भारत व्यापार समझौते में डिजिटल सेवाओं पर शून्य कर लगाने के लिए प्रतिबद्ध

पाठ्यक्रम: GS3/ अर्थव्यवस्था

संदर्भ 

  • भारत ने भारत–अमेरिका व्यापार समझौते के अंतर्गत डिजिटल सेवाओं पर शून्य कर लगाने और डिजिटल प्रसारणों पर सीमा शुल्क न लगाने की प्रतिबद्धता व्यक्त की है।

डिजिटल सेवाएँ और डिजिटल प्रसारण क्या हैं?

  • डिजिटल सेवाएँ: इनमें सॉफ़्टवेयर-एज़-ए-सर्विस (SaaS) प्लेटफ़ॉर्म जैसे कैनवा और सेल्सफोर्स, ऑनलाइन गेमिंग, ई-पुस्तकें, स्ट्रीमिंग सेवाएँ, स्वचालित डिजिटल विज्ञापन, तथा क्लाउड-आधारित समाधान शामिल हैं।
  • डिजिटल प्रसारण: इसका तात्पर्य डेटा के सीमा-पार संचरण से है, जिसमें ईमेल, सॉफ़्टवेयर डाउनलोड, क्लाउड सेवाएँ, एआई मॉडल तक पहुँच, और अन्य इलेक्ट्रॉनिक रूप से वितरित सामग्री सम्मिलित हैं।

भारत की डिजिटल कर व्यवस्था का विकास

  • वित्त अधिनियम, 2016 के माध्यम से समानीकरण उपकर (Equalisation Levy) लागू किया गया, जिसका उद्देश्य डिजिटल अर्थव्यवस्था से उत्पन्न कर संबंधी चुनौतियों का समाधान करना था।
    • वैश्विक प्रौद्योगिकी कंपनियाँ भारत में पर्याप्त राजस्व अर्जित कर रही थीं, जबकि पारंपरिक कर नियमों के अंतर्गत उनका “स्थायी प्रतिष्ठान” नहीं था।
  • इस अधिभार का उद्देश्य घरेलू कंपनियों और विदेशी डिजिटल प्लेटफ़ॉर्मों के बीच कराधान में समानता स्थापित करना था।
  • भारत का डिजिटल सेवाएँ कर (DST):  भारत ने पूर्व में निम्नलिखित कर लगाए थे:
    • गैर-निवासी कंपनियों को ऑनलाइन विज्ञापन भुगतान पर 6% समानीकरण उपकर।
    • विदेशी ई-कॉमर्स ऑपरेटरों और स्ट्रीमिंग प्लेटफ़ॉर्मों पर 2% अधिभार।
  • ये कर वर्ष 2025 में हटा दिए गए। नए व्यापारिक संकल्प के अंतर्गत भारत अब विशेष रूप से अमेरिकी कंपनियों पर ऐसे कर पुनः लागू नहीं कर सकेगा।

चिंताएँ

  • तुलनात्मक परिप्रेक्ष्य: अमेरिका ने बांग्लादेश, मलेशिया और इंडोनेशिया जैसे देशों से भी इसी प्रकार की प्रतिबद्धताएँ प्राप्त की हैं।
  • यूरोपीय संघ, हालांकि, डिजिटल प्लेटफ़ॉर्मों को डिजिटल सेवाएँ अधिनियम (DSA) और डिजिटल बाज़ार अधिनियम (DMA) जैसे साधनों के माध्यम से विनियमित करता है।
  • एआई और मूल्य अधिग्रहण: एआई प्रणालियाँ कृषि, सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम (MSMEs), वित्त और सेवाओं में तीव्रता से समाहित हो रही हैं।
  • आशंका है कि विदेशी एआई प्रदाता आर्थिक मूल्य का बड़ा हिस्सा अधिग्रहित कर सकते हैं, जिससे दीर्घकालिक तकनीकी निर्भरता उत्पन्न हो सकती है।
  • नीतिगत स्वतंत्रता का ह्रास: व्यापारिक समझौतों के अंतर्गत बाध्यकारी प्रतिबद्धताएँ भारत की भविष्य में डिजिटल और एआई-आधारित आर्थिक गतिविधियों पर कर लगाने की क्षमता को सीमित कर सकती हैं।
  • जैसे-जैसे आर्थिक गतिविधियाँ ऑनलाइन स्थानांतरित होती जा रही हैं, डिजिटल कर राजस्व एक महत्वपूर्ण राजकोषीय संसाधन बन सकता है।
  • घरेलू डिजिटल पारिस्थितिकी तंत्र पर प्रभाव: भारतीय डिजिटल स्टार्टअप और एआई डेवलपर बिना वित्तीय संरक्षण या नियामक लाभ के प्रमुख अमेरिकी प्रौद्योगिकी कंपनियों से प्रतिस्पर्धा का सामना कर सकते हैं।

आगे की राह

  • भारत को अपनी डिजिटल कर संरचना को OECD/G20 समावेशी ढाँचे (आधार क्षरण और लाभ हस्तांतरण– BEPS) के साथ संरेखित करना चाहिए, ताकि वैधता सुनिश्चित हो और प्रतिशोधात्मक व्यापारिक उपायों से बचा जा सके।
  • एक सुदृढ़ डेटा संरक्षण एवं सीमा-पार डेटा अंतरण ढांचा ऐसा होना चाहिए जो खुलापन बनाए रखते हुए राष्ट्रीय सुरक्षा तथा आर्थिक हितों के बीच संतुलन स्थापित करे।
  • किसी भी द्विपक्षीय डिजिटल प्रतिबद्धता में समीक्षा तंत्र शामिल होना चाहिए, ताकि समय के साथ तकनीकी, राजकोषीय और प्रतिस्पर्धात्मक प्रभावों का आकलन किया जा सके।

स्रोत: FE

 

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