGP) 2022: डेटा उपलब्धता का लोकतंत्रीकरण, प्रतिबंधात्मक लाइसेंसिंग हटाना और निजी क्षेत्र की भागीदारी को प्रोत्साहित करने वाला ऐतिहासिक सुधार।
  • राष्ट्रीय भू-स्थानिक मिशन (NGM): 2025–26 में प्रारंभ, शासन और आर्थिक विकास हेतु आधारभूत भू-स्थानिक अवसंरचना एवं डेटासेट विकसित करने का लक्ष्य।
  • ऑपरेशन द्रोणगिरि: भू-स्थानिक प्रौद्योगिकी के वास्तविक अनुप्रयोगों का पायलट प्रदर्शन, जिसमें अवसंरचना नियोजन और आपदा प्रबंधन शामिल।
  • निरंतर संचालित संदर्भ स्टेशन (CORS) नेटवर्क: सर्वे ऑफ इंडिया द्वारा विकसित, GNSS तकनीक का उपयोग कर उच्च-सटीकता स्थिति सेवाएँ प्रदान करता है।
  • भास्कराचार्य राष्ट्रीय अंतरिक्ष अनुप्रयोग एवं भू-सूचना संस्थान (BISAG-N): शासन और विकास हेतु मानचित्र-आधारित GIS समाधान और उपग्रह अनुप्रयोग उपलब्ध कराता है।

चुनौतियाँ एवं आगे की राह

  • सम्मेलन ने भविष्य के लिए कुछ प्रमुख क्षेत्रों की पहचान की:
    • क्षमता निर्माण: विशिष्ट भू-आकृति तकनीकों में विशेषज्ञता प्राप्त करने हेतु कुशल जनशक्ति और “युवा विद्वानों” की तत्काल आवश्यकता।
    • सार्वभौमिक डेटा: स्वतंत्र गुरुत्वाकर्षण मॉडल और संदर्भ फ्रेम बनाए रखना आवश्यक है ताकि भारत रक्षा या अवसंरचना परियोजनाओं के लिए विदेशी निर्देशांकों पर निर्भर न रहे।
    • GeoAI का एकीकरण: कृत्रिम बुद्धिमत्ता का उपयोग कर विशाल भू-आकृति डेटासेट को वास्तविक समय अनुप्रयोगों हेतु संसाधित करना।

स्रोत: PIB

 

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