केन-बेतवा लिंक परियोजना के विरुद्ध विरोध प्रदर्शन

पाठ्यक्रम: GS1/भूगोल; GS3/पर्यावरण

संदर्भ

  • केन–बेतवा नदी जोड़ो परियोजना (KBLP) के विरुद्ध विरोध प्रदर्शन, जो नदी जोड़ो परियोजना के क्रियान्वयन को लेकर उत्पन्न तनावों को उजागर करता है।

भारत में नदी जोड़ परियोजना

  • ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य: नदियों को जोड़ने की अवधारणा 19वीं शताब्दी से है, जब सर आर्थर कॉटन ने गोदावरी और कृष्णा नदी घाटियों में सिंचाई बाँधों की रूपरेखा तैयार की थी।
    • समय के साथ यह विचार विकसित हुआ, जिसमें एम. विश्वेश्वरैया, के.एल. राव और कैप्टन दिनशॉ जे. दस्तूर जैसे अभियंताओं का उल्लेखनीय योगदान रहा।
  • इसे 1980 के राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य योजना (National Perspective Plan) के अंतर्गत “नदी जोड़ो कार्यक्रम” (ILR Programme) के रूप में परिकल्पित किया गया, जिसका उद्देश्य अधिशेष बेसिन से घाटे वाले बेसिनों में जल का स्थानांतरण करना है ताकि क्षेत्रीय जल असंतुलन दूर हो, सिंचाई बढ़े, बाढ़ और सूखे का निवारण हो, तथा अंतर्देशीय नौवहन एवं जलविद्युत को समर्थन मिले।
    • राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य योजना (1980) ने दो घटकों का प्रस्ताव रखा: हिमालयी घटक (14 लिंक) और प्रायद्वीपीय घटक (16 लिंक)।
  • हाल की प्रगति में केन–बेतवा लिंक परियोजना (पहली ILR परियोजना जो क्रियान्वयन में है) शामिल है, जबकि परबती–कालीसिंध–चंबल जैसी अन्य परियोजनाएँ मूल्यांकनाधीन हैं।
  • 2002 में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने संघीय सरकार को नदी जोड़ परियोजना 12–15 वर्षों में पूर्ण करने का आदेश दिया।
    • इस आदेश के प्रत्युत्तर में भारत सरकार ने एक कार्यबल नियुक्त किया तथा वैज्ञानिकों, अभियंताओं, पारिस्थितिकीविदों और अन्य विशेषज्ञों को परियोजना-संबंधी कार्यों में सम्मिलित किया।
क्या आप जानते हैं?
हाशिम आयोग रिपोर्ट (2004-05): इसमें यह रेखांकित किया गया कि किन नदियों और किन स्थानों पर जल अधिशेष को स्थानांतरित किया जा सकता है तथा किन नदियों में यह स्थानांतरण संभव होगा।
राष्ट्रीय जल नीति (2012): इसमें जल को आर्थिक वस्तु माना गया ताकि इसके संरक्षण और दक्ष उपयोग को बढ़ावा दिया जा सके। यह नीति जल संसाधनों की योजना, विकास एवं उनके सर्वोत्तम उपयोग को नियंत्रित करने हेतु बनाई गई थी।

नदी जोड़ परियोजना के उद्देश्य

  • सिंचाई विस्तार: जल-अभाव वाले क्षेत्रों में लाखों हेक्टेयर भूमि की सिंचाई की संभावना।
  • पेयजल आपूर्ति: ग्रामीण और शहरी जनसंख्या के लिए पेयजल की उपलब्धता में वृद्धि।
  • बाढ़ नियंत्रण: बाढ़-प्रवण बेसिनों से अतिरिक्त मानसूनी प्रवाह को मोड़ना।
  • सूखा निवारण: शुष्क और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में कृषि को स्थिर करना।
  • जलविद्युत उत्पादन: ऊँचाई के अंतर का उपयोग कर नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन।
  • अंतर्देशीय नौवहन एवं मत्स्य पालन: द्वितीयक आर्थिक लाभ।

प्रमुख परियोजना: केन–बेतवा लिंक

  • केन–बेतवा लिंक परियोजना (KBLP) राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य योजना के अंतर्गत कैबिनेट अनुमोदन प्राप्त करने वाली प्रथम ILR परियोजना है। इसका उद्देश्य मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के सूखा-प्रवण बुंदेलखंड क्षेत्र को लाभ पहुँचाना है।
    • यह परियोजना 10.62 लाख हेक्टेयर वार्षिक सिंचाई, 62 लाख लोगों को पेयजल आपूर्ति और 130 मेगावाट विद्युत उत्पादन का लक्ष्य रखती है।
  • अन्य प्राथमिकता परियोजनाओं में संशोधित परबती–कालीसिंध–चंबल (PKC) लिंक और गोदावरी–कावेरी लिंक शामिल हैं।

चुनौतियाँ और चिंताएँ

  • पारिस्थितिक असंतुलन: नदियों को जोड़ने से उनके प्राकृतिक प्रवाह में व्यवधान उत्पन्न हो सकता है, जिससे जलीय पारिस्थितिकी तंत्र और जैव विविधता प्रभावित होती है। नदी मार्गों में परिवर्तन विभिन्न प्रजातियों के आवासों की हानि का कारण बन सकता है।
    • उदाहरणस्वरूप, केन–बेतवा नदी जोड़ परियोजना में पन्ना टाइगर रिज़र्व के अंदर बाँध निर्माण शामिल है, जिससे डूब क्षेत्र और जैव विविधता हानि को लेकर चिंताएँ उठी हैं।
  • वित्तीय व्यवहार्यता: परियोजनाओं के क्रियान्वयन और रखरखाव से जुड़ी लागत अत्यधिक होती है।
    • केन–बेतवा नदी जोड़ परियोजना की अनुमानित लागत लगभग ₹45,000 करोड़ है, जिस पर विशेषज्ञों ने आपत्ति व्यक्त की है और यह जलविद्युत परियोजनाओं के लिए निर्धारित कठोर कानूनी प्रावधानों को दरकिनार करती है।
  • अंतर-राज्यीय विवाद: राज्यों को अपने-अपने क्षेत्रों में जल आपूर्ति, सिंचाई, नहरें, जल निकासी, तटबंध, जल भंडारण और जल शक्ति के उपयोग का अधिकार है।
    • भारतीय संविधान की सातवीं अनुसूची की सूची-II (राज्य सूची) में जल को सम्मिलित किया गया है।
    • हालाँकि, केंद्र सरकार को सातवीं अनुसूची की सूची-I (संघ सूची) के अंतर्गत अंतर-राज्यीय नदियों और नदी घाटियों को विनियमित और विकसित करने का अधिकार है।
  • समुदायों का विस्थापन: बड़े पैमाने की परियोजनाएँ प्रायः स्थानीय समुदायों के विस्थापन की मांग करती हैं, जिससे सामाजिक और आर्थिक चुनौतियाँ उत्पन्न होती हैं।
    • पुनर्वास प्रक्रिया जटिल हो सकती है और हमेशा न्यायसंगत या पर्याप्त नहीं होती।
  • जलवायु परिवर्तन का प्रभाव: नदी प्रणालियों में परिवर्तन जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को और बढ़ा सकता है, जैसे बाढ़ और सूखे की आवृत्ति एवं तीव्रता में वृद्धि।
    • यह पहले से ही संवेदनशील क्षेत्रों पर अतिरिक्त दबाव डाल सकता है।
  • वन-विनाश और आवास हानि: नहरों और जलाशयों के निर्माण हेतु बड़े पैमाने पर वनों की कटाई आवश्यक होती है, जिससे वन्यजीवों के आवास नष्ट होते हैं।
    • यह मृदा अपरदन और भूमि क्षरण में भी योगदान कर सकता है।
  • जल गुणवत्ता संबंधी समस्याएँ: विभिन्न नदियों के जल के मिश्रण से जल गुणवत्ता में परिवर्तन हो सकता है, जिससे मानव और पशु दोनों प्रभावित होते हैं।
    • एक नदी के प्रदूषक दूसरी नदी को दूषित कर सकते हैं, जिससे स्वास्थ्य संबंधी जोखिम उत्पन्न होते हैं।

निष्कर्ष एवं आगे की राह

  • भारत में नदी जोड़ परियोजना विश्व की सबसे महत्वाकांक्षी जल इंजीनियरिंग दृष्टियों में से एक है, जो स्वतंत्रता-उपरांत विकासात्मक आकांक्षाओं को प्रतिबिंबित करती है। किंतु यह पारिस्थितिकी, जलवायु अनिश्चितता, वित्तीय व्यवहार्यता और संघीय शासन से संबंधित आधुनिक चुनौतियों का सामना करती है।
  • आगे की राह संभवतः सुदृढ़ पर्यावरणीय सुरक्षा उपायों, पारदर्शी जल-वैज्ञानिक आँकड़ों, सहकारी संघवाद, विकेंद्रीकृत जल रणनीतियों के एकीकरण और दीर्घकालिक जलवायु मॉडलिंग पर निर्भर करेगी।

स्रोत: TH

 

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